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फिर आंदोलित किसान (हिन्दुस्तान)

संसद से पारित कृषि विधेयकों के खिलाफ आंदोलित पंजाब के किसानों के निशाने पर कल से ही रेल सेवाएं आ गई हैं, इसके पहले उन्होंने अनेक जगहों पर राजमार्गों को जाम कर दिया था। धीरे-धीरे इस आंदोलन को देश भर में फैलाने की तैयारियां हो रही हैं। दक्षिण भारत में भी कई जगहों पर किसान सड़कों पर उतर रहे हैं। रेलवे ने फिलहाल शनिवार तक पंजाब की अपनी तमाम सेवाओं को रद्द कर दिया है। यह विडंबना ही है कि लॉकडाउन हटने के बाद अभी यातायात सुविधाएं पूरी तरह से पटरी पर लौट भी नहीं पाई थीं कि अब किसानों के आंदोलन के कारण उनमें रुकावटें खड़ी हो गई हैं। हमारे देश में यह एक परिपाटी सी बन गई है कि जब तक आम जनजीवन को अस्त-व्यस्त न कर दिया जाए, तब तक सरकारें किसी विरोध का संज्ञान नहीं लेतीं। चाहे किसानों का आंदोलन हो या नौकरियों में आरक्षण का, हर बार यही नजारा होता है। खासकर पंजाब, हरियाणा, राजस्थान व पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यह प्रवृत्ति ज्यादा ही देखने को मिलती है। राजधानी के करीब होने के कारण ये आंदोलन मीडिया का ध्यान खींचने में सफल हो जाते हैं और फिर सरकार पर दबाव बढ़ जाता है।  
इस पूरे प्रकरण में मंडी और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की चिंता बड़े मुद्दे के तौर पर उभरी है। कई सारे किसानों को यह भय सता रहा है कि यदि मंडियां टूटीं, तो देर-सवेर एमएसपी की गारंटी भी उनके हाथ से निकल जाएगी। हालांकि, किसानों की इस चिंता को महसूस करते हुए केंद्र सरकार, बल्कि खुद प्रधानमंत्री ने आगे आकर यह आश्वासन दिया है कि सरकारी खरीद और न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था जारी रहेगी। इसके बावजूद किसान आंदोलन का विस्तार बताता है कि उन्हें आश्वासन से अधिक चाहिए। किसानों की चिंता को खुद सरकार के सहयोगी दलों के रवैये ने गहरा किया है, और इससे विपक्ष के आरोपों को बल मिल गया है कि सरकार ने एमएसपी को नए कानून का हिस्सा न बनाकर किसानों को उनके हाल पर छोड़ दिया है। भाजपा की दशकों पुरानी सहयोगी पार्टी अकाली दल की हरसिमरत कौर बादल ने पहले मंत्रिमंडल से इस्तीफा दिया और अब विधेयक पारित होने के बाद जद-यू ने भी किसानों की एमएसपी से कम पर खरीद को दंडनीय बनाने की मांग का समर्थन कर दिया है। 
किसानों की भलाई के लिए जब नए कानून बनाए जा रहे हैं, तब आदर्श स्थिति तो यही थी कि इनका व्यापक रूप से स्वागत किया जाता, लेकिन इनके विरोध में किसानों का एक हिस्सा भी यदि सड़क पर उतर आया है, तो साफ है कि सरकार उन तक अपनी बात पहुंचाने में नाकाम रही। अव्वल तो इन विधेयकों को पारित कराने के दौरान पैदा हुए विवाद ने देश भर में गलत संदेश भेजा और फिर सरकार ने नाराज किसान संगठनों से संवाद की पहल भी नहीं की। पंजाब में अकाली दल और बिहार में जद-यू के रुख के राजनीतिक निहितार्थ समझे जा सकते हैं, क्योंकि दोनों राज्यों में विधानसभा चुनाव के लिहाज से भूमिकाएं अपनाई जा रही हैं। पर तमाम राजनीतिक उलटबांसियों से परे, आंदोलित किसानों तक प्रस्तावित कानून में संरक्षित उनके हितों की बात पहुंचाने का दायित्व भी केंद्र सरकार का ही है। महामारी के इस विकट समय में कोई भी बड़ा आंदोलन नई मुसीबतें पैदा कर सकता है। सरकार के साथ-साथ किसान संगठनों को भी यह बात समझने की जरूरत है।  

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