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डीजल का महंगा होना (हिन्दुस्तान)

पेट्रोल, डीजल की कीमतों का निरंतर 18 दिनों से बढ़ते जाना जितना ध्यान खींच रहा था, उससे कहीं ज्यादा डीजल की कीमत ने चौंका दिया। दिल्ली क्षेत्र में डीजल अब पेट्रोल से लगभग 12 पैसे महंगा हो गया है। आखिर ऐसा क्यों हुआ? इसका सबसे बड़ा कारण टैक्स का असमान होना है। देश में आमतौर पर पेट्रोल अभी भी डीजल से महंगा है, लेकिन दिल्ली में डीजल पर अधिक टैक्स होने के कारण उसकी कीमत पेट्रोल से आगे निकल गई है। तत्काल पहल करनी चाहिए, ताकि डीजल और पेट्रोल के बीच अंतर बना रहे। हमें यह ध्यान रखना होगा कि किसी समय डीजल और पेट्रोल के बीच 20 से 30 रुपये का भी अंतर हुआ करता था। यह अंतर इसलिए था, क्योंकि डीजल का उपयोग आमतौर पर सिंचाई, सवारी या माल ढोने वाले भारी वाहनों में होता है। डीजल की कीमतों को सरकारें संभालती थीं, क्योंकि डीजल की कीमत बढ़ने का सीधा असर किसानों व महंगाई पर पड़ता था। इन दो ईंधनों के बीच अंतर बने रहने में ही अर्थव्यवस्था की भलाई है। यह नहीं भूलना चाहिए कि जो निजी यात्री वाहन डीजल से चलते हैं, उनकी कीमत भी पेट्रोल वाले वाहनों से कहीं अधिक होती है, इसलिए भी पेट्रोल और डीजल की कीमतों का समान हो जाना अपनी ही परिवहन या वाहन नीति के विरुद्ध है।
यह भी सोच लेना चाहिए कि दिल्ली में ज्यादा कीमत रखने से ग्राहक उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों की ओर रुख कर सकते हैं, इससे दिल्ली को ही राजस्व का नुकसान उठाना पड़ेगा। दिल्ली और पड़ोसी उत्तर प्रदेश के बीच आठ रुपये का अंतर है। अत: जहां यह प्रयास करना चाहिए कि पेट्रोल और डीजल की कीमतों के बीच तार्किक अंतर रहे, वहीं यह भी देखना होगा कि राज्यवार कीमतों में ज्यादा अंतर नहीं हो। भारत को पूरी एक आर्थिक इकाई के रूप में ही देखते हुए चलना चाहिए। उद्योग जगत में 10 और 20 पैसे का भी बड़ा महत्व होता है, अत: राज्यवार कीमतों में अंतर 50 पैसे या एक रुपये से ज्यादा रखना ठीक नहीं है। लोगों को सरकारों का कर-नियोजन समझ में नहीं आता, लेकिन वह यह देखकर परेशान जरूर होते हैं कि दिल्ली में पेट्रोल 79.76 रुपये, तो मुंबई में 86.54 रुपये प्रति लीटर कैसे है? तेल कंपनियों की ओर भी सरकार की निगाह जानी चाहिए। 82 दिनों तक कीमतों को स्थिर रखने के बाद ये कंपनियां 7 जून से लगातार कीमतों को बढ़ाती चली जा रही हैं और अभी आने वाले दिनों में कीमतें बढ़ने की आशंका है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल कीमतों में उछाल शुरू हो चुका है। सोचना होगा, मात्र 18 दिन में ईंधन की कीमतों में करीब 10 रुपये की बढ़त सुधार की बाट जोहती अर्थव्यवस्था के लिए ठीक नहीं है। जो सब्सिडी उद्योग जगत को कोरोना काल में दी जा रही है, कहीं ऐसा न हो कि पेट्रोल और डीजल के जरिए आर्थिक मदद का एक बड़ा हिस्सा लोगों से छिन जाए। 
कोरोना के समय में सरकार के लिए राजस्व जरूरी है, लेकिन वह तर्कपूर्ण होना चाहिए। तेल कंपनियों को लागत के हिसाब से कीमत तय करने की ताकत दी गई है, लेकिन कीमतें यूं लगातार भी न बढ़ें कि रोजमर्रा का बजट ही बिगड़ने लगे। तेल कपंनियों को ध्यान रखना चाहिए कि मुनाफे में तेल बेचना ही उनका काम नहीं है। उन्हें देश की  अर्थव्यवस्था की स्थिरता व मजबूती के बारे में भी सोचना होगा।

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