Home करेंट अफेयर्स अखबारों के सम्पादकीय ताकि प्रवासी श्रमिक उपेक्षित न समझें (हिन्दुस्तान)

ताकि प्रवासी श्रमिक उपेक्षित न समझें (हिन्दुस्तान)


अपने देश में पलायन न तो कोई अनूठी घटना है, और न ही नई बात। पंचवर्षीय योजनाओं के दस्तावेजों से स्पष्ट होता है कि विकास योजनाओं और नीतियों में पलायन के मुद्दे पर उचित ध्यान नहीं दिया गया। यह आश्चर्यजनक है, क्योंकि पलायन के कारण प्रतिस्पद्र्धा, उत्पादकता, रोजगार, श्रम बाजार और स्थानीय विकास जैसे महत्वपूर्ण पहलू प्रभावित होते हैं। कोविड-19 के बाद दुनिया में होने वाले बदलावों के साथ अब इस मुद्दे पर चर्चा तेज होने लगी है।
भारत के शहरों में प्रवासी श्रमिकों की पहचान आंतरिक पलायन, असंगठित क्षेत्र और मौसमी पलायन के आधार पर होती है। कड़ी प्रतिस्पद्र्धा और लागत कम करने के लिए बनने वाली नीतियों के कारण असंतुष्टि का पैदा होना स्वाभाविक है। इसलिए हमें प्रवासी श्रमिकों के रोजगार और स्वास्थ्य पर समान रूप से ध्यान देने की जरूरत है। राष्ट्रीय स्तर पर बेरोजगारी, गरीबी और रोजगार के उचित अवसरों में कमी गंभीर मुद्दे हैं। साल 2017-18 में भारत के कुल 46.5 करोड़ श्रमिकों में से लगभग 91 प्रतिशत, यानी 42.2 करोड़ श्रमिक असंगठित क्षेत्रों में कार्यरत थे। वर्ष 2017 के आर्थिक सर्वे में अनुमान लगाया गया था कि इनमें से 13.9 करोड़ बार-बार ठिकाना बदलने वाले श्रमिक थे। प्रवासी श्रमिक ग्रामीण क्षेत्रों के स्थाई निवासी होते हैं, लेकिन साल का अधिकतर समय शहरों में बिताते हैं, जहां पर उन्हें नियमित आमदनी नहीं हो पाती। उनका कोई केंद्रीय निबंधन नहीं होता, जबकि अंतरराज्यीय प्रवासी कर्मकार (नियोजन का विनियमन और सेवा शर्त) अधिनियम, 1979 मौजूद है। प्रवासी श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा और कल्याण को बढ़ावा देने के लिए संसद में एक विधेयक पेश किया गया है, जिसका नाम व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यस्थल स्थिति विधेयक, 2019 है। इसमें 1979 के अधिनियम सहित सभी 13 श्रमिक कानूनों को मिलाकर एक कानून बनाने का प्रस्ताव रखा गया है।
कोविड-19 के कारण लगे लॉकडाउन से कृषि, आपूर्ति शृंखला, खाद्य व पोषण सुरक्षा पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा है। पंजाब, हरियाणा, तेलंगाना, महाराष्ट्र जैसे कृषि-प्रधान राज्यों में श्रमिकों की कमी पड़ने लगी है। साफ है, कोरोना के हॉटस्पॉट बन चुके शहरी क्षेत्रों में मौसमी श्रमिकों की कमी होगी और निर्माण व उत्पादन के क्षेत्रों में आर्थिक क्षति पहुंचेगी। ऐसे श्रमिकों के लिए ‘एक राष्ट्र, एक राशनकार्ड’ की नीति काफी लाभकारी साबित होगी। इस कार्डधारक को अपने गृह क्षेत्र के बाहर भी कोटे का अनाज लेने में मदद मिलेगी। इस योजना का क्रियान्वयन मार्च, 2021 तक पूरा हो जाएगा और इससे देश के लगभग 67 करोड़ लोग लाभान्वित होंगे। 
प्रवासी श्रमिकों की आमदनी और भोजन से जुड़ी समस्याओं के निराकरण के लिए कई मांगें उठाई जा रही हैं। केंद्र सरकार ने विषय की गंभीरता को देखते हुए प्रवासी श्रमिकों पर पड़ने वाले प्रभाव को कम करने के लिए कई आर्थिक नीतियों की घोषणा की है। 14 मई को हुई वित्त मंत्री की दूसरी प्रेस कॉन्फ्रेंस प्रवासी श्रमिकों, छोटे किसानों और अस्थाई दुकानदारों पर केंद्रित थी। केंद्र सरकार ने राज्यों को अनुमति दी है कि वे प्रवासी श्रमिकों को आश्रय और भोजन-पानी मुहैया करवाने के लिए राज्य आपदा राहत कोष का इस्तेमाल कर सकते हैं।
प्रवासी श्रमिकों के लिए पीपीपी नीति के तहत प्रमुख शहरों में सरकार द्वारा वित्त प्रदत्त हाउसिंग सोसाइटी बनाई जाएगी, जहां उन्हें किराए पर सस्ते घर मिलेंगे। इसी तरह, राज्यों को आठ लाख टन अनाज और 50 हजार टन चना दिया जाएगा, जिसके तहत महीने में हरेक श्रमिक को पांच किलो अनाज और हर परिवार को एक किलो चना दो महीने तक मुफ्त में दिया जाएगा। उम्मीद है, इससे आठ करोड़ मजदूरों को लाभ मिलेगा। संकट की व्यापकता को देखते हुए कई अभिनव उपाय भी सुझाए गए हैं। इनमें 50 लाख से अधिक अस्थाई दुकानदारों के लिए पांच हजार करोड़ रुपये की ऋण सुविधा शुरू करने जैसे कदम शामिल हैं। हालांकि, इन पर अमल करने के दौरान राज्यों की असामान्य स्थिति, महामारी की तीव्रता, सुविधाओं की उपलब्धता, मानव संसाधन की कमी जैसे पहलुओं पर गंभीरता से विचार करना होगा।
देश में प्रवासी श्रमिकों पर ध्यान केंद्रित करने की जो अनिवार्यता आज पैदा हुई है, उसकी जड़ में कोरोना महामारी का असमान सामाजिक-राजनीतिक असर है। इसलिए राज्यों और केंद्र को सामाजिक सुरक्षा तंत्र को मजबूत व निबंधन की प्रक्रिया को सुलभ बनाकर विकास में साझेदार जैसी एकजुटता से काम करने की जरूरत है। यह एक बड़ा लक्ष्य है और इसके लिए उन नौ बिंदुओं पर आधारित रणनीति अपनाने की जरूरत है, जिन्हें इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट रिसर्च, मुंबई के प्रोफेसर डॉ चंद्रशेखर और सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च, नई दिल्ली की अध्येता मुक्ता नायक ने चिह्नित किए हैं। ये बिंदु हैं- एक, राज्यों के बीच बेहतर तालमेल। दूसरा, राज्य सरकारों द्वारा स्वास्थ्य बीमा, विद्यालय नामांकन और जन-वितरण प्रणाली जैसी सुविधाओं में राज्य और जिलों के भीतर पोर्टेबिलिटी लागू करना, जिससे अंतत: यह सुविधा राष्ट्रीय स्तर पर भी उपलब्ध हो। तीसरा, राज्य सरकारों द्वारा ‘माटी की संतान’ जैसे तर्कों को त्यागना, क्योंकि इनसे संविधान के अनुच्छेद- 19 के तहत मिली देश के किसी भी हिस्से में काम करने और बसने की स्वतंत्रता को आघात पहुंचता है। चौथा, सरकारी विद्यालयों में अपनी आधिकारिक भाषाओं को अनिवार्य विषय बनाने का हठ छोड़ना। पांचवां, प्रत्येक राज्य में भवन एवं अन्य सन्निर्माण कर्मकार (बीओसीडब्ल्यू) अधिनियम जैसे कानूनों का लेखा-जोखा देश की सभी अनुसूचित भाषाओं में उपलब्ध कराया जाना। छठा, राज्य सरकारों द्वारा प्रवासी श्रमिकों, विशेषकर निर्माण-श्रमिकों की पात्रता की आधिकारिक निशानदेही करना। सातवां, पंचायत स्तर पर कागजी प्रक्रिया को तेज कर प्रवास के राज्य में होने वाले निबंधन को आसान बनाया जाना। आठवां, प्रवासियों के लिए रेंटल मार्केट व आवास तथा कामगार महिलाओं-पुरुषों के लिए हॉस्टल बनाया जाना। और नौवां, सामाजिक सुरक्षा संहिता प्रस्ताव, 2019 को अधिक प्रभावी बनाने के लिए सुव्यवस्थित किया जाना।
साफ है, तेज और प्रभावी कदम उठाने के लिए हमें प्रवासी श्रमिकों की समस्या को व्यापक रूप में देखना होगा। कोरोना महामारी के कारण हो रही भौतिक क्षति के बाद यह आवश्यक हो गया है कि सभी हिस्सेदार मिलकर वर्तमान चुनौतियों का सामना करें और भविष्य की अपेक्षाओं पर खरे उतरें। हम होंगे कामयाब!
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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