Home करेंट अफेयर्स अखबारों के सम्पादकीय फिर रंगभेद (हिन्दुस्तान)

फिर रंगभेद (हिन्दुस्तान)

अमेरिका में श्वेत-अश्वेत के बीच तनाव की वापसी दुखद और चिंताजनक है। अमेरिका अपनी रंगभेदी नीतियों को करीब आधी सदी पीछे छोड़ आया था, मगर वास्तव में बदलाव एक हद तक कागजी ही बना हुआ है। रंगभेद की जमीनी हकीकत न केवल निराश करती है, बल्कि अमेरिका के लोकतांत्रिक समाज पर सवालिया निशान भी लगाती है। अमेरिका में अश्वेतों की आबादी 13 प्रतिशत ही है, लेकिन पुलिस के हाथों मारे जाने वालों में उनकी संख्या श्वेतों के मुकाबले ढाई गुना ज्यादा है। अमेरिका की इस स्याह हकीकत की चर्चा लगातार होती रही है, लेकिन ऐसा पहली बार हो रहा है कि तमाम अमेरिकी राज्यों में जॉर्ज फ्लॉयड की हत्या के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं। और एक सुखद पक्ष यह कि इन प्रदर्शनों में श्वेत भी समान रूप से शामिल हैं।

जॉर्ज का दोष ऐसा नहीं था कि पुलिस के हाथों उसकी मौत होती। वह गिरफ्तारी का विरोध कर रहा था, लेकिन तीन पुलिस वाले उसे जमीन पर गिराकर उस पर सवार हो गए। एक पुलिस अफसर ने तो इतनी निर्ममता दिखाई कि लगभग नौ मिनट तक वह जॉर्ज की गरदन पर अपने घुटने के बल सवार रहा। जॉर्ज गुहार लगाता रहा कि उसे सांस लेने में तकलीफ हो रही है, लेकिन उसकी गुहार बेकार गई। इस मौत के वीडियो को लोगों ने वायरल कर दिया और अब अमेरिकी पुलिस बल अपने लोगों के रोष के निशाने पर है। अमेरिका के 70 से ज्यादा शहरों में प्रदर्शन या कहीं-कहीं उपद्रव भी हुुए हैं। वैसे लोगों का यह रोष नया नहीं है। अमेरिका में अनेक लोगों के मन में श्वेत वर्चस्व या रंग को लेकर श्रेष्ठता भाव बना हुआ है। घृणा का यह भाव न केवल अतार्किक, बल्कि अमानवीय भी है। इससे अमेरिकी समाज की बदनामी होती है। अमेरिकी समाज में रंगभेद दूर करने की तमाम जमीनी और किताबी कोशिशों के बावजूद वहां जो स्थिति है, उसकी प्रशंसा नहीं हो सकती। जब भी अश्वेतों के प्रति घृणा की बात उठती है, तो अमेरिका की चर्चा जरूर होती है। इस प्रदर्शन व उपद्रव के प्रति अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बहुत चिंतित हैं और उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि निर्दोष लोगों के जीवन और संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया, तो सरकार सेना भी तैनात कर सकती है। अमेरिका के लिए यह दोहरी मुसीबत का समय है। एक तरफ वह कोरोना जैसी महामारी से बड़े पैमाने पर जूझ रहा है, वहीं रंगभेद विवाद अमेरिकी प्रशासन के गले की नई हड्डी बन गया है।

अब पूरी दुनिया की नजर अमेरिका पर है। अमेरिका को महामारी और मानवीयता, दोनों ही मोर्चों पर परीक्षा से गुजरना होगा। जब महामारी ने मौत का जाल फैला रखा हो, तब तो लोगों के प्रति उदारता और मानवीयता का दामन नहीं छोड़ना चाहिए। इस बीच अमेरिकी प्रशासन के लिए यह जरूरी है कि वह रंगभेद समर्थकों के साथ पूरी कड़ाई से पेश आए। रंगभेद को रोकने के लिए अमेरिकी सरकार को पहले से कहीं ज्यादा चौकस होना चाहिए। वहां पुलिस बल को भी शिक्षित-प्रशिक्षित करने की जरूरत है। पुलिस पर भी यह जिम्मेदारी है कि वह लोगों को आश्वस्त करे। अमेरिका में शांति और एकजुटता की जल्द से जल्द वापसी होनी चाहिए। सबके प्रति उदारता से ही अमेरिकी समाज में सभ्यता और अनुशासन की रौनक लौटेगी और दुनिया के दूसरे देश उससे अच्छे सबक लेंगे।

Source link

हमारा सोशल मीडिया

29,615FansLike
25,786SubscribersSubscribe

Must Read

आभासी लेकिन कामयाब अदालतें (हिन्दुस्तान)

वर्चुअल कोर्ट, यानी आभासी अदालतों को स्थाई रूप देने के प्रस्ताव पर मिश्रित प्रतिक्रिया आई है। कुछ लोग इसमें असीम संभावनाएं देख रहे...

अहम उप-चुनाव (हिन्दुस्तान)

आम तौर पर किसी उप-चुनाव को लेकर संबंधित निर्वाचन क्षेत्र के बाहर बहुत दिलचस्पी नहीं होती, क्योंकि उसका राजनीतिक प्रभाव भी सीमित होता...

तमिलनाडु : सजने लगा चुनावी चौसर (हिन्दुस्तान)

तमिलनाडु की मौजूदा राजनीति में यदि किसी व्यक्ति की कामयाबी देखने लायक है, तो वह मुख्यमंत्री ई के पलानीसामी ही हैं। वह न...

Related News

आभासी लेकिन कामयाब अदालतें (हिन्दुस्तान)

वर्चुअल कोर्ट, यानी आभासी अदालतों को स्थाई रूप देने के प्रस्ताव पर मिश्रित प्रतिक्रिया आई है। कुछ लोग इसमें असीम संभावनाएं देख रहे...

अहम उप-चुनाव (हिन्दुस्तान)

आम तौर पर किसी उप-चुनाव को लेकर संबंधित निर्वाचन क्षेत्र के बाहर बहुत दिलचस्पी नहीं होती, क्योंकि उसका राजनीतिक प्रभाव भी सीमित होता...

तमिलनाडु : सजने लगा चुनावी चौसर (हिन्दुस्तान)

तमिलनाडु की मौजूदा राजनीति में यदि किसी व्यक्ति की कामयाबी देखने लायक है, तो वह मुख्यमंत्री ई के पलानीसामी ही हैं। वह न...

एक सेवा अनेक शुल्क  (हिन्दुस्तान)

भारतीय रेल सेवा के लिए यात्रियों को पहले की तुलना में न केवल ज्यादा खर्च करना पड़ेगा, बल्कि कुछ सेवाओं में कटौती भी...

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here