Home करेंट अफेयर्स अखबारों के सम्पादकीय मिलकर मुकाबले का आया मौका  (हिन्दुस्तान)

मिलकर मुकाबले का आया मौका  (हिन्दुस्तान)

पिछले साल अप्रैल-जून तिमाही की तुलना में इस साल इसी तिमाही में भारत की जीडीपी में 23.9 प्रतिशत की कमी आई है, यह संकेत है कि लॉकडाउन ने अर्थव्यवस्था पर करारा प्रहार किया है। ध्यान रहे, सोमवार को जारी किए गए आंकड़े पहले आए अनुमान भर हैं, संभव है कि संशोधित आंकडे़ हमारी अर्थव्यवस्था को और भी नीचे दिखाएं। भारत के पूर्व मुख्य सांख्यिकीविद् प्रणब सेन के अनुसार, ऐसा इसलिए है, क्योंकि असंगठित क्षेत्र के आंकड़े बाद के चरण में उपलब्ध होंगे। 
भारतीय वित्त मंत्रालय के मुख्य आर्थिक सलाहकार कृष्णमूर्ति सुब्रमण्यम ने अर्थव्यवस्था के ऐसे बुरे प्रदर्शन के लिए इस महामारी को जिम्मेदार ठहराया है, जिसे सिर्फ भारत ही नहीं, वैश्विक स्तर पर महसूस किया गया है। साथ ही, उन्होंने यह भी कहा है कि लॉकडाउन में रियायत के साथ अर्थव्यवस्था में वी (अंग्रेजी अक्षर) आकार की तर्ज पर सुधार की शुरुआत हो गई है। हमें यह भूलना नहीं चाहिए कि भारतीय अर्थव्यवस्था कोविड-19 के पहले से ही सबसे खराब मंदी के दौर में थी। दिसंबर 2018 से मार्च 2019 के बीच आठ बेसिस प्वॉइंट ब्लिप को छोड़कर जीडीपी ग्रोथ लगातार आठ तिमाही तक घटती गई थी। जो विकास दर मार्च 2018 में 8.2 प्रतिशत थी, वह मार्च 2020 में घटकर 3.1 प्रतिशत रह गई थी।
खपत-मांग आर्थिक विकास की सबसे बड़ी चालक है। मांग से ही अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ने की ऊर्जा मिलती है। वित्त वर्ष 2019-20 में निजी अंतिम उपभोग व्यय (पीएफसीई) की भारत की जीडीपी में 57 प्रतिशत हिस्सेदारी थी। यह हिस्सेदारी मार्च 2020 की तिमाही में घटकर 2.7 प्रतिशत रह गई, यह जून 2012 के बाद से सबसे खराब स्थिति है। बाजार में खपत-मांग में भारी कमी को देखते हुए कंपनियों ने अपनी निवेश योजनाओं को विराम दे दिया है। सकल स्थिर पूंजी निर्माण में भी लगातार कमी देखी गई है। वित्त वर्ष 2019-20 में नॉमिनल जीडीपी विकास दर सिर्फ 7.2 प्रतिशत हो गई है, जो सन 1975-76 के बाद सबसे कम है। वर्ष 2019-20 के केंद्रीय बजट में नॉमिनल जीडीपी में 12 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान लगाया गया था, लेकिन हम लक्ष्य से काफी दूर रह गए। राजस्व संग्रह के लिए नॉमिनल जीडीपी की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।
अर्थव्यवस्था पर लॉकडाउन का असर अनुमानित आशंका से कहीं ज्यादा बुरा पड़ा है। ब्लूमबर्ग  के एक सर्वेक्षण में 15 अर्थशास्त्रियों ने भारतीय अर्थव्यवस्थामें महज 19.2 प्रतिशत संकुचन का अनुमान लगाया था, लेकिन इससे कहीं ज्यादा संकुचन ने अर्थशास्त्रियों को भी चौंका दिया है। ऐसा लगता है कि इस संकुचन ने सरकारी क्षेत्र सहित पूरी गैर-कृषि अर्थव्यवस्था पर अपना असर डाला है। कृषि क्षेत्र 3.4 प्रतिशत की विकास दर के साथ अकेले उम्मीद की किरण रहा है।
कोरोना का डर ऐसा था कि भारत अप्रैल और मई में पूरी तरह से लॉकडाउन में चला गया था। अर्थव्यवस्था लगभग थम-सी गई थी। व्यय के आंकड़े साफ बताते हैं कि लॉकडाउन के दौरान खपत और निवेश, दोनों में गिरावट हुई है। निजी अंतिम उपभोग व्यय 26.7 प्रतिशत संकुचित हुआ है। सकल निश्चित पूंजी निर्माण में, जो निवेश को तय करता है, 47.1 प्रतिशत का संकुचन हुआ है। हमें सुधार की दिशा में प्रयास करते हुए भी तैयार रहना चाहिए, अर्थव्यवस्था के इन आंकड़ों में और गिरावट देखी जा सकती है। 
आज सरकार के सामने बड़ी चुनौती है कि वह इतनी भारी-भरकम अर्थव्यवस्था को कैसे संभाले? जैसे-जैसे लॉकडाउन में ढील दी जा रही है, वैसे-वैसे कोरोना संक्रमण में लगातार वृद्धि हो रही है। इसका मतलब है, उपभोक्ताओं की निराशा बढ़ सकती है। यह बात जुलाई के महीने में भारतीय रिजर्व बैंक के नवीनतम उपभोक्ता विश्वास सर्वेक्षण में स्पष्ट रूप से देखी गई थी। आय और रोजगार के मोर्चे पर हुए नुकसान के वास्तविक खातों को देखते हुए यह बहुत आश्चर्यजनक नहीं है।
इधर, जून में देखा गया कुछ सुधार (या रिकवरी) इसलिए भी संभव हुआ, क्योंकि अप्रैल और मई में पूरी तरह लॉकडाउन था और लॉकडाउन में थोड़ी रियायत मिलते ही उपभोक्ता मांग में कुछ वापसी हुई। 
पर्चेजिंग मैनेजर्स इंडिसेस (पीएमआई) संकेत करता है कि जून में रिकवरी का जो माहौल बना है, वह स्थिर या सपाट होना शुरू कर चुका है। अच्छे संकेत मिलने लगे हैं। निश्चित रूप से आठ कोर सेक्टर के उद्योगों में संकुचन की रफ्तार जून (13 प्रतिशत) की तुलना में जुलाई (9.6 प्रतिशत) में धीमी हुई है।
ऐसे में, यह जरूरी हो जाता है कि सरकार एक बड़े राजकोषीय प्रोत्साहन की घोषणा करे। जरूरतमंद राज्यों और लोगों को ज्यादा समर्थन देना जरूरी हो गया है, अन्यथा राज्य सरकारें इस चुनौती को मुकाबला करने में असमर्थ हो जाएंगी, क्योंकि उनके राजस्व पर महामारी का अनुपातहीन बोझ पड़ेगा। आज की चिंता व्यापक है। विशेषज्ञों के अनुसार, बिगड़ती आर्थिक स्थिति खपत-मांग के मोर्चे पर अतिरिक्त सतर्कता पैदा कर देती है, जिससे घरों में एहतियाती बचत बढ़ जाती है। लोग अपने बुरे समय की आशंका में धन बचाने लगते हैं। 
विशेषज्ञों का कहना है कि उपभोक्ता भाव में गिरावट और स्थानीय तालाबंदी के कारण उत्पादन गतिविधियों को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है, अब यह अनिवार्य है कि सरकारें अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान करें। हम जो संकट देख रहे हैं, उसके शिकंजे में हमारी पूरी अर्थव्यवस्था है, इसलिए हमें मिलकर समन्वित ढंग से मुकाबला करना होगा। ध्यान रखना होगा कि एक समन्वित राजकोषीय प्रोत्साहन के बिना राज्य सरकारों के वित्त को संभालना मुश्किल हो जाएगा। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पिछले सप्ताह कहा था कि जीएसटी परिषद को आशंका है कि चालू वित्त वर्ष में जीएसटी क्षतिपूर्ति उपकर संग्रह में 2.35 लाख करोड़ रुपये की कमी होगी। केंद्र ने कहा है कि राज्य इस राशि में से 97,000 करोड़ रुपये ब्याज मुक्त ऋण के रूप में उधार ले सकते हैं, लेकिन उन्हें ब्याज का भुगतान करना होगा, यदि वे पूरी राशि उधार लेना चाहते हैं।
भारत के पूर्व प्रमुख सांख्यिकीविद् प्रणब सेन कहते हैं कि केंद्र ने इस मोर्चे पर अभी तक अग्रणी भूमिका नहीं निभाई है। वह कहते हैं कि हालांकि, यह महत्वपूर्ण है कि राजकोषीय प्रतिक्रिया अच्छी तरह से समयबद्ध हो और उसका अधिकतम लाभ पाने के लिए क्षेत्रों की जरूरत का ध्यान रखते हुए पैकेज का वितरण हो। केंद्र सरकार को सुधार की भावना को बढ़ावा देने के लिए एक स्पष्ट रोड मैप या कार्ययोजना के साथ सामने आना चाहिए।

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