Home करेंट अफेयर्स अखबारों के सम्पादकीय दो देश, पर काम कुछ हूबहू (हिन्दुस्तान)

दो देश, पर काम कुछ हूबहू (हिन्दुस्तान)

सात-आठ साल पहले पाकिस्तानी दैनिक डॉन  में छपी एक किताब की समीक्षा पर कई कारणों से मेरा ध्यान गया था। लेखक एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी थे और उन्होंने कराची के अपराध जगत, माफिया व राजनीतिज्ञों के अंतरसंबंधों तथा पुलिस में व्याप्त भ्रष्टाचार, गलाकाट प्रतिस्पद्र्धा व अपने सियासी आकाओं को खुश करनेके लिए कुछ भी करने को तैयार पुलिस अधिकारियों के बारे में एक अंदरूनी व्यक्ति के रूप में किस्सागोई की थी। पुलिस सर्विस ऑफ पाकिस्तान या पीएसपी (भारत की इंडियन पुलिस सर्विस या आईपीएस के समकक्ष) के सदस्य ओमेर शाहिद हामिद ने अपने पहले उपन्यास द प्रिजनर  से ही पाकिस्तान और विदेशों में लेखक के रूप में पहचान बना ली है। पढ़ते समय इस उपन्यास के विवरण आपके रोंगटे खडे़ कर सकते हैं। 
सन 1960 के दशक तक पाकिस्तान की राजधानी रही और बाद में भी अकूत संभावनाओं से भरी नगरी के रूप में उभरी कराची कुछ ही वर्षों में एमक्यूएम की आपराधिक राजनीति, मौकापरस्त राजनीतिज्ञों, भ्रष्ट पुलिस तंत्र व लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाते फौजियों के मकड़जाल में फंसकर कैसे नष्ट हो गई, इसको समझना हो, तो हामिद को पढ़ना चाहिए। कोई ताज्जुब नहीं कि आपको मुंबई याद आ जाए। उसी तरह, राजनेताओं, अपराधियों और पुलिस के भ्रष्ट कर्मियों का गठबंधन। गनीमत है कि अभी तक भारत में न्यायपालिका या नागरिक समाज की कुछ साख बाकी है और सेना भी राजनीति से दूर है।
पाकिस्तान में 11 सितंबर को एक ऐसा अपराध हुआ, जिसके बारे में पढ़ते हुए मुझे बेतहाशा अपना देश याद आया। घटना ऐसी थी, जो हमारे देश में भी कहीं घट सकती है और पाकिस्तानी पुलिस व राजनीतिज्ञों की प्रतिक्रिया भी कमोबेश वैसी ही थी, जो अक्सर भारत में दिख जाती है। आधी रात के थोड़ा पहले लाहौर से पाकिस्तानी मूल की एक फ्रांसीसी महिला किसी संबंधी के पास इस्लामाबाद जाने के लिए अपने दो बच्चों के साथ मोटरवे पर निकली। चलने के पहले उसने अपना पेट्रोल चेक नहीं किया था। लाहौर छोड़ने के थोड़ी देर बाद ही तेल खत्म हो गया और उसकी गाड़ी खड़ी हो गई। उसने मोटरवे पुलिस को मदद के लिए फोन किया, वहां से उत्साहजनक प्रतिक्रिया न मिलने पर लाहौर पुलिस से संपर्क करने का प्रयास किया और इस्लामाबाद के अपने रिश्तेदार को भी सूचित कर दिया। उसके पास किसी मदद के पहुंचने के पहले ही दो गुंडे आ गए और उन्होंने बच्चों के साथ कार के अंदर लॉक करके बैठी महिला को शीशे तोड़कर बाहर निकाला और खेत में घसीटकर बच्चों के सामने ही उसके साथ बलात्कार किया। थोड़ी देर बाद पहली मदद पहुंची और उस बदहवास महिला को वापस कार तक लाया गया, तब तक अपराधी भाग चुके थे।
जब मैंने इस अपराध के बारे में पढ़ा, मुझे कुछ भी अजीब नहीं लगा। हमारे यहां भी ऐसी आपराधिक घटनाएं होती ही रहती हैं। ताज्जुब इस बात पर हुआ कि पुलिस, नेताओं और नागरिक समाज की प्रतिक्रिया भी भारत जैसी ही हुई। शुरुआत हुई लाहौर के सीसीपीओ (कैपिटल सिटी पुलिस ऑफिसर- भारतीय पुलिस कमिश्नर का समकक्ष) उमर शेख के बयान से। उमर शेख ने पत्रकारों को दी पहली ब्रीफिंग में पीड़ित महिला को इस बात के लिए दोषी ठहराया कि वह देर रात गए छोटे-छोटे बच्चों के साथ मोटरवे पर निकली, उसने चलने के पहले चेक नहीं किया कि गाड़ी में पर्याप्त तेल है भी या नहीं, फिर उसने रात में निर्जन रहने वाला मोटरवे चुना और भीड़-भाड़ वाली जीटी रोड से नहीं गई। यह वही उमर शेख हैं, जिन्हें तीन ही दिन पहले पंजाब के आईजी पुलिस के विरोध के बावजूद लाहौर का सीसीपीओ तैनात किया गया था। उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे हुए थे और पद-ग्रहण के दूसरे ही दिन लाहौर के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने उनके आदेशों को मानने से इनकार कर दिया था। प्रधानमंत्री इमरान खान के चहेते सीसीपीओ को तो नहीं हटाया गया, पर आईजी पुलिस को हटाकर दूसरे पुलिस अधिकारियों को संदेश दे दिया गया कि उन्हें उमर शेख की मातहती में ही काम करना होगा। 
गनीमत है कि प्रेस और नागरिक समाज की प्रतिक्रिया भी भारतीय संस्थाओं की तरह हुई। महिला संगठन सीसीपीओ पर टूट पडे़ और सत्ताधारी पार्टी के समर्थक अखबारों को भी, जो चंद दिन पहले उमर शेख की कसीदाकारी कर रहे थे, उनकी खबर लेनी पड़ी। सत्ताधारी पार्टी के नेताओं ने भी पलटी मारी और उमर शेख को बिना शर्त माफी मांगनी पड़ी। पूरे पाकिस्तान में इस वारदात के खिलाफ उबाल सा आ गया है। लोग सड़कों पर हैं और इमरान सरकार रक्षात्मक मुद्रा में आ गई है। यह देखना बड़ा रोचक था कि एक टीवी चैनल पर एक मौलवी की इस दलील पर कि किसी ‘भली’ औरत को बलात्कार की शिकायत नहीं करनी चाहिए और राज्य भी तभी कार्रवाई कर सकता है, जब घटना के चार चश्मदीद मर्द गवाह हों, सारी महिला प्रतिभागी उस पर टूट पड़ीं और कार्यक्रम की शुरुआत में मौलाना के प्रति अतिशय सम्मान से लबरेज ऐंकर को भी उनकी तंबीह (भत्र्सना) करनी पड़ी।
भारतीय महिला संगठनों की तरह पाकिस्तान में भी मजबूत संगठनों की एक शृंखला बन गई है। इनके कार्यकर्ता किसी भी कट्टरपंथी को अब रक्षात्मक कर सकते हैं। पिछले कुछ वर्षों से वे हर साल औरत मार्च निकालते रहे हैं। गत वर्ष इसका थीम था ‘मेरा जिस्म मेरा हक’। यह विषय ही मर्दवादी समाज के लिए इतना चुनौतीपूर्ण था कि जमाते-इस्लामी या जमाते-उलेमा-ए-पाकिस्तान जैसे कट्टरपंथी मजहबी संगठनों ने मार्च निकलने के पहले ही उन पर हमले शुरू कर दिए, पर मजबूत इरादों वाली औरतें जमी रहीं और कुछ ही दूर सही, लेकिन वह मार्च निकला जरूर। इस साल के औरत मार्च का समय आ गया है और लाहौर बलात्कार कांड ने महिला संगठनों में अतिरिक्त जोश भर दिया है। 
बंटवारा भले हो गया है, पर भारत और पाकिस्तान की सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियां कमोबेश एक जैसी हैं। दोनों के सत्ताधारी दल पुलिस के दुरुपयोग की बेशर्म आकांक्षा रखते हैं; पुलिस समान रूप से गैर-पेशेवर है या अपराधी दोनों समाजों में बेखौफ दनदनाते घूमते हैं। हमारे अनुभव के अनुसार इस मामले में भी शुरू में पुलिस की दो इकाइयां सीमा विवाद में उलझी रहीं और तफ्तीश का कबाड़ा होता रहा। मुझे तो इस मामले की रपटें पढ़ते हुए सुशांत सिंह राजपूत का मामला, मुंबई और अपनी संस्थाएं याद आती रहीं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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