Home करेंट अफेयर्स अखबारों के सम्पादकीय पहाड़ों पर लड़ने का हिमालय सा हौसला (हिन्दुस्तान)

पहाड़ों पर लड़ने का हिमालय सा हौसला (हिन्दुस्तान)

सन 1974 के उस दिन को मैं भुला नहीं पाता। मैं चकराता में स्पेशल फ्रंटियर फोर्स (एसएफएफ) का ट्रेनिंग अफसर था। सरसावा में पैरा जंपिंग की ट्रेनिंग हो रही थी। विमान ने उड़ान भरी। तब एसएफएफ में तिब्बती लड़कियों की भी दो कंपनियां हुआ करती थीं, जिन्हें बाद में खत्म कर दिया गया। ट्रेनिंग के दौरान एक लड़की बेहोश हो गई। ज्यादातर लोगों का अंदेशा था कि यह लड़की अब पैरा जंपिंग में हिस्सा नहीं लेगी। मगर इस आशंका के उलट कुछ देर बाद जैसे ही उसे होश आया, उसने तुरंत पैरा जंपिंग की इच्छा जताई। और थोड़ी देर के बाद उसने सफल जंप कर दिखाया। तिब्बती लड़के हों या फिर लड़कियां, उनमें कठिन हालात में ट्रेनिंग लेने और युद्ध के लिए खुद को तैयार करने का गजब का जज्बा होता है। वे किसी भी बड़े मिशन के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। अपने पुरखों की जमीन को छूने की लालसा उनके हौसले को शायद और बढ़ा देती है। 
एक अरसे से चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के साथ सीमा पर लगातार हो रही झड़पों के बाद स्पेशल फ्रंटियर फोर्स फिर से चर्चा में आ गई है। मैं 1973 से 1976 तक इसका हिस्सा रहा। यह फोर्स सीमा पर तैनात रहती है। उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश में सीमा पर इसकी अहम भूमिका है। इसके सैनिक अधिक ऊंचाई वाले पहाड़ों और विषम भौगोलिक परिस्थिति वाले क्षेत्रों में युद्ध करने में माहिर हैं। इसकी ट्रेनिंग ही दुर्गम पहाड़ी इलाकों में होती है। विषम भौगोलिक परिस्थितियों और कड़ाके की ठंड और बर्फ के बीच ये प्रशिक्षण लेते हैं, तो आप समझ सकते हैं कि ये कितनी मजबूत प्रतिबद्धता वाले लोग हैं। 
अत्याधुनिक हथियारों से लैस सैनिकों को पारंपरिक युद्ध के अलावा गुरिल्ला लड़ाई की बारीकियां भी सिखाई जाती हैं। गुरिल्ला युद्ध में माहिर सैनिक चुपचाप दुश्मनों पर हमला करके सुरक्षित वापस आ जाते हैं। पहले के मुकाबले अब इस फोर्स के पास असॉल्ट राइफल के अलावा सेमी-ऑटोमेटिक स्नाइपर राइफल जैसे आधुनिक हथियार भी हैं। एसएफएफ में अधिकतर तिब्बती मूल के युवा सैनिक होते हैं और रेजिमेंट की कमान भारतीय सेना के विभिन्न विंग के अफसरों को दी जाती है। 
भारत-चीन के बीच 1962 की जंग के दौरान एक एलीट कमांडो यूनिट के गठन की जरूरत महसूस की गई। मकसद था एक ऐसी फोर्स तैयार करना, जो किसी अन्य युद्ध की स्थिति में सीमा पर तैनात रहे और आवश्यकता के अनुसार ऑपरेशन्स कर सके। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने ही इस फौज के गठन का आदेश दिया था। तिब्बती लड़ाकों को बहुतायत में इसमें शामिल किया गया। अपनी गोपनीयता यह इस कदर बरतता था कि इसकी मूवमेंट की भनक कई बार सेना तक को नहीं होती थी। इस संगठन की बुनियादी विशेषता इसकी गोपनीयता ही थी। सैनिकों के अभ्यास से लेकर इसमें बेहतर काम करने वाले जवानों के सम्मान की बातें तक सार्वजनिक नहीं की जाती थीं।
इस फौज ने गठन के बाद से ही खुद को साबित किया है। इसने कई जोखिम भरे ऑपरेशन को सफलतापूर्वक अंजाम देकर देश की सुरक्षा में अपनी सम्मानजनक भूमिका निभाई है। सन 1971 की जंग में चटगांव की पहाड़ियों पर ‘ऑपरेशन ईगल’ हो या फिर 1984 में स्वर्ण मंदिर को आतंकियों से खाली कराना; सियाचिन की चोटियों पर कब्जा करने के लिए ‘ऑपरेशन मेघदूत’ हो अथवा फिर कारगिल युद्ध में दुश्मनों के दांत खट्टे करने का इतिहास, हर भूमिका में इस रेजीमेंट के सैनिकों ने उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। मुझे याद है, सन 1974 में तत्कालीन प्रधानंत्री इंदिरा गांधी के सामने एसएफएफ के जवानों ने सरसावा स्थित ट्रेनिंग सेंटर में पैरा जंपिंग की थी। जवानों के हवाई करतब देखकर श्रीमती गांधी ने उनकी भरपूर प्रशंसा की और उन पर देश को गर्व होने की बात कही थी। 
भारत के पास पहाड़ी इलाकों में लड़ने वाली अनुभवी सेना है। कारगिल और सियाचिन जैसे दुर्गम इलाकों में दुश्मनों के छक्के छुड़ाकर हमने यह साबित भी किया है। फिर भी देश की सुरक्षा के प्रति बढ़ती चुनौतियों को देखते हुए ऐसी विशेष फौजों, उनकी गुणवत्ता और संख्या में बढ़ोतरी बेहद जरूरी है। चीन के साथ हमारी सीमाओं पर आसमान को छूते बर्फीले पहाड़ हैं। चीन के साथ सीमा-विवाद गहराने की सूरत में हमें इसके जैसे सैन्य संगठन और पहाड़ों पर लड़ने में सक्षम और अधिक सैनिकों की जरूरत है।
इस विशेष बल के जवानों की बहादुरी को देश ने भरपूर सराहा है। इसके जवानों ने कई वीरता पदक अपने नाम किए हैं। लेकिन अब तक लगभग परदे के पीछे चुपचाप अपना काम करने में जुटी यह फोर्स अपने काम से दिखाई देने लगी है। अब इसके सैनिकों को भी सरकार ने कैंटिन जैसी सुविधाओं से जोड़ दिया है।  
अपने पुरखों की जमीन गंवा चुके तिब्बती नौजवानों के चेहरे पर गुस्सा साफ दिखाई देता है। एसएफएफ का कोई भी सैनिक जब भी चीन को मुंहतोड़ जवाब देता है, उसके चेहरे की खुशी देखते ही बनती है। चूंकि इस विशेष फोर्स के अधिकांश जवान तिब्बती हैं, इसलिए चीन के प्रति उनका आक्रोश उन्हें अपना मिशन पूरा करने का जोश देता है। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, अरुणाचल प्रदेश सहित सिक्किम के बॉर्डर पर इस फोर्स के जवानों को अधिक संख्या में तैनात करना चाहिए। पिछले कुछ सालों से भारत ने भी एलएसी (वास्तविक नियंत्रण रेखा) पर अपनी पकड़ बनानी शुरू कर दी है। चाहे विषम भौगोलिक परिस्थितियों वाले ही क्षेत्र ही क्यों न हों, भारत ने वहां पर भी सड़क पहुंचा दी है, जिसे बड़ी उपलब्धि कहा जा सकता है। 
भारत को लद्दाख में अपनी पकड़ को पहले से भी ज्यादा मजबूत बनाने के ठोस उपाय करने होंगे। इस लिहाज से भी ऐसे विशिष्ट बलों को बढ़ावा देने की जरूरत है। सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अब पहले से ज्यादा काम करने की आवश्यकता है, ताकि मुश्किल समय पर भारत भी आक्रामक रुख अपना सके।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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