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मुठभेड़ पर सुनवाई  (हिन्दुस्तान)

कुख्यात अपराधी विकास दुबे मुठभेड़ मामले में जांच को लेकर चल रही सुनवाई के समय सुप्रीम कोर्ट ने जो टिप्पणियां की हैं, उनका महत्व किसी एक मामले तक सीमित नहीं है। प्रधान न्यायाधीश एसए बोबडे की अध्यक्षता में कोर्ट ने बिल्कुल सही कहा कि सिर्फ एक घटना दांव पर नहीं है, बल्कि पूरा सिस्टम ही दांव पर है। सर्वोच्च न्यायालय के इशारे की व्यंजना व्यापक है। विकास दुबे के पूरे घटनाक्रम को महज एक मुठभेड़ तक घटाकर नहीं देखा जा सकता। सुप्रीम कोर्ट का यह सवाल यथोचित है कि ऐसे दुर्दांत अपराधी को पैरोल या जमानत पर कैसे छोड़ा गया था? अव्वल तो अपराधी पैदा ही नहीं होने चाहिए, शुरुआती दौर में ही प्रशासन को पूरी कड़ाई करते हुए अपराध का अंत करना चाहिए। यदि तब भी कोई अपराधी सिर उठा लेता है, तो उस पर ज्यादा कड़ाई से लगाम लगाने की जरूरत पड़ती है। किसी इनामी अपराधी को पकड़कर छोड़ देना या जमानत दे देना कहीं से सराहनीय नहीं है। दुर्भाग्य से हमारे यहां कानून-व्यवस्था ऐसी बनी हुई है कि जमानत को रिहाई मान लिया जाता है। विडंबना देखिए, जमानत को छोटे-बड़े तमाम अपराधी अपनी जीत मान लेते हैं और बाहर आकर पहले से ज्यादा खूंखार हो जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने साफ संकेत दिया है कि ऐसे अपराधियों को जमानत  देने या दिलाने में सावधान रहना चाहिए। प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि हम इस बात से हैरान हैं कि इतने गंभीर मामलों में आरोपी पैरोल पर रिहा हो गया और उसने आखिरकार वही सब किया। इस टिप्पणी के बाद विकास दुबे के खिलाफ हुई रिपोर्टों और जमानत आदि के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने पूरी सूचना मांगी है। पूरे प्रकरण को विस्तार में जानकर यह समझने की जरूरत है कि भारत में ऐसे अपराधी कैसे तैयार होते हैं? हमारी व्यवस्था में वे कौन-कौन से अंग हैं, जो अपराधियों के पालनहार हैं? ऐसे अपराधियों को जमानत कैसे मिल जाती है? ध्यान रहे, विकास दुबे ने अगर आठ पुलिसवालों को बेरहमी से मारा है, तो इससे कहीं ज्यादा पुलिसवालों का उसे सहयोग भी मिला होगा। जब हम अदालत में किसी मुठभेड़ पर उठने वाले सवाल को दबाने के लिए यह कहते हैं कि इससे पुलिस का मनोबल कम होगा, तब हम समग्रता में पुलिस के चरित्र के एक स्याह हिस्से को शायद छिपा रहे होते हैं। 
सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने भी संविधान की रोशनी में यह संदेश दिया है कि अपराधियों के खिलाफ पूरी सुनवाई होनी चाहिए और तभी सजा मिलनी चाहिए। किसी भी मुठभेड़ को जरूरी बताकर उसकी पृष्ठभूमि पर परदा डालने से स्वयं पुलिस की कमियां भी छिपी रह जाती हैं, इससे खुद पुलिस बल का व्यापक अहित होता है और सरकारों की बड़ी बदनामी होती है। कोर्ट ने जो कहा है, वह किसी एक सरकार के कामकाज पर नहीं, बल्कि यह उस व्यवस्था पर टिप्पणी है, जिसके साये में अपराधी बचते-बढ़ते हैं। 
यह तय हो गया है कि इस मुठभेड़ की जांच में सुप्रीम कोर्ट की भी भूमिका रहेगी। सुप्रीम कोर्ट के एक रिटायर्ड जज गठित होने वाले आयोग या समिति में अध्यक्ष रहेंगे। बुधवार को जांच समिति की रूपरेखा सामने आने की उम्मीद है। इसमें कोई शक नहीं, सुप्रीम कोर्ट की ताजा गंभीरता फलदायी हो सकती है। दूध का दूध और पानी का पानी हुआ, तो इससे पूरे तंत्र और देश की चमक बढ़ेगी।

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