Home करेंट अफेयर्स अखबारों के सम्पादकीय पूर्णिया का गुलशन उजड़ गया (हिन्दुस्तान)

पूर्णिया का गुलशन उजड़ गया (हिन्दुस्तान)

गांव के लोग गुलशन नाम से पुकारते थे सुशांत को। छुटपन में गुलशन नाम ही रखा गया था। सुशांत सिंह राजपूत तो स्कूली नाम था। मुंबई से आई मनहूस सूचना ने मलडीहा गांव को झकझोर दिया है। मेरे गांव का गुलशन उजड़ गया। पूर्णिया जिला और मलडीहा गांव को बॉलीवुड में मशहूर करने वाले सुशांत को उस सपनीले लोक की रंगीनियों ने ही लील लिया। वह गांव, घर, परिवार, रिश्तेदार सबका दुलारा था। सबकी आंखों का तारा। चार बहनों का इकलौता भाई। संपन्न किसान और सरकारी अफसर रहे कृष्ण कुमार सिंह अपने बेटे की हर जरूरत का ख्याल रखते थे। उसके हर सपने को अपनी आंखों में बसा लेते थे। निश्चित रूप से खुदकुशी की वजह भी मुंबई में ही होगी। पूर्णिया या पटना में तो बिल्कुल नहीं।
पिछले साल मई में सुशांत अपने गांव आया था। इस दफे 17 साल बाद उसका आना हुआ था। सपनों के साथ मुंबई गया सुशांत सफलता के साथ अपने गांव आया था। पता चला कि खगड़िया जिला के बरुनय गांव स्थित ननिहाल में मुंडन कराना है। उसके बड़े चाचा राम किशोर सिंह के बड़े पुत्र विधायक नीरज कुमार बबलू खुद सुशांत को लेने गए थे। नीरज बहुत मानते थे सुशांत को। ऐसे तो नीरज कुमार के छोटे भाई बबन सिंह से सुशांत की करीबी ज्यादा थी। दोनों हमउम्र जो थे। हमारा बचपन सुशांत सिंह और बबन सिंह के साथ बीता है। 
सुशांत जब भी गांव आता था, तो मध्य विद्यालय के प्रांगण में या पास के आम के बाग में हम सब दोस्त जुटते थे। आम का बाग सुशांत सिंह के पिताजी का ही है। शांत और सरल सुशांत बहुत ज्यादा बोलता नहीं था। मगर, हमेशा दोस्तों के साथ रहता। गांव के बड़ों की काफी इज्जत करता था। खेत-खलिहान भी घूम आते थे हम सब। सुशांत को पूरा पता था कि उसका और उसके परिवार का खेत कौन-कौन सा है, जबकि वह नियमित रूप से गांव में नहीं रहता था। पटना वाले घर में ही उसका जन्म हुआ था। पिताजी के साथ ही रहा। पढ़ाई-लिखाई चलती रही। जहां-जहां पिताजी गए, वहां-वहां सुशांत का जाना रहा। बहनों का बेहद दुलारा था वह। बहनों की शादी होती गई। इस बीच सुशांत और उसके सपने, दोनों जवान होते गए। वह गांव से दूर तो हुआ, मगर शरीर, मन से कभी भी नहीं। गांव से नाता उसके पिताजी का आज भी बराबर बना हुआ है। और नहीं, तो छठ में वह गांव जरूर आते हैं। 
आज याद आ रहा है कि दस-बारह साल की उम्र में जब हम लोग थे, तब सुशांत ने एक बार कहा था कि मुझे क्रिकेटर बनना है। स्कूल के मैदान में क्रिकेट भी खेल लेते थे। बाग से ही तीन डंडे तोड़कर विकेट बनते और लकड़ी का कोई तख्ता बैट बन जाता था। उसको देखकर हमलोग कहते भी कि गुलशन, तुम जरूर बड़े क्रिकेटर बनोगे। कुछ वर्षों बाद मिलना हुआ, तो सुशांत का मिजाज बदला हुआ था। क्रिकेट के बारे में पूछा, तो कहा कि नहीं, मैं हीरो बनूंगा। अपने गांव और जिला पूर्णिया का नाम हो जाएगा। देखना एक दिन मेरे कारण लोग पूर्णिया को जानेंगे। मुंबई जाऊंगा और सफलता जरूर मिलेगी। 
कुछ साल बीते, तो वह हमें टीवी पर दिखने लगा। पवित्र रिश्ता  सीरियल ने उसे घर-घर पहुंचा दिया। गुलशन को सब जानने लगे। कुछ बरस बाद वह फिल्मों में भी आ गया। उसे परदे पर देखकर हम दोस्तों को ऐसा लगा, जैसे हम सभी हीरो बन गए हैं। सचमुच, गुलशन ने गांव और जिले का नाम रोशन कर दिया। फिल्म-दर-फिल्म सफलता उसे मिलती गई और सीना मलडीहा गांव का चौड़ा होता गया। एमएस धौनी  फिल्म आई, तो हम लोगों ने आपस में चर्चा भी की थी। देखो, गुलशन क्रिकेटर और एक्टर, दोनों बन गया। फिल्म जबर्दस्त हिट हुई थी। अपना गुलशन बड़ा एक्टर कहलाने लगा। हम सब खुश थे। तय हुआ था कि अगली बार गांव आया, तो खूब बातें करेंगे। 
पिछले साल मई महीने में 11 तारीख को सुशांत गांव आया था। 17 बरस बाद। अंधेरा पसर रहा था, जब नीरज बाबू की गाड़ी से वह उतरा। सामने जो भी अपनी उम्र से बड़ा दिखा, सबका पैर छूते हुए आगे बढ़ा। चचेरे भाई और कुछ दोस्त सामने दिखे, तो गले लगा लिया। वह शाम और वह रात तो सुशांत को देखने की होड़ में ही बीत गई। अगली सुबह वह अपनी कुलदेवी की पूजा करने गया, फिर वरुणेश्वर स्थान गया। भीड़ जुट गई थी गांव में। सब अपने गुलशन को निहारना चाहते थे। कई सालों से जिसे परदे पर देखकर जी भर रहे थे, वह सामने था। गांव की खुशबू सुशांत के अंदर तक पैबस्त थी। तभी तो अगले दिन पहुंच गया वह उसी आम के बाग में, जहां हम बचपने में मिला करते थे। पेड़ पर जाकर बैठ गया। यहां सिर्फ हमउम्र दोस्त थे। चुहलबाजियों से बातचीत की शुरुआत हुई। इस बीच सुशांत ने एक गंभीर बात कही। उसने कहा था, अपनी मां की स्मृति में पूर्णिया में कुछ करना चाहते हैं। समाजसेवा करना चाहता हूं मैं। लेकिन यहां जो भी करूंगा, सब मां की याद में होगा। 
उस दिन आम के बाग से जो भी गुजर रहा था, सुशांत सबको टोक रहा था। बड़े दिखे, तो प्रणाम बोल देता। छोटा दिखे, तो हालचाल पूछ लेता। उसमें कुछ ऐसे भी लोग थे, जिन्हें सुशांत बिल्कुल नहीं पहचानता था, पर प्रणाम बोल देता था। एक दोस्त ने पूछा भी, उनको जानते हो? बोला, गांव के ही होंगे, इसलिए प्रणाम बोल दिया। कुछ मजदूर गुजर रहे थे, उसने उनसे भी बातचीत की। दिल खोलकर। छोटे-छोटे बच्चे आए, तो बोला मेरे साथ क्रिकेट खेलोगे। 
गुलशन ने बताया था कि मुंबई के पास एक जमीन खरीदी है। वहां बागवानी करता हूं। मन को बड़ा अच्छा लगता है। दरअसल, गांव उसके मन में बसा था। समझ लीजिए, वह कितना सहज था। उसके मन में कभी कोई निराशा के भाव नहीं दिखे। न बचपन में कभी, न पिछले साल की यात्रा में। गांव छोड़ते वक्त वह भावुक दिखा था। आज जब उसके हमेशा के लिए चले जाने की सूचना मिली है, तो हम सब रो रहे हैं। पूरा गांव रो रहा है। पूर्णिया रो रहा है अपने गुलशन के उजड़ जाने पर।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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