Home करेंट अफेयर्स अखबारों के सम्पादकीय मच्छरों से मुकाबला  (हिन्दुस्तान)

मच्छरों से मुकाबला  (हिन्दुस्तान)

यह सही है कि लोहा ही लोहे को काटता है और अमेरिका में अगर एक योजना सफल रही, तो मच्छर ही मच्छर को खत्म करेंगे। फ्लोरिडा के की-हेवन इलाके में साल 2020 से इस योजना को शुरू करने की मंजूरी मिल गई है। एक निजी कंपनी विशेष प्रकार के जेनेटिकली मॉडिफायड अर्थात जैविक या आनुवंशिक रूप से संवद्र्धित मच्छर तैयार करेगी और ये मच्छर एक विशेष प्रजाति के खतरनाक मच्छरों को निशाना बनाएंगे। इसकी चर्चा तो काफी पहले से चल रही थी, लेकिन अब स्थानीय अधिकारियों ने इसे मंजूरी दे दी है। हमारे संसार में एडीज एजिप्टी नाम की एक मच्छर प्रजाति रहती है, जो मानव आबादी पर कहर ढाती रहती है। एडीज एजिप्टी प्रजाति के मच्छर डेंगू, जीका, चिकनगुनिया और येलो फीवर जैसी घातक बीमारियों के वाहक होते हैं। यदि प्रयोगशाला में मानव संवद्र्धित मच्छर अपने दुश्मन एडीज एजिप्टी को खत्म कर सके, तो यह एक बड़ी सफलता होगी। 
अमेरिका के फ्लोरिडा, टैक्सास इत्यादि प्रांतों में डेंगू का बड़ा प्रकोप रहा है। पिछले साल जनवरी से अक्तूबर के बीच अमेरिका में 27 लाख लोग डेंगू की चपेट में आए थे और 1,200 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी। दुनिया की बात करें, तो पिछले दो दशक में डेंगू मरीजों की संख्या में आठ गुना वृद्धि हुई है। अकेले 2019 में दुनिया में 42 लाख से अधिक लोग डेंगू पीड़ित हुए थे। कमोबेश यही स्थिति चिकनगुनिया और येलो फीवर की भी है। अमेरिका में ऐसे प्रकोप का बढ़ना जहां चिंता की बात है, वहीं 75 करोड़ संवद्र्धित मच्छर छोड़कर खतरनाक मच्छरों का अंत खोजने की कोशिश किसी खुशखबरी से कम नहीं है। फ्लोरिडा में आजमाया जा रहा यह पायलट प्रोजेक्ट अगर सफल रहा, तो इससे पूरी दुनिया फायदे में रहेगी। यदि यह प्रयोग कारगर रहा, तो ओएक्स 5034 नामक इन संवद्र्धित मच्छरों को कीटनाशक के विकल्प के रूप में इस्तेमाल किया जा सकेगा। इस पहल को अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी से भी हरी झंडी मिल गई है। लेकिन इससे जुड़े अनेक सवाल हैं, जो खुद अमेरिका में पूछे जा रहे हैं। क्या इन संवद्र्धित मच्छरों को पूरी तरह से परख लिया गया है? क्या ये मच्छर काटने का अपना प्राकृतिक स्वभाव छोड़ चुके हैं? क्या ये मच्छर इंसानों को नहीं काटेंगे? इंसानों को काटेंगे, तो फिर उन पर क्या असर होगा? कोई नई बीमारी तो नहीं फैलने लगेगी? जिस कंपनी को यह प्रयोग करने दिया जाएगा, वह कंपनी भी अपने मच्छरों की कारगरता को परखेगी। यह भी संभव है कि बड़े क्षेत्र में यह प्रयोग उतना उत्पादक सिद्ध न हो, लेकिन वैज्ञानिक तजुर्बा तो होगा। हम उन मच्छरों को काबू करने की दिशा में बढ़ेंगे, जो पूरी दुनिया में अपनी संख्या बढ़ाकर अनेक प्रकार की बीमारियों के वाहक बन रहे हैं। 
हालांकि, पर्यावरण प्रेमी इसे प्रकृति से एक खिलवाड़ मान रहे हैं। किसी बीमारी की दवा या बचाव में नाकामी का अर्थ यह नहीं कि हम तरह-तरह के कीट-पतंगों के साथ प्रयोग करने लगें। अगर कई लोग इसे बीमारी से लड़ने का सही तरीका नहीं मान रहे, तो चकित होने की कोई बात नहीं। इससे उन वैज्ञानिकों को ऊर्जा मिलनी चाहिए, जो इस प्रयोग को मानवीय रूप में सफल बनाने में जुटे हैं। कोई भी ऐसा प्रयोग, जो इंसानों के हित में हो, साथ ही, प्रकृति को न्यूनतम नुकसान और अधिकतम फायदा पहुंचाता हो, उससे हमें उम्मीद रखनी चाहिए।

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