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प्रणब दा का जाना (हिन्दुस्तान)

भारत राष्ट्र के दिग्गज राजनेताओं में शुमार प्रणब मुखर्जी का जाना भारतीय राजनीति से एक भद्र युग की विदाई है। अध्ययनशीलता, शालीनता, उद्यमशीलता और लोकतांत्रिक व्यवहार की दृष्टि से वह जो शून्य छोड़ गए हैं, उसकी भरपाई नामुमकिन है। देश का यह उदार चिंतनशील नेता 84 की उम्र में भी बिना पद सबका ध्यान खींचने में कामयाब था और राष्ट्रपति पद से विदाई के बावजूद इनकी प्रासंगिकता और उपस्थिति सशक्त थी। मस्तिष्क से एक थक्का हटाने के लिए की गई शल्य चिकित्सा के बाद वह स्वास्थ्य लाभ में लगे थे, पर दुर्भाग्य, उन्हें कोविड-19 ने घेर लिया। उनके कोमा में होने के बावजूद एक आशा थी कि वह फिर लौट आएंगे और हमेशा की तरह कुछ नया करके या बोलकर सबको चौंका देंगे, लेकिन दिल्ली के सैन्य अस्पताल में भारतीय राजनीति का एक सच्चा सेनापति सबको उदास कर गया। 
उनकी राजनीति की सबसे बड़ी खूबी तो यही है कि आपको उनके कट्टर विरोधी नहीं मिलेंगे। जिस लोकतांत्रिक शैली की राजनीति वह करते थे, उसमें दूसरों के लिए पूरी जगह होती थी। न घृणा, न रोष, न कोई हल्की बात, शायद ऐसे ही समर्पित नेताओं की परिकल्पना हमारा संविधान करता है। कुछ नेता होते हैं, जो संसद में बहस के लिए तैयार होकर आते हैं, ताकि राजनीतिक रूप से शानदार भाषण से लोगों को लुभा सकें, पर प्रणब दा एक ऐसे नेता थे, जो वास्तव में चीजों का मौलिक ज्ञान रखते थे। इसलिए उनके बयानों में एक वजन होता था, जो लोगों के दिलों में आसानी से बैठ जाता था। वह भाषणबाजी में नहीं, काम में लगे दिखते थे। आश्चर्य नहीं, उनके जाने पर लोग कह रहे हैं कि वह बहुत सक्षम प्रधानमंत्री साबित होते। भारतीय राजनीति के लिए यह सोचने का विषय है कि विद्वान राजनेता सम्मान तो पा लेते हैं, पर यथोचित स्थान के लिए उन्हें ज्यादा संघर्ष करना पड़ता है। बेशक, वह ऐसे सर्वश्रेष्ठ प्रधानमंत्री के रूप में भी याद किए जाएंगे, जो देश के नसीब में नहीं था। 
निरंतर संघर्ष करते अनेक वर्ष तक उन्होंने मंत्रिपद पर रहते भारत और खासकर उसकी अर्थव्यवस्था को आकार दिया। वह 2012 से 2017 तक देश के राष्ट्रपति रहे, पद की गरिमा, महत्व और दृढ़ता को बखूबी निभाते रहे। पिछले साल ही उन्हें सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाजा गया था, तो यह दरअसल विद्वतापूर्ण अच्छी राजनीति का भी सम्मान था। यह अपने आप में मिसाल है कि इंदिरा गांधी के दौर से नरेंद्र मोदी के दौर तक कम से कम पचास साल तक वह सक्रिय और सामयिक रहे। खास तौर पर, वित्त, रक्षा, विदेश मामलों में उनका कोई मुकाबला न था। अपने जटिल मामलों को सुलझाते समय कांग्रेस ने उन्हें हमेशा याद किया। एक समय वह भी आया था, जब कांग्रेस से अलग होकर उन्होंने अपनी राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस का गठन किया, लेकिन इस भद्र नेता की नाराजगी ज्यादा दिन नहीं टिकी, और कांग्रेस में लौट आए। एक नेता के रूप में उन्होंने आजीवन निष्ठा और व्यक्तिगत विचार, दोनों को साथ साधे रखा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय नागपुर भी गए, तो बहुत विद्वतापूर्ण ढंग से दक्षिणपंथ और अपनी आधुनिक समाजवादी विचारधारा के बीच संतुलन का बेहतरीन नमूना पेश किया। सकारात्मक राजनीति अगर एक साधना है, तो देश ने उसके एक आदर्श साधक को हमेशा के लिए खो दिया है।

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