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जीवन और शिक्षा की अग्नि परीक्षा (हिन्दुस्तान)

इंजीनिर्यंरग और मेडिकल की प्रवेश परीक्षाओं का मुद्दा बहुत गरमाया हुआ है। जून 2020 में होने वाली जेईई (मेन) और नीट 2020 की परीक्षाएं कोविड के बढ़ते प्रकोप के कारण स्थगित होती रही हैं। राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) द्वारा घोषित कार्यक्रम के अनुसार, जेईई मेन की परीक्षाएं 1 से 6 सितंबर तक, और नीट 2020 की परीक्षा 13 सितंबर को आयोजित होनी है। इन परीक्षाओं को स्थगित कराने के लिए कुछ विद्यार्थियों और अभिभावकों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, किंतु  कोर्ट ने 17 अगस्त के अपने फैसले में उनकी याचिका को खारिज कर दिया।
जाहिर है,  इन दोनों परीक्षाओं का हमारे शिक्षा जगत में बहुत महत्व है, क्योंकि जेईई मेन परीक्षा द्वारा आईआईटी व एनआईटी संस्थानों में और नीट द्वारा प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश का मार्ग प्रशस्त होता है। देश के लाखों मध्यवर्गीय परिवार अपने बच्चों का दाखिला इन नामचीन संस्थानों में हो पाने का सपना देखते हैं, क्योंकि इन संस्थानों में दाखिले का मतलब है, भविष्य में आर्थिक समृद्धि और सामाजिक प्रतिष्ठा के अवसर प्राप्त होना। आज भारत और भारत के बाहर ऐसे हजारों उद्यमी और सीईओ मिल जाएंगे, जो अरबपति बन गए। इनमें से ज्यादातर आईआईटी और एनआईटी के पूर्व छात्र रहे हैं। हमारे देश में आईआईटी, एनआईटीए एम्स, आईआईएम आदि ऐसे ब्रांड बन गए हैं, जिनमें पढ़कर कोई आसमान चूमती ऊंचाइयों पर पहुंच सकता है।
जेईई (मेन) परीक्षा में 9.53 लाख और नीट 2020 में 15.97 लाख विद्यार्थी पंजीकृत हुए हैं। परीक्षाओं को फिर स्थगित कराने के लिए विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों का तर्क है कि कोविड-19 का प्रकोप अपने उभार पर है और रोजाना संक्रमण के 60,000 से अधिक मामले आ रहे हैं। कुल संक्रमित लोगों की तादाद भी 32 लाख तक पहुंच गई है। उनका कहना है कि परीक्षाएं होती हैं, तो 25 लाख विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों की जान को खतरा बना रहेगा। परीक्षाओं का विरोध करने वाले लोग यह भी कह रहे हैं कि देश के 11 राज्यों में भयंकर बाढ़ आई हुई है, जिसमें सैकड़ों लोगों की मौत हो गई है। ऐसी स्थिति में कम से कम 11 राज्यों, जैसे बिहार, असम, कर्नाटक, राजस्थान और महाराष्ट्र में परीक्षार्थियों का घर से निकलकर परीक्षा केंद्रों तक पहुंचना खतरे से खाली नहीं होगा।
आज सोशल मीडिया का दौर है। जेईई (मेन) और नीट 2020 की परीक्षाओं का विरोध करने वाले विद्यार्थियों ने पिछले सप्ताह ट्विटर पर कई हैशटेग बनाकर ‘पोस्टपोन जीनीट’ अभियान चलाया, जिस पर लाखों ट्वीट पोस्ट किए गए। ट्विटर पर लाखों पोस्ट चलाए जाएं और हमारे राजनेताओं का ध्यान उस पर न जाए, यह तो नामुमकिन है। इसीलिए कांग्रेस सहित अनेक दल और मुख्यमंत्री एकजुट हो गए हैं। स्वीडन की पर्यावरणविद युवानेत्री ग्रेटा थुनबर्ग भी परीक्षा स्थगन को समर्थन दे चुकी हैं।
विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों में एक वर्ग ऐसा भी है, जो इन परीक्षाओं के स्थगन का समर्थन नहीं करता है। उनका कहना है कि कोविड-19 का खतरा तो हाल-फिलहाल जाने वाला नहीं है, तो फिर परीक्षाओं को कब तक स्थगित किया जा सकता है? क्या संक्रमण के खतरे से बचने के लिए विद्यार्थियों का करियर बर्बाद किया जा सकता है? जो परीक्षाएं जून/जुलाई में होती थीं, अगर सितंबर, 2020 में भी होती हैं, तो आईआईटी/एनआईटी और मेडिकल कॉलेजों का नया सत्र नवंबर, 2020 से पहले शुरू नहीं हो पाएगा। उनका कहना है कि अगर ये परीक्षाएं दो माह के लिए फिर से स्थगित की जाती हैं, तो क्या गारंटी है कि नवंबर 2020 तक कोविड की स्थिति बेहतर हो ही जाएगी?
सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुना दिया है, किंतु केंद्र सरकार के सामने दुविधा है। जेईई (मेन) और नीट 2020 की परीक्षाओं को लेकर चल रही रस्साकशी हमारी वर्तमान मन:स्थिति, सोचने के तरीके और भविष्य के प्रति बढ़ रही आशंकाओं का एक लक्षण है, जिसे कोविड ने पैदा किया है। शायद हम यह तय नहीं कर पा रहे कि कोविड-19 की स्थिति आज ज्यादा खतरनाक है या यह भविष्य में ज्यादा खतरनाक होगी? वैश्विक महामारी ने सभी नीति-निर्माताओं, राजनेताओं, अर्थशास्त्रियों, वैज्ञानिकों और व्यवसाय जगत के नेताओं को भविष्य के बारे में कोई भी भविष्यवाणी करने या स्पष्ट पूर्वानुमान लगाने के मामले में लाचार बना दिया है। परीक्षा स्थगन की मांग करने वाले लोग यही सोचते होंगे कि शायद दो महीने बाद कोविड-19 की स्थिति कुछ बेहतर हो जाए। वे लोग करियर और जिंदगी के बीच दूसरा विकल्प चुन रहे हैं, यानी उनके लिए करियर उतना महत्वपूर्ण नहीं, जितनी जिंदगी है।
जरा सोचिए, दुनिया के अन्य देश ऐसी स्थिति में राष्ट्रीय स्तर की बड़ी प्रवेश परीक्षाओं का किस तरह संचालन कर पा रहे हैं? वैसे तो दुनिया के सभी देशों में नामी-गिरामी संस्थानों में प्रवेश के लिए राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर परीक्षाएं होती हैं, किंतु चीन की गाओकाओ परीक्षा के इस वर्ष के अनुभव से कुछ जानकारी मिलती है कि वहां क्या भारत की तरह ही मुश्किलें आई थीं और उनका समाधान कैसे ढूंढ़ा गया? इस साल चीन की बहुचर्चित गाओकाओ परीक्षा 8-9 जुलाई को संपन्न हुई थी, जिसमें 1 करोड़, 10 लाख परीक्षार्थी बैठे थे। उन दिनों चीन में कोविड की स्थिति भारत की आज की स्थिति से थोड़ी बेहतर थी। फिर भी चीन ने इस परीक्षा के लिए भारी तैयारियां कीं और विस्तृत दिशा-निर्देश भी जारी किए थे। चीन ने गाओकाओ के लिए जो उल्लेखनीय तैयारी की, उनमें सभी 1 करोड़ 10 लाख परीक्षार्थियों के स्वास्थ्य पर परीक्षा तिथि से दो सप्ताह पूर्व तक नजर रखने के लिए स्वास्थ्य निरीक्षक नियुक्त करना शामिल है। करीब 10 लाख परीक्षा निरीक्षकों ने इस परीक्षा को संचालित किया था। चीन में बाकी सब वही तरीके अपनाए गए, जो भारत में अपनाए जाने हैं। इसका मतलब है कि करियर और जीवन, दोनों को बचाते हुए परीक्षाएं संचालित करना मुमकिन है।
युवा छात्रों के करियर और जीवन को बचाने की दुविधा हमारे सामने खड़ी है। हमें दोनों को बचाना जरूरी है, किंतु आज के हालात में करियर से ज्यादा जीवन को बचाने की चिंता करनी चाहिए। हमें कोई न कोई मध्य-मार्ग निकालना होगा। फिलहाल केंद्र सरकार कोई भी फैसला करे, जोखिम हर हाल में है और इसमें राजनीतिक नफा-नुकसान भी देखा जाएगा। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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