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ताकि मांग बढ़े (हिन्दुस्तान)

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कल केंद्रीय कर्मचारियों के लिए जिन सुविधाओं की घोषणा की, वह लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था में नया जोश भरने की एक और कवायद है। ये व्यावहारिक कदम हैं, और इनसे अर्थव्यवस्था में अतिरिक्त मांग के बढ़ने की उम्मीद बांधी जा सकती है। इन सुविधाओं के तहत तमाम केंद्रीय कर्मचारियों को दस हजार रुपये की करमुक्त राशि अग्रिम भुगतान के रूप में दी जाएगी और कर्मचारी इसे 31 मार्च तक किसी भी त्योहार में खर्च कर सकेंगे। उन्हें दस किस्तों में इसे लौटाने की सुविधा होगी। इसी तरह, ‘एलटीसी कैश वाउचर स्कीम’ में कर्मचारी ‘रिइंबर्समेंट’ की बजाय सीधे नकदी का दावा कर सकेंगे और इस राशि का इस्तेमाल भी उन्हें 31 मार्च से पूर्व कर लेना होगा। अपने कर्मचारियों के अलावा केंद्र ने राज्यों को भी पूंजीगत व्यय के लिए 12,000 करोड़ रुपये का ब्याज-मुक्त कर्ज देने का एलान किया है। राज्य 31 मार्च तक अपनी नई-पुरानी योजनाओं पर इसे खर्च कर सकेंगे और उनके पास अगले 50 वर्षों में इसे चुकाने की सहूलियत होगी। सरकार का आकलन है, जो तर्कसंगत भी है कि इन कदमों से बड़ी मांग पैदा होगी। 
भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर तमाम देशी-विदेशी वित्तीय व रेटिंग संस्थाओं के जो आकलन हैं, वे सरकार की पेशानी पर बल डालने के लिए काफी हैं। हालांकि, अनलॉक की प्रक्रिया के आगे बढ़ने के बाद बाजार में स्थितियां कुछ सुधरी हैं, खुद वित्त मंत्री ने भी आपूर्ति शृंखला में सुधार की स्थिति पर संतोष जताया है। लेकिन यह एक सर्वमान्य बात है कि बाजार में मांग बढ़ाए बिना अर्थव्यवस्था की पटरी पर वापसी मुमकिन नहीं है। और मांग बढे़, इसके लिए जरूरी है कि उपभोक्ताओं के जेहन से महामारी से जुड़ी आशंकाएं तिरोहित हों और वे खुलकर खर्च करने की स्थिति में आएं। लॉकडाउन ने मध्यवर्ग को किफायती खर्च के लिए बाध्य किया है और जब तक कोविड-19 से जुड़ी स्थितियां सामान्य के करीब नहीं पहुंचेंगी, सामाजिकता नहीं बढ़ेगी, तब तक उनका पूर्व स्थिति में लौटना कठिन है। ऐसे में, केंद्रीय कर्मचारियों को दी गई सुविधाओं की अहमियत समझी जा सकती है।
दुनिया भर के कई अर्थशास्त्री और विपक्ष के नेता केंद्र सरकार से अपील करते रहे हैं कि अर्थव्यवस्था में जान डालने के लिए उसे गरीबों की जेब में कुछ अरसे तक पैसे डालने पड़ेंगे, ताकि बाजार में मांग की स्थिति सुधरे। उनका जोर खासकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था में ऊर्जा पैदा करने पर रहा है। भारतीय अर्थव्यवस्था को सहारा देने की इसकी क्षमता असंदिग्ध है। कोरोना-काल ने तो इसके प्रामाणिक आधार भी मुहैया कराए हैं। जब सभी क्षेत्रों की विकास दर जमीन पर लेट रही थी, तब कृषि क्षेत्र देश को उम्मीद की रोशनी दिखा रहा था। सरकार ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था की ठोस क्षमताओं को देखते हुए ही मनरेगा का बजटीय आबंटन बढ़ाया है। भारत में त्योहार अर्थव्यवस्था को मजबूत संबल देते हैं। यही वक्त होता है, जब खासतौर से ग्रामीण लोग दैनिक जरूरतों के आगे की खरीदारी करते हैं। विशेष रूप से दुर्गा पूजा, दिवाली, छठ, ईद, गुरुपर्व और क्रिसमस हमारी अर्थव्यवस्था को नई ऊंचार्ई देते आए हैं। कोरोना ने इस साल के त्योहारों का रंग फीका कर दिया है, लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था के उडे़ रंग इन्हीं की बदौलत सुर्खरू भी होंगे। सरकार को कुछ और राहतें असंगठित क्षेत्रों पर भी बरसानी होंगी।

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