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बढ़ते खतरे से लड़कर जीतेंगे हम (हिन्दुस्तान)

कोविड-19 दुनिया को एक नया अनुभव देने वाली महामारी साबित हुई है। इसका पहला मामला पिछले साल के आखिरी हफ्तों में वुहान में दर्ज किया गया था, और अब तक बीते आठ महीनों में देश-दुनिया में इसके कई हॉटस्पॉट बन गए हैं। चीन से निकलकर यह वायरस यूरोप पहुंचा, और अब एशियाई देशों में इसका संक्रमण शीर्ष पर पहुंचता दिख रहा है। भारत इससे खासतौर से प्रभावित है। रोजाना नए मामलों के लिहाज से हम सबसे ऊपर तो हैं ही, संक्रमित मरीजों की संख्या के हिसाब से भी हम शीर्ष देशों में शामिल हैं। हालांकि, ठीक होने वाले मरीजों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है और रिकवरी रेट 70 फीसदी से अधिक हो चुकी है। वैक्सीन के तीसरे चरण का परीक्षण भी बस शुरू होने वाला है। तो क्या कोरोना वायरस के दिन जल्द ही लदने वाले हैं? इसका जवाब तलाशने से पहले यह जानना जरूरी है कि अब तक हमने इसका किस तरह मुकाबला किया है?
अपने यहां मई तक संक्रमित मरीजों की संख्या बहुत ज्यादा नहीं थी। कहा जाता है कि लॉकडाउन के खुलने के बाद मामले तेजी से बढ़ने लगे। हालांकि, यहां मृत्यु-दर हमेशा से कम रही है। शुरुआती दिनों में यह बेशक पांच फीसदी के आसपास थी, लेकिन अब यह घटकर दो प्रतिशत से भी नीचे आ गई है। इसकी तुलना अगर टीबी से मरने वाले मरीजों या बाल मृत्यु-दर से करते हैं, तो काफी उम्मीदें बंधती हैं। टीबी से होने वाली कुल वैश्विक मौत की दो-तिहाई अकेले अपने यहां होती है, जबकि बाल मृत्यु-दर में भी हमारी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। इतना ही नहीं, कोरोना वायरस में मृत्यु-दर सामान्य वायरस जैसी ही है। तब क्यों इसको लेकर पूरे देश में यूं अफरा-तफरी का माहौल पैदा हो गया? 
दरअसल, दो वजहों से इस वायरस को लेकर डर फैला। एक, संक्रमित करने की इसकी तेज क्षमता और दूसरी, हमारे यहां स्वास्थ्य-सेवाओं की खस्ता हालत। बेशक, संक्रमित करने की इसकी ताकत दूसरे वायरसों से ज्यादा है, लेकिन आम लोग में डर का सबसे बड़ा कारण रहा, हमारा दरकता स्वास्थ्य ढांचा। आज भी भारत में कुल जीडीपी का 1.17 फीसदी हिस्सा ही स्वास्थ्य सेवाओं की बेहतरी पर खर्च किया जाता है। नतीजतन, कोरोना संक्रमण का प्रसार होते ही अस्पताल मरीजों के बढ़ते बोझ से चरमराने लगे। यह स्थिति अब तक सुधरती नहीं दिख रही, जबकि हर वायरल संक्रमण का अपना चक्र होता है और संक्रमण के शिकार हरेक मरीज को अस्पताल जाने की जरूरत नहीं पड़ती। 
यहां कहने का आशय यह नहीं है कि कोरोना वायरस हमारे लिए कोई चुनौती नहीं है। बेशक हमें इससे मजबूती से लड़ना है, लेकिन डर का बनता माहौल खतरनाक है। जरूरत आम लोगों में विश्वास बढ़ाने की है, लेकिन भरोसा जगना तो दूर, सरकार के राहत उपायों से खौफ ही अधिक बढ़ता दिखा। मसलन, ऐसी खबरें आईं कि गुणवत्तापूर्ण पीपीई किट (निजी सुरक्षा उपकरण) वरिष्ठ डॉक्टरों को दिए गए, जबकि जूनियर डॉक्टरों या अन्य स्वास्थ्यकर्मियों को अपेक्षाकृत कम गुणवत्ता के उपकरण मिले। उनके काम के घंटों को लेकर भी सवाल उठा, क्योंकि इस किट को लंबे समय तक पहनना एक मुश्किल चुनौती है। इसका अर्थ है कि सरकारों ने कोरोना संक्रमण को थामने के उपाय तो किए, लेकिन लोगों तक सही संदेश पहुंचाने में वे बुरी तरह विफल रहीं। इसी कारण बाजार से सैनिटाइजर और एन-95 मास्क जैसी अनिवार्य वस्तुओं की किल्लत हो गई, और कुछ लोगों ने बिना डॉक्टरी सलाह के फिजूल की दवाइयां निगल लीं।
अच्छी बात है कि अब रिकवरी रेट पर ज्यादा जोर दिया जाने लगा है। यानी, अब मीडिया माध्यमों से सिर्फ संक्रमित मरीजों की संख्या या नए संक्रमण की जानकारी नहीं दी जाती, बल्कि इससे ठीक होने वाले लोगों का जिक्र भी किया जाता है। यह एक अच्छी नीति है। इससे लोगों में भरोसा जगने लगा है कि कोरोना कोई ऐसी बीमारी नहीं, जो सिर्फ उनकी जान ले। इसके मरीज ठीक भी हो सकते हैं। छींकने या खांसते वक्त मुंह ढकने और साफ-सफाई पर विशेष ध्यान रखने जैसे निर्देशों को भी लोगों के सामने इसी तरह पेश करना चाहिए, ताकि उनका डर कम हो। वैसे भी, इस तरह के व्यवहार आमतौर पर बचपन में ही हमें सीखा दिए जाते हैं। हां, अब इस पर गंभीरता से अमल करने की जरूरत है। 
अनिश्चितता के माहौल को खत्म करना भी जरूरी है। जैसे, एक निजी अध्ययन में मैंने पाया कि कोरोना-हेल्पलाइन नंबर बमुश्किल से काम करते हैं। अव्वल तो यह नंबर उठता नहीं, और अगर कोई उठाता भी है, तो उचित सलाह देने का भरोसा देकर फोन रख देता है। इसी तरह, कुछ राज्य सरकारों ने ऐसी वेबसाइट लॉन्च की, जहां अस्पतालों के खाली बेड की जानकारी ली जा सकती है, लेकिन मुश्किल यह है कि जब तक सूचनाएं वेबसाइट पर दर्ज होती हैं, तस्वीर बदल चुकी होती है, यानी वेबसाइट पर तो अस्पतालों में खाली बेड दिखते हैं, पर असलियत में वे भर चुके होते हैं। इन सबसे भविष्य को लेकर लोगों के मन में कई दुश्चिंताएं पनपीं।
बेशक समस्याएं हैं, पर उनके हल की तरफ कदम बढ़ाने की जरूरत है, न कि मुश्किलों को और गहरा बनाने की। अपने यहां जनवरी के अंत में पहला मामला सामने आया था। बीते छह महीने से अधिक का वक्त गुजर गया है, लेकिन हम यह तय नहीं कर सके कि वायरस किस रूप में आगे बढ़ेगा? हॉटस्पॉट पर ही इसके संक्रमण को रोकने की दरकार थी, जिसमें हम सफल नहीं हो सके। इसीलिए चुनौती अब कहीं ज्यादा गहरी हो गई है।
बहरहाल, उम्मीद बनी हुई है। कोरोना से जंग हम जीत सकते हैं। इसका चरित्र आम वायरस से बहुत अलग नहीं है, इसलिए इसे लेकर नीतियां भी उसी अनुरूप बननी चाहिए। सरकार द्वारा जारी दिशा-निर्देश उन तबकों के हित में ज्यादा हों, जिन्हें अपना पेट पालने के लिए रोजाना घर से बाहर निकलना पड़ता है। इससे उनमें महामारी से लड़ने का आत्मविश्वास पैदा होगा। संक्रमण का यह दौर बहुत जल्दी थमने वाला नहीं है, लिहाजा कोरोना के साथ जीने का तरीका हमें सीखना ही होगा। और, इसमें डर व अनिश्चितता का माहौल दूर करना जरूरी है, तभी हमें सफलता मिलेगी।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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