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तमिल भूमि पर अयोध्या की गूंज (हिन्दुस्तान)

जब अयोध्या नगरी भव्य राम मंदिर के निर्माण-समारोह के लिए तैयार हो रही है, तब तमिलनाडु में इसका असर जानना दिलचस्प होगा, जहां अगले साल विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। यहां पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस), भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), विश्व हिंदू परिषद (विहिप) और बजरंग दल जैसे भगवा परिवार के तमाम सदस्य अयोध्या में राम मंदिर-निर्माण के लिए दान, पूजन व निर्माण-सामग्री और समर्थन जुटा रहे हैं। 31 जुलाई को विहिप और बजरंग दल की राज्य इकाइयों ने श्रीरंगम रंगनाथन मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना की। इसके बाद एक समारोह भी आयोजित किया गया, जहां कावेरी और कोल्लीडम नदी के तटों से रेत इकट्ठा की गई, रेशमी कपड़े में उसे बांधा गया, उसमें स्थानीय मंदिर के प्रसाद डाले गए और एक पार्सल में उसे अयोध्या भेजा गया। इसी तरह, मुख्यमंत्री ई पलानीसामी के गृहनगर सलेम से आरएसएस और भाजपा की इकाइयों ने 17.4 किलोग्राम की चांदी की ईंटें अयोध्या भेजी हैं। कुंभकोणम में मंदिरों और महामहम टैंक से एकत्र ‘तीर्थम’ (पवित्र जल) भी भेजा गया है।
आम जनमानस से अपील करने के अलावा विहिप ने राज्य के अपने सभी समर्थकों को खासतौर से निर्देश दिया है कि वे 5 अगस्त को दीप जलाएं और राम मंत्र का जाप करें। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल जब अपने फैसले से अयोध्या में राम मंदिर बनाने का रास्ता साफ कर दिया था, तब राम सेना ने ईंट जुटाने के अपने अभियान को जश्न बना दिया था। उस वक्त अयोध्या के कारसेवापुरम स्थित विहिप मंदिर कारखाने के लिए रामेश्वरम से 12 ईंटों का एक सेट भेजा गया था।
इस साल फरवरी में कोयंबटूर के भारत सनातन धर्म सेवा ट्रस्ट ने भी सोने की ईंटें अयोध्या भेजी थीं। इसके सदस्यों का कहना था कि इन ईंटों का इस्तेमाल मंदिर की नींव में हो सकता है। असल में, इन सभी भगवा समूहों ने रामनवमी के दिन 2 अप्रैल को 1,100 ईंट एकत्र करने के लिए एक राज्यव्यापी जुटान की योजना बनाई थी, लेकिन कोरोना महामारी और उसके बाद लॉकडाउन ने उनकी इस मंशा पर पानी फेर दिया। विहिप 1989 में तमिलनाडु में खासा सक्रिय था, जब राम जन्मभूमि आंदोलन चरम पर था। मगर भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने तमिलनाडु को किनारे कर दिया और उनकी रथयात्रा आंध्र प्रदेश से गुजरी। फिर भी, भगवाधारियों ने द्रविड़ गढ़ में समर्थन जुटाने की हरसंभव कोशिश की। विहिप की राज्य इकाई ने राम शिलान्यास कार्यक्रम के लिए कार्यकर्ता जुटाए और राज्य के तमाम हिस्सों के गांवों से पक्की ईंटें एकत्र करके अयोध्या भेजी थीं।
बेशक तमिलनाडु विहिप के मंदिर अभियान में उत्साहपूर्वक भाग लेता रहा है, मगर तमिल गहरे धार्मिक होने के बावजूद धर्म और राजनीति के घालमेल से बचते रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता का दक्षिणपंथी राजनीति के प्रति नरम रुख होने के बावजूद वोट के लिहाज से भाजपा को फायदा नहीं हुआ। इसकी एक वजह यह है कि करुणानिधि और जयललिता जैसे कद्दावर द्रविड़ नेताओं ने यहां के लोगों की धार्मिक रुचि को बखूबी पहचाना और उस हिसाब से उन्होंने अपने-अपने वोट काटे, लेकिन भाजपा या कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियों को इसका कतई लाभ नहीं लेने दिया।
फिर भी, भगवा परिवार तमिलनाडु की राजनीति में अपने पैर जमाने के प्रयास करता रहा है। विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही ये कोशिशें फिर तेज हो गई हैं। सुपरस्टार रजनीकांत के राज्य के चुनावी मैदान में उतरने के वादे ने भाजपा-आरएसएस समर्थकों को उत्साहित कर दिया था। ‘आध्यात्मिक राजनीति’ करने का उनका एलान भगवा दल के लिए एक अच्छी खबर थी, लेकिन इस बाबत रजनीकांत द्वारा जमीन पर कोई सक्रियता न दिखाने से उनको निराशा हाथ लगी है। दिलचस्प बात यह है कि यहां हिंदुत्व की राजनीति की जड़ें, जिसमें राम जन्मभूमि आंदोलन एक प्रमुख प्रेरक है, अनुसूचित जातियों के इस्लाम में सामूहिक धर्मांतरण में निहित हैं। यह घटना करीब चार दशक पूर्व तिरुनेलवेली जिले के मीनाक्षीपुरम में हुई थी। सन 1981 में अनसूचित जाति के करीब 150 परिवारों ने इस्लाम कुबूल कर लिया था। उन्होंने ऊंची जातियों के हिंदुओं की हिंसा और भेदभाव से खुद को बचाने के लिए ऐसा किया था।
बडे़ पैमाने पर धर्मांतरण की इस खबर ने पूरे देश को चौंका दिया था। जाहिर है, देश में धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर बहस छिड़ गई और सरकार को मजबूरन धर्मांतरण विरोधी कानून लाना पड़ा। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने यह पता करने के लिए जांच के आदेश दिए कि इस धर्म-परिवर्तन में कहीं विदेशी धन का उपयोग तो नहीं किया गया है? भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने भी स्थिति का जायजा लेने के लिए मीनाक्षीपुरम का दौरा किया था। हालांकि, यह मुद्दा तब विवादास्पद हो गया, जब यह दावा किया गया कि खाड़ी के देशों से पेट्रो-डॉलर का इस्तेमाल गरीबों के धर्मांतरण में किया जा रहा है। इसके बाद विहिप ने पुन:धर्मांतरण के लिए कई कार्यक्रम आयोजित किए, क्योंकि भगवा परिवार की नजर में यह घटना देश में हिंदुओं को एकजुट करने के उसके उद्देश्य के खिलाफ थी।
चूंकि सांस्कृतिक रूप से एक बड़ी तमिल आबादी मुरुगन या कार्तिकेय को प्रमुख देवता मानती है, ऐसे में, सवाल यह है कि तमिलनाडु में राम का आह्वान कितना प्रभावी होगा? सूबे में खास-खास राम मंदिर ही हैं, जैसे कि रामेश्वरम का मंदिर। कहा जाता है, लंका विजय के बाद वापस लौटते वक्त राम ने तमिलनाडु में कई जगहों पर प्रायश्चित करते हुए तपस्या की, क्योंकि उन्होंने रावण का वध किया था, जिसे ब्राह्मण माना जाता था। कंब रामायण  के मुताबिक, भगवान राम ने सीता तक पहुंचने के लिए रामेश्वरम से ही लंका के लिए पुल बनाया था। 
इसी तरह, सलेम जिले में एक राम मंदिर है, जहां अयोध्या के राजा के रूप में उनके राज्याभिषेक समारोह को दर्शाया गया है। नागपट्टिनम जिले के प्वॉइंट कैलिमेरे में ‘रामर पदम’ या राम के पैरों के निशान स्थानीय लोग द्वारा पूजे जाते हैं। कहते हैं कि राम वहां समुद्र के उस पार स्थित रावण का महल देखने गए थे। ऐसे में, यही कयास है कि आगामी चुनाव में इन धार्मिक मान्यताओं को वोट में बदलने के जमकर प्रयास किए जाएंगे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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