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मनमानी पर अड़ा पाकिस्तान (हिन्दुस्तान)

कुलभूषण जाधव से भारतीय राजनयिकों के मिलने के दौरान पाकिस्तान ने जो अड़गा लगाया, वह उसकी फितरत को देखते हुए आश्चर्य पैदा नहीं करता। भारत ने ‘निर्विघ्न और बेरोक-टोक’ मुलाकात की मांग की थी, जिसे अंतरराष्ट्रीय अदालत के फैसले के तहत स्वीकार करना पाकिस्तान की मजबूरी थी। मगर जब इसे अमलीजामा पहनाने का मौका आया, तो न सिर्फ आपसी बातचीत की रिकॉर्डिंग की खबर है, बल्कि डराने-धमकाने वाले अंदाज में एक पाकिस्तानी अधिकारी भी वहां मौजूद रहा। सामान्य तौर पर ‘काउंसलर एक्सेस’ का अर्थ राजनयिकों की आरोपित व्यक्ति से निजी मुलाकात है। इसमें तीसरे पक्ष का कोई दखल नहीं होता। वियना कन्वेंशन के मुताबिक, यह सुविधा इसलिए दी जाती है, क्योंकि आरोपित व्यक्ति के पास अपने बचाव का कोई साधन नहीं होता।

एक लिहाज से पाकिस्तान का यह रवैया भारत का पक्ष मजबूत करता है। चूंकि पाकिस्तान में कानून के मुताबिक व्यवस्थाएं नहीं चलतीं और अंतरराष्ट्रीय अदालत के फैसले के तहत भारतीय राजनयिकों को कुलभूषण जाधव से मिलना लाजिमी था, लिहाजा अब मुलाकात की तमाम गड़बड़ियों के आधार पर हम अंतरराष्ट्रीय अदालत का दरवाजा फिर से खटखटा सकते हैं। अब यह दावा मजबूती से किया जा सकता है कि जाधव के मुकदमे को फर्जी करार देते हुए उन्हें रिहा करने का आदेश दिया जाए। अदालत से यह भी गुजारिश की जा सकती है कि इस मुकदमे को किसी ऐसी जगह चलाने का हुक्म हो, जहां दूध का दूध और पानी का पानी हो सके। बेशक यह एक लंबी प्रक्रिया है, पर बिना काउंसलर एक्सेस के अंतरराष्ट्रीय अदालत में जाना हमारी दावेदारी को कमजोर कर सकता था।

इस पूरे प्रकरण का एक अर्थ यह भी है कि कुलभूषण के खिलाफ पाकिस्तान के पास कोई ठोस सुबूत नहीं है, भारत यह  शुरू से कहता आया है। हमारे राजनयिकों की यह मुलाकात इसलिए होनी थी, ताकि पाकिस्तान की आम अदालत में कुलभूषण की फांसी की सजा को चुनौती दी जा सके। इसका मतलब था कि अदालत पाकिस्तान की होती, वकील भी उसी के होते और तमाम जिरह भी पाकिस्तानी करते। फिर भी, पाकिस्तान ने काउंसलर एक्सेस में बाधा पैदा की, तो यह संकेत है कि वह अब भी ऐसे सुबूत की तलाश में है, जिससे आम अदालत में कुलभूषण की सजा बरकरार रखवाई जा सके। 

पाकिस्तान की सैन्य अदालत किस तरीके से काम करती है, इसका अंदाजा हाल ही में पेशावर हाईकोर्ट के एक फैसले से होता है। हाईकोर्ट ने लगभग 200 ऐसे व्यक्तियों के मामले को गैर-कानूनी बताया है, जिन पर दहशतगर्दी के मुकदमे फौजी अदालतों में चलाए गए थे। हाईकोर्ट का तर्क था कि उन सभी को सजा पाकिस्तान के कानून के खिलाफ दी गई थी। अदालत ने यह भी कहा कि हर आरोपित व्यक्ति के पास अपने बचाव में वकील रखने और तर्क पेश करने का अधिकार होता है, लेकिन फौजी अदालत में ऐसी कोई सुविधा आरोपियों को नहीं दी गई। कोई सुबूत भी पेश नहीं किए गए, सिर्फ आरोप लगाकर सजा सुना दी गई। कुलभूषण का मामला इससे जुदा नहीं है। उनके खिलाफ सुबूत तो दूर की बात, अब तक चार्जशीट भी दाखिल नहीं की गई है।

दरअसल, दो देशों के बीच ऐसे किसी मसले का अंत अमूमन कूटनीतिक तरीके से निकलता है। तमाम दुष्प्रचार के बाद परदे के पीछे से लेन-देन करके मामले को सुलझा लिया जाता है। पर दिक्कत यह है कि भारत व पाकिस्तान के रिश्ते काफी खराब हो चुके हैं। द्विपक्षीय संबंधों में इतनी कड़वाहट आ चुकी है कि कूटनीतिक पहल की फिलहाल कोई संभावना नहीं दिख रही। ऐसे में, उम्मीद अंतरराष्ट्रीय अदालत से ही है। यही वजह है कि कुलभूषण जाधव की सजा पर पाकिस्तान शायद ही हाल-फिलहाल में अमल करे। उनके साथ सरबजीत जैसा नहीं हो सकता, क्योंकि सरबजीत को सामान्य जेल में रखा गया था, जबकि कुलभूषण फौज की निगरानी में हैं। चूंकि यह मसला काफी गंभीर है, इसलिए यदि उन्हें कुछ होता है, तो भारत में इसकी तीखी प्रतिक्रिया होगी, जिसका नुकसान पाकिस्तान को हो सकता है।

अभी पाकिस्तान कुलभूषण का इस्तेमाल भारत के खिलाफ अपने दुष्प्रचार के लिए करता रहेगा। इस बहाने वह यह भी साबित करना चाहता है कि बलूचिस्तान में बिगड़ रहे हालात की वजह विदेशी ताकतें हैं। हालांकि, यह असलियत छिपी नहीं है कि बलूच लोग पाकिस्तान की नीतियों से बुरी तरह खफा हैं और उनका विद्रोह अंदरखाने से पैदा हो रहा है।
एक बात और। पिछले कुछ समय से दबी जुबान में यह बात चल रही है कि उजेर बलूच नामक कुख्यात तस्कर के एक परिजन की मदद से पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई ने कुलभूषण जाधव को अगवा किया था। उल्लेखनीय है कि उजेर के रिश्ते आईएसआई से जितने मजबूत हैं, उतने ही ईरानी खुफिया अधिकारियों से भी हैं। यही वजह है कि अगवा करने के बाद उन्हें आईएसआई ने अपनी निगरानी में रखा और जेल में उन्हें तमाम तरह की सुख-सुविधाएं दी जा रही हैं। कहा जा रहा है कि उन्हें तालिबानी प्रवक्ता एहसानुल्लाह एहसान की तरह फरार होने (इसे रिहा होना पढ़ें) का मौका दिया जा सकता है। लिहाजा कुलभूषण को आम अदालत में पेश करने पर पाकिस्तानी हुक्मरानों को उजेर का सच  सार्वजनिक होने का भी डर है।

बहरहाल, कुलभूषण के मामले में पाकिस्तान की जमीन कितनी कमजोर है, इसका पता इसी एक तथ्य से चलता है कि जब उनको अगवा किया गया था, तब एक साथ तीन तरह के बयान सामने आए थे। एक में उन्हें क्वेटा से करीब 600 किलोमीटर दूर पंचगूर (बलूचिस्तान) में गिरफ्तार करने की बात कही गई थी, तो दूसरे बयान में क्वेटा में, और तीसरे बयान में उन्हें अफगानिस्तान सीमा पार करते हुए पकड़ने की बात कही गई। जब एक ही गिरफ्तारी पर तीन अलग-अलग बयान सामने आएं, तो समझा जा सकता है कि केस कितना कमजोर है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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