Home करेंट अफेयर्स अखबारों के सम्पादकीय याद है अयोध्या का वह दिन (हिन्दुस्तान)

याद है अयोध्या का वह दिन (हिन्दुस्तान)

वे लोग भाग्यशाली होते हैं, जो किसी घटित होते इतिहास को अपनी आंखों से देखते हैं। मैं एक पत्रकार के नाते          6 दिसंबर, 1992 को रामलला जन्मभूमि के उस परिसर में खड़ा था। वर्ष 1986 से रामनवमी पर रिपोर्टिंग करने और रामलला के दर्शन करने लगभग प्रतिवर्ष जाता था। मेरे पूर्वज मिथिला वासी हैं, हम मां मिथिलेश कुमारी (सीताजी) के वंशज हैं। मिथिला वासी सीताजी के कारण अवध निवासी मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम को अपना बहनोई मानते हैं। अत: अयोध्या में रामनवमी पर लगने वाले मेले का आंखों देखा हाल लिखने का दायित्व मेरे अखबार द्वारा मुझे ही दिया जाता था। 
रिपोर्टिंग के लिए मैं 1 दिसंबर,1992 को ही अयोध्या पहुंच गया था। हाथ में डायरी, कलम और बैग में कैमरा। हम पत्रकार दिन भर में अनेक बार राम जन्मस्थान और कारसेवकपुरम जाते थे। अयोध्या घूमते थे। चर्चा सुनते थे, ‘पता नहीं, मंदिर कब बनेगा!’ साधु-संतों के मुख पर एक ही बात आती थी कि मंदिर बनना कब शुरू होगा? कारसेवकों की चिंता के लिए कारसेवकपुरम में विश्व हिंदू परिषद के नेता अशोक सिंघल, गिरिराज किशोर, मोरोपंत पिंगले व्यवस्था की दृष्टि से बैठकें ले रहे थे। अब ये तीनों नेता संसार में नहीं हैं। 
2 दिसंबर, 1992 को लोगों के आने का सिलसिला और बढ़ गया। रोज-रोज रिपोर्टिंग के लिए एसटीडी टेलीफोन बूथ ही एकमात्र सहारा था। तब मोबाइल फोन या ई-मेल की सुविधा नहीं हुआ करती थी। 3 दिसंबर को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सह-सरकार्यवाह सुदर्शन हम सभी पत्रकारों से मिले थे। उस शाम इतने लोग जुट गए कि अयोध्या के सभी भोजनालयों में भोजन समाप्त हो गया था। प्रसाद के लिए कारसेवकपुरम में लोग टूट पड़े थे। आश्रमों और मंदिरों में भोजन के लिए कारसेवकों का तांता लग गया था। 
हम पत्रकारों ने 3 दिसंबर की रात्रि से ही अनुमान लगाना शुरू कर दिया था कि 6 दिसंबर तक यहां 3-4 लाख कारसेवकों की संख्या हो जाएगी। राजमार्ग थम सा गया था। लोग नारे लगा रहे थे, राम लला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे।  हनुमानगढ़ी, कनक भवन, वाल्मीकि मंदिर, छोटी छावनी से लेकर सैकड़ों मंदिरों में भीड़ उमड़ पड़ी थी। पूरी अयोध्या पुलिस छावनी का रूप धारण कर चुकी थी। कोई मलयाली बोल रहा था, तो कोई तेलुगू। पहनावे से अलग-अलग राज्यों के लोगों को पहचाना जा सकता था। लघु भारत का अनोखा दृश्य था। ‘राम सबके और सब राम के’ का भाव वहां हर तरफ था। कुछ लोग जरूर इस बार आर या पार की चर्चा कर रहे थे। दिसंबर का महीना था, कड़ाके की सर्दी थी। हर आश्रम में अंगीठी या लकड़ी जलाकर ठंड दूर करने का प्रयास किया जा रहा था। राजगढ़, मध्य प्रदेश के युवा गीतकार व चित्रकार सत्यनारायण मौर्य ने पूरी अयोध्या की दीवारों को अपनी तूलिका से राममय कर दिया था। सर्वाधिक भीड़ न्यास के अध्यक्ष महंत परमहंस रामचंद्र दास के पास जुटती थी। 
5 दिसंबर को सूचना मिली कि विहिप के अध्यक्ष अशोक सिंघल, गिरिराज किशोर, लालकृष्ण आडवाणी, डॉ मुरली मनोहर जोशी, साध्वी उमा भारती, जयभान सिंह पवैया, विनय कटियार, साध्वी ऋतंभरा और आचार्य धर्मेंद्र जैसे दिग्गजों की 6 दिसंबर को रामलला परिसर में सभा होगी। कल क्या होगा, इसी उधेड़बुन में हम रात भर जागते रहे। नेता बोल रहे थे कि इस उमड़ते जन सैलाब की रक्षा ही हमारी प्राथमिकता है। 
6 दिसंबर को हम सभी को लग रहा था कि सभी नेताओं के भाषण होंगे और राम शिला पूजन होगा। सुबह 10 बजते ही आंदोलन के प्रणेता अशोक सिंघल मंच पर आए, कहा कि बैरिकेड्स को कोई भी पार न करे। मंच पर अन्य नेता भी विराजमान थे। हम पत्रकार सुदर्शन जी के पास खड़े थे। एक अंग्रेज पत्रकार उनसे जानना चाहते थे कि आगे क्या होने वाला है? जवाब मिला, ‘हिंदुत्व भारत की आत्मा है, अयोध्या में हिंदुत्व का यह सैलाब देखिए’। जैसे ही घड़ी की सूई ने 11 बजने का इशारा किया, अचानक हजारों कारसेवक विवादित ढांचे के परकोटे की ओर बढ़ चले। रोकने वाले रोकते रहे, लेकिन कारसेवक नहीं माने। इस बीच पता चला कि मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने प्रशासन को सख्त निर्देश दिए थे कि चाहे जो भी मजबूरी हो, कारसेवकों पर गोली नहीं चलेगी। डेढ़ से दो घंटे में पूरा ढांचा नीचे आ गया। इसी बीच कुछ पुजारियों ने रामलला को गुलाबी चादरों में लपेटकर स्थापित कर दिया। ढांचा तोड़ते समय अनेक लोग घायल हुए थे, कई की मृत्यु भी हुई थी। 
मैं अपने पत्रकारिता धर्म का निर्वाह कर रहा था। ढांचे के पास से ही अपने संपादक को टेलीफोन से आंखों देखी बता रहा था। फिर मैंने तय किया कि तत्काल ग्वालियर के लिए रवाना हो जाना है, ताकि अगले दिन के अखबार में पूरी रिपोर्ट छपे। बसें बंद हो गई थीं। कफ्र्यू लग चुका था। छिपते-छिपाते फैजाबाद, लखनऊ, कानपुर, बीहड़ों से गुजरते, खतरा उठाते इटावा, भिंड होते रात दो बजे ग्वालियर पहुंचना संभव हुआ था। 
उस ऐतिहासिक दिन को भुलाया नहीं जा सकता और आज का दिन भी ऐतिहासिक है। 5 अगस्त, 2020 को  होने वाला रामलला मंदिर निर्माण भूमि पूजन 6 दिसंबर, 1992 को अयोध्या की आंखों देखी को फिर से ताजा कर देगा। देश लंबे संघर्ष के बाद इस न्यायपूर्ण समाधान तक पहुंचा है। भूमि पूजन का यह अवसर राम जन्मभूमि आंदोलन के हुतात्माओं के प्रति श्रद्धांजलि भी है। 
देश ने उस 6 दिसंबर के बाद बहुत लंबा रास्ता तय किया है। आज लगता है, पहले दिन से गलती हो रही थी, चार सौ साल का इतिहास हो या 70 साल से चल रहे अदालती मामले। भारत के मन को कई लोग नहीं समझ पा रहे थे। वे राम को तो मानते थे, लेकिन बोलते थे, मंदिर नहीं बनेगा। वास्तव में, राम तो कभी राजनीति का विषय नहीं रहे। वह तो रोम-रोम में हैं, सब दलों, लोगों में हैं, हिंदू हों या मुसलमान, लेकिन यदि तथ्यों को समझने की कोशिश की गई होती, तो फैसला कब का आ गया होता। नहीं समझा गया, इसीलिए आंदोलन की जरूरत पड़ी। हम अपने घर में मंदिर बनाकर रखते हैं और भगवान राम वहां टेंट में रहें, उनके लिए मंदिर न हो? यह सबके मन की बात थी। अदालत ने भी सब साक्ष्य देखने के बाद ही निर्णय किया। यह दुर्भाग्य था कि भारत में भगवान राम जैसे आस्थापूर्ण विषय को अदालत में लाया गया। वर्षों तक सबकी बात सुनने और प्रमाण देखने के बाद न्याय के मंदिर ने सत्यमेव जयते को स्थापित कर दिया। अब इसे कतई विवाद का विषय नहीं बनाना चाहिए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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