Home करेंट अफेयर्स अखबारों के सम्पादकीय बदला सुर या नई चाल (हिन्दुस्तान)

बदला सुर या नई चाल (हिन्दुस्तान)

शनिवार-रविवार की देर रात पूर्वी लद्दाख में पैंगोंग झील के करीब चीनी दुस्साहस को भारतीय सैनिकों द्वारा नाकाम किए जाने और रणनीतिक रूप से अहम एक चोटी पर कब्जे के बाद बीजिंग के सुर बदल गए हैं। चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने कहा है कि दोनों देशों को अपने मतभेदों को काबू में करने की जरूरत है और इसके लिए वह बातचीत करना चाहते हैं। लेकिन चीन पर कैसे भरोसा किया जाए और क्यों न माना जाए कि यह पेशकश भी उसकी किसी योजना का हिस्सा है? हालिया घटनाक्रमों ने चीन से लगी पूरी सीमा पर अतिरिक्त सावधानी को अनिवार्य बना दिया है। 15 जून को गलवान घाटी में जो कुछ हुआ था, उसके बाद भी भारत ने धैर्य और परिपक्वता का परिचय देते हुए बातचीत से विवाद को सुलझाने का रास्ता चुना। पिछले ढाई महीनों में दोनों देशों के बीच सरहद पर कई दौर की सैन्य वार्ताएं हुईं व कूटनीतिक प्रयास भी हुए। मगर ताजा झड़प और सीमा पर उसकी सैन्य सक्रियता बताती हैं कि गलवान की वारदात भी किसी आकस्मिक आक्रोश की परिणति नहीं थी, बल्कि बीजिंग एक सुनियोजित योजना पर काम कर रहा है।
दरअसल, वैश्विक बाजारों में चीन इस समय विश्वसनीयता के भारी संकट से जूझ रहा है। खासकर कोरोना के इस दौर ने संसार भर के देशों को उसके प्रति सशंकित कर दिया है। भारत, अमेरिका, ब्रिटेन समेत कई बडे़ देशों ने उसकी कंपनियों के खिलाफ कठोर फैसले किए हैं, तो वहीं अनेक देशों की कंपनियां चीन से अपने कारोबार समेट रही हैं या फिर उन्होंने अपनी आगामी निवेश योजनाओं को टाल दिया है। ऐसे में, अपने विशाल बाजार और सक्षम युवा श्रम शक्ति के कारण भारत स्वाभाविक रूप से चीन का एक बेहतर विकल्प है। बीजिंग इस्लामाबाद के साथ मिलकर इस खित्ते में तनावपूर्ण माहौल इसलिए भी खड़ा करना चाहता है, ताकि भारत की आर्थिक संभावनाओं को वह प्रभावित कर सके। पाकिस्तान के जरिए ‘ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन’ में कश्मीर पर भारत को घेरने की उसकी कोशिश जब बुरी तरह विफल हो गई, तब उसने तिब्बत में नई सक्रियता दिखाई और उसे ‘आधुनिक समाजवादी तिब्बत’ बनाने का एलान किया। और फिर पूर्वी लद्दाख में एक नई हिमाकत! 
दुनिया की अर्थव्यवस्था पहले ही कोरोना महामारी की चपेट में है। ऐसी सूरत में किसी जंग की ओर ले जाने वाली कोई भी हरकत पूरी मानवता के प्रति एक गंभीर अपराध है। मगर बीजिंग ने कब इसकी परवाह की? इसलिए भारत को उसके छलावों को समझते हुए हर स्थिति के लिए तैयार रहना होगा। आक्रामकता के बाद अपने भौगोलिक विस्तार को बातचीत के जरिए मान्यता दिलाने की उसकी पुरानी रणनीति रही है। और इस बात से सभी पड़ोसी देश वाकिफ हैं। पर बीजिंग को अब इस मुगालते में कतई नहीं रहना चाहिए कि भारत उसके किसी दबाव में आ जाएगा। निस्संदेह, अंतिम-अंतिम क्षण तक टकराव को टाला जाना चाहिए, क्योंकि अंतत: इसका नुकसान दोनों पक्षों को होता है। लेकिन गलवान घाटी में भारी नुकसान उठा चुके चीन को यह स्वीकार करना ही होगा कि भारत अपनी भौगोलिक स्थिति से कोई समझौता नहीं करेगा और अब सीमा विवाद को अंतिम रूप से हल  करने की गंभीरता उसे दिखानी होगी।

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