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नदियों को बांधने की कीमत (हिन्दुस्तान)

बिहार की बागमती नदी से बाढ़-सुरक्षा दिलाने की बात एक बार फिर चर्चा में है। यह नदी काठमांडू से करीब 16 किलोमीटर उत्तर-पूर्व शिवपुरी पर्वतमाला से निकलकर 195 किलोमीटर की यात्रा करती हुई सीतामढ़ी जिले के ढेंग नामक स्थान में भारत में दाखिल होती है। यहां से यह 394 किलोमीटर की यात्रा करती हुई बद्लाघाट (खगड़िया) में कोसी में मिल जाती है। अपनी उपजाऊ  सिल्ट (गाद) और सदानीरा स्वरूप के कारण यह नदी पवित्र मानी जाती है। हालांकि, उत्तर बिहार की अन्य नदियों की तरह अपनी धारा बदलने के लिए यह भी कुख्यात है। सन 1750 से 1983 तक इसकी धारा में 11 बार परिवर्तन के रिकॉर्ड उपलब्ध हैं। धारा-परिवर्तन का सीधा संबंध बाढ़ से है और बाढ़ नदी क्षेत्र में बसने वाले लोगों की जीवनचर्या का अभिन्न अंग है। गाद से होने वाले लाभ और पानी की प्रचुरता ने हमारे पूर्वजों को बाढ़ क्षेत्र में बसने के लिए प्रेरित किया होगा। यह सौदा हमेशा फायदेमंद रहा है।
बहरहाल, आजादी के काफी पहले से कोसी नदी की बाढ़ चर्चा में थी और उस समय बाढ़ से बचने का एक ही सहज उपाय था, तटबंधों का निर्माण। बांध बन जाने से नदी की पेटी का ऊपर उठना, सुरक्षित क्षेत्र में जल-जमाव, तटबंधों को ऊंचा करते रहने की मजबूरी और उनका टूटना सामान्य घटनाएं हैं। अंगरेज सरकार ने कोसी को नियंत्रित करने के लिए मनसूबे बांधे, मगर किया कुछ नहीं, क्योंकि वह जानती थी कि उसकी आमदनी के लिहाज से यह घाटे का सौदा है। दामोदर नदी को बांधकर धोखा खाने के बाद उसने 1860 के दशक में ही बांधों से तौबा कर ली थी। देश आजाद हो जाने के बाद हमारी सरकार ने कुछ अलग करने की नीयत से नदियों के किनारे तटबंध बनाने शुरू किए और जाहिर था, यह काम कोसी से शुरू किया जाता। सन 1955 से कोसी पर तटबंधों का निर्माण कार्य शुरू हुआ।
बिहार में कोसी के तटबंधों का काम जब शुरू हुआ, तभी यह लगभग तय हो गया था कि गंडक परियोजना में भी हाथ लग जाएगा। इन दोनों ही नदियों के साथ-साथ अन्य नदियों के इलाके की जनता और उनके नेताओं में भी कुछ कर गुजरने का भाव जगा। कोसी व गंडक को लेकर तो पहले से भी कुछ तैयारी थी, मगर बागमती या कमला, बूढ़ी गंडक जैसी नदियों के हिस्से में सिर्फ बातें थीं। इन क्षेत्रों के लोगों ने अपने-अपने नेताओं पर दबाव डाला और वे मुखर भी हुए। नतीजतन, इन नदियों से बाढ़-सुरक्षा की भी बात चली। लेकिन उस वक्त तक इंजीनियरों का मत था कि धारा बदलने वाली अस्थिर नदी पर तटबंध बनाना उचित नहीं है, क्योंकि इससे परेशानियां बढ़ जाती हैं। यह बात अलग है कि कोसी जैसी अस्थिर नदी पर भी बांध बनाए ही जा रहे थे। अब वे परेशानियां क्या-क्या हैं, उन्हें हम सभी भोग चुके हैं। 
बागमती एक अस्थिर नदी है, पर उसकी काट खोज ली गई कि यह नदी निचले छोर पर स्थिर है और हायाघाट से लेकर इसके कोसी से संगम तक तटबंध बनाए जा सकते हैं, और वे1950 के दशक में बन भी गए। लेकिन उसके साथ यह भी कहा गया कि हायाघाट के प्रति-प्रवाह में बागमती स्थिर नहीं है, इसलिए हायाघाट और ढेंग के बीच तटबंध नहीं बनाए जाने चाहिए। लेकिन इस अस्थिर भाग में भी ढेंग से सीतामढ़ी के रुन्नी सैदपुर तक 1970 के दशक में तटबंध बना दिया गया। तब तर्क यह दिया गया था कि नदी का बीच का भाग, जो रुन्नी सैदपुर से लेकर हायाघाट तक का क्षेत्र है, एक तश्तरी जैसा है और उसी इलाके में नदी अस्थिर है। इसलिए उसको खुला छोड़ देना चाहिए, ऊपर वाले क्षेत्र में बांध बनाना चाहिए। और वह स्थानीय लोगों के विरोध के बावजूद 1975 तक आते-आते तैयार भी कर दिया गया।
वर्ष 2007 की राज्यव्यापी बाढ़ ने बागमती के बीच वाले हिस्से पर तटबंध बनाने की चाहत को नए सिरे से हवा दी। अब इस इलाके की, जहां नदी तकनीकी तौर पर अस्थिर मानी जाती थी, प्रोजेक्ट रिपोर्ट भी तैयार कर ली गई है और स्थानीय लोगों की इच्छा के विरुद्ध यह कोशिश हो रही है कि इस हिस्से में भी नदी को घेर लिया जाए। स्थानीय जनता इन तटबंधों के खिलाफ है। अव्वल तो यह क्षेत्र एक तश्तरी की तरह है, फिर तटबंध की ऊंचाई यहां ज्यादा होगी, क्योंकि जमीन नीची है। यह बांध पानी की निकासी में बाधा डालेगा और बरसात में जो पानी यहां जमा होगा, वह नदी में जाएगा ही नहीं। नतीजतन, इस तश्तरी में अटका पानी या तो हवा में भाप बनकर उड़ेगा या धरती में रिस-रिसकर समाप्त होगा। इसका खेती पर भी बुरा असर पड़ेगा। फिर तटबंध टूटेगा नहीं, इसकी गारंटी कौन लेगा? सरकारी रिकॉर्डों के हिसाब से ही बागमती नदी के तटबंध 1987 से 2010 के बीच 58 बार टूटे हैं। इतना ही नहीं, जो तटबंध अब बनने जा रहा है, उसके बीच में मुजफ्फरपुर जिले के कटरा व गायघाट प्रखंड, समस्तीपुर जिले का कल्याणपुर प्रखंड और दरभंगा जिले के सिंघवारा, हनुमाननगर, बहादुरपुर व हायाघाट प्रखंडों के 109 गांव आएंगे। उनका क्या हश्र होगा, यह किसी से छिपा नहीं है, खासतौर से यह देखते हुए कि हायाघाट से बद्लाघाट तक बांध-निर्माण की वजह से विस्थापित लोगों के पुनर्वास का कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। ढेंग से रुन्नी सैदपुर तक जो 94 गांव तटबंधों के बीच फंसे थे, उन सबका पुनर्वास भी अब तक पूरा नहीं हुआ है। 
आम जनता को बाढ़ से सुरक्षा चाहिए, लेकिन वह मिल सकेगी और उसके लिए क्या कीमत चुकानी होगी, इस पर विचार जरूरी है। नदियों को स्थिर होने में सदियां गुजर जाती हैं। फिर, हम उन बूढ़े-बुजुर्गों को क्या कहेंगे, जो कहते नहीं थकते कि पहले पानी आता था और चला जाता था। बाढ़ ढाई दिनों की होती थी, जिससे ताजा मिट्टी खेतों में आती थी। मगर अब पानी जाता नहीं है। हायाघाट के रेल पुल से इस साल 14 जुलाई से 20 अगस्त तक रेलगाड़ी बाढ़ के पानी के कारण नहीं चल पाई। यह वही पानी है, जो 109 गांवों के लोगों के ऊपर से गुजरकर वहां पहुंचेगा। साफ है, समस्या पानी की निकासी की है और तटबंध इसे बढ़ाते ही हैं। ऐसे में, यदि एक बार हायाघाट से बद्लाघाट और ढेंग से लेकर रुन्नी सैदपुर तक बनाए गए तटबंधों का मूल्यांकन करके कोई निर्णय लिया जाता, तो बहुत अच्छा होता।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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