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तमिल भूमि पर भाजपा की उलझन (हिन्दुस्तान)

पिछले हफ्ते तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ई पलानीसामी फिर से मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार का टिकट पाने में सफल रहे। तमिलनाडु में अगले वर्ष विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। बेशक उन्हें अन्नाद्रमुक के 90 फीसदी विधायक दल का समर्थन हासिल है, लेकिन उनके प्रतिद्वंद्वी और कैबिनेट में दूसरे नंबर के कद्दावर नेता ओ पन्नीरसेल्वम भी इस क्रम में अच्छी-खासी सौदेबाजी करने में कामयाब रहे। पन्नीरसेल्वम की मुख्य मांग थी, एक ऐसी रणनीतिक कमेटी का गठन, जो पार्टी का कामकाज देख सके। वह न सिर्फ इस कमेटी में अपने समर्थकों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिलाने में सफल रहे, बल्कि चुनाव में अपनी पसंद के कम से कम 50 फीसदी उम्मीदवारों को भी अब वह उतार सकेंगे।
मगर पलानीसामी का सिरदर्द तो अभी शुरू हुआ है। उन्हें चुनाव हारने की सूरत में पार्टी पर नियंत्रण बनाए रखने की रणनीति पर तो सोचना ही होगा, यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उनकी उम्मीदवारी को सहयोगी दलों का भी साथ मिले, क्योंकि उनके समर्थन के बिना विपक्ष की चुनौतियों का वह शायद ही सामना कर सकेंगे। जे जयललिता के बाद अन्नाद्रमुक पार्टी उनके नेतृत्व में उस तरह मजबूत नहीं रह सकी है। जयललिता ने तो राज्य पर एकछत्र राज किया था और 2014 का लोकसभा चुनाव अपने बूते लड़ा था। भले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनके अच्छे रिश्ते थे, लेकिन उन्होंने भाजपा के साथ कोई गठबंधन नहीं किया। यदि त्रिशंकु संसद बनी, तो उन्होंने खुद को प्रधानमंत्री पद का दावेदार भी घोषित किया था। तब वह रणनीति कामयाब रही थी और सूबे की 39 लोकसभा सीटों में से 37 पर उन्हें जीत मिली। भाजपा ने अपना अलग गठबंधन बनाया था, लेकिन वह चुनाव में बुरी तरह नाकाम रहा था। 
जयललिता के निधन के बाद, 2019 के संसदीय चुनाव में भाजपा ने अन्नाद्रमुक का नेतृत्व मान तो लिया, मगर पांच लोकसभा सीटों पर लड़ने के बाद भी उसे सफलता नहीं मिली। अब वह सब कुछ बदलने को उत्सुक है, और इसीलिए आगामी विधानसभा चुनाव में अपनी शर्तों पर गठबंधन बनाने की पुरजोर कोशिश कर रही है। अपने कार्यकर्ताओं को उत्साहित करने के लिए यह दावा भी कर रही है कि राज्य में उसके लिए काफी ज्यादा उम्मीदें हैं।
राज्य में भाजपा के अलावा पीएमके, एमडीएमके और टीएमसी अन्नाद्रमुक की मुख्य सहयोगी पार्टियां हैं। इनमें से भाजपा सबसे शक्तिशाली घटक है, क्योंकि केंद्र की चाबी उसी के पास है। ऐसे में, अन्नाद्रमुक शायद ही उसका विरोध कर सकती है। मगर उसे अपने रिश्ते को परिभाषित करने के लिए एक बेहतर रणनीति बनानी होगी। ऐसा इसलिए, क्योंकि भाजपा को उत्तर भारत की एक ऐसी पार्टी के रूप में देखा जाता है, जो अपने क्षेत्रीय सहयोगी पर दबदबा हासिल करना चाहती है। ऐसे में, छोटी-सी गलती से भी मतदाताओं के सामने अन्नाद्रमुक की स्थिति असहज हो सकती है। मगर विकास संबंधी कामों में केंद्र के साथ के लिए उसे इस पार्टी की जरूरत भी है।
पलानीसामी के लिए बुरी खबर यह है कि इन पंक्तियों के लिखे जाने तक भाजपा ने उनकी उम्मीदवारी का समर्थन नहीं किया था। राज्य के भाजपा नेताओं ने कहा है कि अन्नाद्रमुक ने अपना मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित किया है, एनडीए गठबंधन का नहीं। जाहिर है, भाजपा अपने विकल्पों का विस्तार करना चाहती है। वह पीएमके, टीएमसी, डीएमडीके और रजनीकांत की राजनीतिक पार्टी के साथ, जिसका अभी तक गठन नहीं हुआ है, गठजोड़ कर सकती है। मगर ये कोई आसान विकल्प नहीं हैं। पीएमके अंबुमणि रामदास के रूप में अपना मुख्यमंत्री-उम्मीदवार उतारना चाहती है। चूंकि इस पार्टी के पास छह से सात फीसदी वोट हैं, लिहाजा वह सौदेबाजी कर सकती है। वहीं, रजनीकांत ने बेशक मुख्यमंत्री की अपनी दावेदारी खारिज कर दी है, लेकिन चुनाव महज छह महीने दूर हैं और उन्होंने अभी तक अपने पत्ते नहीं खोले हैं, जिसके कारण भाजपा की मुश्किलें बढ़ी हुई हैं। डीएमडीके की भी अपनी समस्याएं हैं। भले ही सर्वश्रेष्ठ दिनों में इस पार्टी ने 10 फीसदी से अधिक वोट हासिल किए हैं, लेकिन अभी यह लोकप्रियता के मामले में जमीन पर है। इसके नेता विजयकांत बीमार हैं और उनका अस्पताल आना-जाना लगा रहता है। इसीलिए अन्नाद्रमुक के साथ गठबंधन करना भारतीय जनता पार्टी के लिए भी सबसे अच्छा दांव है। मगर बातचीत की मेज पर आने से पहले वह अन्नाद्रमुक के मुख्यमंत्री पद के दावेदार को समर्थन देने के नाम पर उसे अपनी शर्तों पर राजी करना चाहती है।
अन्नाद्रमुक पार्टी भी, जो अब प्रभावी रूप से पलानीसामी के नेतृत्व में है, अपनी ताकत दिखाने की कोशिश में है। उसके एक वरिष्ठ नेता ने घोषणा की है कि जो दल पलानीसामी का नेतृत्व मानेंगे, सिर्फ वही गठबंधन के लिए संपर्क करें। पार्टी नेतृत्व अच्छी तरह से जानता है कि उसके कैडर और समर्थक किसी बाहरी का वर्चस्व कतई स्वीकार नहीं करेंगे। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भाजपा परोक्ष रूप से अन्नाद्रमुक पर हावी होने की कोशिश करेगी। मगर इसमें सफलता संदिग्ध है, क्योंकि पलानीसामी व पन्नीरसेल्वम आपसी समझौतों से एकमत हो गए हैं। दोनों नेताओं को एक-दूसरे की जरूरत है, क्योंकि दोनों का पार्टी के परंपरागत वोट-बैंक पर पूरा अधिकार नहीं है। पलानीसामी गोंडर समुदाय से ताल्लुक रखते हैं, जिसका राज्य के पश्चिमी हिस्से में मजबूत आधार है, जबकि पन्नीरसेल्वम थेवर समुदाय से, जिसकी सूबे के दक्षिणी हिस्से में दमदार उपस्थिति है। ये दोनों समुदाय अन्नाद्रमुक की रीढ़ हैं और इनमें से कोई भी अगर खिसका, तो पार्टी को काफी नुकसान होगा। ये दोनों नेता शशिकला नटराजन से आने वाले किसी आसन्न खतरे को टालने के लिए भी साथ रहना चाहेंगे, जिनके बारे में कहा जा रहा है कि वह जनवरी में जेल से रिहा हो सकती हैं।
साफ है, पलानीसामी और पन्नीरसेल्वम, दोनों राजनीतिक सच्चाई को समझते हैं, इसीलिए निजी स्वार्थ के तहत साथ-साथ रहेंगे। वैसे, राज्य में चुनावी अंकगणित और वोटरों की प्रकृति ऐसी रही है कि जयललिता और करुणानिधि जैसे मजबूत नेता भी विधानसभा चुनावों में गठबंधन किया करते थे। मगर तब एकमात्र अंतर यह था कि गठबंधन का नेतृत्व करने के लिए वे पर्याप्त ताकतवर थे। आज बदली परिस्थितियों में कमान पर किसी और का कब्जा भी हो सकता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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