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महामारी से जंग में भी राजनीति (हिन्दुस्तान)

कोरोना महामारी से कुशलता से निपटने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 1 जून को कर्नाटक सरकार की प्रशंसा की थी। मौका था, राज्य के एक प्रमुख स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय के रजत जयंती समारोह का। अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने डॉक्टरों व अन्य स्वास्थ्यकर्मियों की भी तारीफ की। इसे उस पेशे को प्रोत्साहित करने के रूप में देखा गया, जिसको देश के विभिन्न हिस्सों में कलंकित किया जा रहा था। उन्होंने हर किसी से अग्रिम मोर्चे पर तैनात इन योद्धाओं का सम्मान करने का आह्वान किया और कहा, ‘डॉक्टर और अन्य स्वास्थ्यकर्मी सैनिकों की तरह हैं, बिना वरदी वाले जवान’।
प्रधानमंत्री के इस संदेश को एक खास संदर्भ में देखने की जरूरत थी, लेकिन फौरन ही इस पर राजनीतिक रोटियां सेंकी जाने लगीं। कोविड-19 से जंग में एक नए ब्रांड ‘कर्नाटक मॉडल’ का जन्म हो गया। मुख्यमंत्री बी एस येदियुरप्पा ने इसका इस्तेमाल एक अवसर के रूप में किया। दावा किया गया कि कॉन्टेक्ट ट्रेसिंग (संक्रमित मरीजों के संपर्क जाल की पहचान) के मामले में कर्नाटक सर्वश्रेष्ठ रहा। महामारी  के नियंत्रण में ‘प्रौद्योगिकी’ के प्रभावी इस्तेमाल को लेकर भी अपनी पीठ थपथपाई गई। सोशल मीडिया के बयानवीरों ने तुरंत तमिलनाडु और केरल जैसे पड़ोसी राज्यों से तुलना करते हुए जंग छेड़ दी। मांग होने लगी कि ‘राज्य के बाहर से किसी को प्रवेश की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए। सिर्फ कर्नाटक का आधार कार्ड रखने वाले कन्नड़ों को ही आने दिया जाए।’
1 जून को बेंगलुरु में कोविड-19 के कुल 385 मामले थे। यहां तक कि 20 जून तक भी यहां संक्रमित मरीजों की संख्या 1,076 थी, जबकि मुंबई में 65,329, चेन्नई में 39,641 और दिल्ली में 56,746 लोग वायरस से संक्रमित हो चुके थे। संभवत: इन्हीं सबसे राजनेताओं को इस तरह की बयानबाजी करने का हौसला हुआ, जबकि आम जनता यह देखकर हैरान थी कि जमीनी हालात में तो कोई अंतर नहीं है। 
जाहिर है, भाजपा सरकार एक ऐसे नैरेटिव (माहौल बनाने) की तलाश में थी, जो महामारी के खिलाफ ‘केरल मॉडल’ की बढ़ती स्वीकृति का मुकाबला कर सके। केरल में 30 जनवरी को संक्रमण का पहला मामला सामने आया था, और नेपाह वायरस के अनुभव का इस्तेमाल करते हुए उसने जल्द ही कॉन्टेक्ट ट्रेसिंग, आइसोलेशन (मरीज को अलग-थलग करना) और इलाज की व्यवस्था शुरू कर दी। नतीजतन, उसे जल्द सफलता मिल गई और उसने कोरोना मुक्त राज्य की घोषणा कर दी। हालांकि, इस वायरस की प्रकृति ऐसी है कि केरल में इसकी फिर से वापसी हो गई।
19 जुलाई तक कर्नाटक में संक्रमितों की संख्या 55,000 से ज्यादा हो चुकी है, और इनमें से करीब 28,000 संक्रमण के मामले अकेले बेंगलुरु में मिले हैं। यहां स्वास्थ्यकर्मियों की कई डरावनी कहानियां सुनने में आ रही हैं। निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम के संगठन का कहना है कि करीब 30 फीसदी डॉक्टर, 50 फीसदी नर्स और कई वार्ड ब्यॉय संक्रमण की आशंका में चिकित्सा दायित्व से बाहर किए गए हैं। कर्नाटक मेडिकल एसोसिएशन का दावा है कि पूरे राज्य में 40-50 प्रतिशत स्वास्थ्यकर्मियों की कमी है। जब स्वास्थ्य शिक्षा मंत्री के सी सुधाकर ने एक अस्पताल का औचक निरीक्षण किया, तो उन्हें बताया गया कि 112 मरीजों की देखभाल के लिए महज दो नर्स हैं, जबकि मानदंड के मुताबिक प्रति 10 मरीज पर कम से कम एक नर्स को होना चाहिए।
बेंगलुरु में निजी अस्पतालों द्वारा कोरोना मरीजों को भरती न करने पर जब एक मरीज की सरकारी अस्पताल के सामने मौत हो गई, तब राज्य सरकार ने 18 निजी अस्पतालों को नोटिस जारी किया। शवों का अंतिम संस्कार भी बेंगलुरु में एक बड़ा मसला बनता जा रहा है, क्योंकि ऐसे मैदान रिहाइशी इलाकों में हैं। चूंकि इस्तेमाल किए गए व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (पीपीई किट) का निस्तारण नियमों के खिलाफ हो रहा है, इसलिए यहां के लोग डर रहे हैं। चिंता की बात यह भी है कि बेंगलुरु मेडिकल कॉलेज ऐंड रिसर्च यूनिट की क्रिटिकल केयर यूनिट में 13 जुलाई तक 90 में से 89 मरीजों की मौत हुई। हालांकि, डॉक्टरों ने इसकी वजह उनका देर से अस्पताल आना और कई अन्य रोगों से पीड़ित होना बताया है। इन सबके बीच मुख्यमंत्री ने महामारी से निपटने के लिए एक के बाद दूसरे मंत्री बदले। इतना ही नहीं, राज्य सरकार ने अपने इस दावे से उलट कि वह अब लॉकडाउन नहीं लगाएगी, अचानक 14 जुलाई से 22 जुलाई तक बंदी की घोषणा कर दी। हालांकि, यह कोई नहीं जानता कि विनिर्माण-कंपनियों को काम करने की अनुमति देकर भला लॉकडाउन से क्या हासिल हो सकता है? सरकार की इस घोषणा से भ्रम की स्थिति बनी, क्योंकि कुछ मजदूर पहले ही शहर छोड़ चुके थे।
इस उलझन ने कुछ हफ्ते पहले के तमिलनाडु के घटनाक्रम की याद ताजा कर दी। दरअसल, अप्रैल में इसी तरह शेखी बघारते हुए मुख्यमंत्री ई पलानीसामी ने घोषणा की थी कि राज्य जल्द ही वायरस से निजात पा लेगा। मगर कुछ ही हफ्तों में संक्रमण में व्यापक वृद्धि हुई। कर्नाटक की तरह ही यहां भी राजनीतिक ईष्र्या, प्रतिद्वंद्विता और दूसरों पर हावी होने की आदत देखी गई थी। 
सौभाग्य से तमिलनाडु में सुधार हुआ है। चेन्नई ने पांच लाख टेस्ट किए हैं, जो देश में सबसे अधिक है। बेंगलुरु भी टेस्ट की अपनी क्षमता सुधार रहा है। 15 जुलाई को यहां 22,000 टेस्ट हुए थे, जिसे महीने के अंत तक रोजाना 30,000 तक ले जाने का इरादा है। हालांकि, मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री से यह भी कहा था कि उनका सूबा एक लाख मामलों को संभाल सकता है, लेकिन इसकी आधी संख्या पर ही यह संघर्ष करता हुआ दिख रहा है, जबकि जुलाई के अंत तक संक्रमण के शीर्ष स्तर पर पहुंचने की आशंका है।
साफ है, राजनीतिक वर्ग को सियासत और महामारी का घालमेल नहीं करना चाहिए। केंद्र और राज्य सरकारों को यह एहसास होना चाहिए कि वे महामारी से लड़ रही हैं, एक-दूसरे से नहीं। वायरस केरल, कर्नाटक या तमिलनाडु में अंतर नहीं करेगा। फिर, भारत का इस कदर विस्तार है कि एक हिस्से में संक्रमण के थमते ही दूसरे इलाकों में इसका प्रसार हो सकता है। लिहाजा, एक-दूसरे पर उंगली उठाने की बजाय हमारे राजनीतिक वर्ग को परिपक्वता दिखानी चाहिए। आखिरकार यह मसला लोगों की जान से जुड़ा है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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