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जापानियों की जिजीविषा से सीखें (हिन्दुस्तान)

खबर बिहार से आई है। वहां के कुछ गांवों में ‘कोरोना माई’ का पूजन शुरू हो गया है। हिंदू और मुस्लिम महिलाएं समान श्रद्धा से इस पूजन-प्रक्रिया में शामिल होती हैं। क्या पूजने मात्र से कोरोना छू-मंतर हो जाएगा?
बदलते हालात का इशारा साफ है। हम भारतीयों को हर हाल में अपना रंग-ढंग बदलना होगा। इससे न केवल महामारी से हम पार पा सकेंगे, बल्कि खुद को इतना अनुशासित कर पाएंगे कि देश की कार्य-संस्कृति ही बदल जाएगी। यहां मैं उन दो देशों का उदाहरण देना चाहूंगा, जिनकी चर्चा कोरोना-काल में हमारे यहां भी बार-बार हुई है।
पहला है, जापान। जापान ने आपातकाल जरूर घोषित किया, पर लंबे लॉकडाउन से परहेज रखा। वहां के लोग पहले से सार्स और स्वाइन फ्लू की मारक क्षमता से परिचित थे। उन्होंने बिना किसी हुक्मनामे के खुद को घर में बंद कर दिया। मास्क पहन लिए। शारीरिक दूरी का पालन करना शुरू कर दिया। और तो और, जोर से बोलने से भी परहेज करने लगे। नतीजा सामने है। कोरोना वहां सिमटकर रह गया और अब आपातकाल भी उठा लिया गया है।
ध्यान दें, भारत में संसार की सबसे अधिक नौजवान आबादी बसती है, जबकि जापान में बुजुर्गों की तादाद ज्यादा है। हम जानते हैं कि कोरोना उम्रदराज लोगों के लिए अधिक घातक साबित होता है। इसके बावजूद जापानियों ने स्व-अनुशासन के जरिए खुद को न केवल बचाया, बल्कि सरकारी घाटे को भी बेलगाम होने से रोका। जापानी व्यवस्था को दोष देने की बजाय खुद को उसका हिस्सा मानते हैं। उन्होंने तमाम घात-प्रतिघातों को इसी गुण के सहारे जीता है। यह अकेला ऐसा देश है, जिसने परमाणु हमला झेला। उस आघात के बाद हिरोशिमा, नागासाकी और उनके पास-पड़ोस के इलाकों में विकिरण की वजह से कैंसर, विकलांगता और तमाम रोग घर कर गए थे, पर जापानियों ने हिम्मत नहीं हारी।
बरसों पहले वहां का एक उपन्यास पढ़ा था। उसमें उपन्यासकार ने एक छोटे परिवार का जिक्र किया था, जिसका मुखिया कैंसर का शिकार हो गया था। उसकी पत्नी अस्पताल में अक्सर उससे मिलने जाती और वहां देखती कि कैंसर के रोगी किस तरह मिल-जुलकर एक-दूसरे का हौसला बढ़ाते हैं। उसका पति जब और गंभीर हो गया, तो उसे दूसरे वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया। वहां ऐसे लोग थे, जिनके अंग काटने पडे़ थे। एक दिन जब वह वहां पहुंची, तो उसने उन दुखियारों को उल्लास से सराबोर पाया। उनकी खिड़की के पास एक टहनी थी। उस पर पक्षी ने घोंसला बना रखा था और घोंसले से उस पक्षी का नन्हा बच्चा किसी तरह निकलकर टहनी से गिरने को था। वे सारे लोग उसे वापस घोंसले  में डालने का प्रयास कर रहे थे। ये वे  लोग थे, जिन पर मौत कभी भी झपट्टा मार सकती थी, पर वे एक पक्षी की जिंदगी को बचाने के लिए जी-जान एक किए हुए थे।
उस उपन्यास को पढ़कर मुझे जापानी जिजीविषा समझने में आसानी हुई। बाद की अपनी जापान यात्राओं में मैंने पाया कि वे कितने मेहनती हैं? परमाणु हमला, कैंसर, भूकंप, समुद्री तूफान और कैसी भी महामारी उनका हौसला नहीं डिगा पाती। द्वितीय विश्व युद्ध में बरबाद हो जाने के बावजूद जापान ने बहुत जल्दी खुद को  आर्थिक महाशक्ति बना लेने में कामयाबी हासिल की, क्योंकि जापान की सफलता जापानियों के आचार-व्यवहार में निहित है।
इससे मिलता-जुलता हाल स्वीडन का है। वहां के प्रधानमंत्री स्टीफन लॉफवेन ने कटु आलोचनाएं झेलने के बावजूद देशव्यापी लॉकडाउन नहीं लागू किया। स्वीडन एक ठंडा मुल्क है। माना जाता है कि ऐसी जलवायु में वायरस की मारक क्षमता बढ़ जाती है। स्वीडन में भी 42,000 से ज्यादा लोग चपेट में आए, 4,639 ने जान गंवाई, पर प्रधानमंत्री स्टीफन लॉफवेन अटल रहे। उन्होंने बार-बार कहा कि यह जंग सरकारी पाबंदियों से नहीं, बल्कि जन-जागृति से ही जीती जा सकती है। जन-सहयोग के चलते लॉफवेन जान और माल की हानि को सीमित करने में कामयाब साबित हुए हैं।
इन उदाहरणों के जरिए भारत में सरकार के विरोधी आरोप लगाते हैं कि लंबे लॉकडाउन ने न तो जान की रक्षा की और न माल की। ऐसे लोग भेड़-बकरियों की तरह ठुंसी हुई मेट्रो, बस और पैसेंजर ट्रेन के उन दृश्यों को जान-बूझकर भुला देते हैं, जो वे बचपन से देखते आए हैं। उन्हें दड़बेनुमा मकानों में रहने वाले वे लोग नहीं याद आते, जिनके लिए यह संक्रमण जंगल की आग साबित हो सकता है। धारावी की दुर्दशा इसका उदाहरण है। भारत जैसे देश में, जहां ‘फिजिकल डिस्टेंसिंग’ तो दूर, ठीक से लाइन लगने की भी परंपरा न हो, वहां लॉकडाउन का कोई विकल्प न था।
जापान और स्वीडन की भारत से तुलना करते वक्त कुछ और तथ्यों को भुला दिया जाता है। स्वीडन का शुमार संसार के सबसे ‘सभ्य देशों’ में होता है। वहां के लोग आमतौर पर जब पंक्तियों में खडे़ होते हैं, तो एक-दूसरे पर चढ़ नहीं पड़ते। डेढ़ से ढाई फुट की दूरी वहां के सामाजिक तकाजों में शुमार है। इसे चार से छह फुट करना मुश्किल नहीं था। भारत में, जहां थोड़ी-सी छूट मिलते ही लोग शराब की दुकानों पर टिड्डी दल की तरह टूट पड़ते हों, वहां कुछ दिनों के लिए सरकारी बंदिशें लगाना आवश्यक था। लॉकडाउन में ढील के बाद जिस तरह गांवों में इस महामारी ने पैर पसारने शुरू किए हैं, वह भी इस तर्क को बल देता है।
हालांकि, यह भी सच है कि कोई भी बंदिश लंबे समय तक असरकारी साबित नहीं होती। 130 करोड़ की आबादी को भला कितने दिन बंद करके रखा जा सकता है? यही वह मुकाम है, जहां हम भारतीयों को ‘न्यू नॉर्मल’ के हिसाब से खुद को ढालना होगा। मास्क, शारीरिक सफाई और सामाजिक दूरी आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है। जापान अथवा स्वीडन के लोगों की तरह इसे हमें अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाना होगा। 
 हमें यह भी याद रखना चाहिए कि सरकारी मुमानियतें कभी-कभी बहुत कुछ सिखा भी जाती हैं। मैं आपातकाल का घनघोर विरोधी रहा हूं, पर उस दौरान एक नारा उछला था- ‘हम दो हमारे दो’। लाखों लोगों ने इसके महत्व को समझा और परिवार नियोजन को अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाया। आज पढे़-लिखे और विचारशील लोगों में इसकी स्वीकारोक्ति को लेकर कोई संदेह नहीं। यही नहीं, सती-प्रथा का खात्मा भी ऐसे ही हुआ था। शारदा ऐक्ट ने बाल विवाह पर लगाम लगाई, तो दहेज निरोधक कानूनों ने दहेज प्रथा को भी सामाजिक बुराई के तौर पर प्रतिष्ठापित किया।
ऐसे तमाम और उदाहरण हैं, पर उनके विवरण में जाए बिना इतना तय है कि गेंद अब आम आदमी के पाले में है। हमें अपनी सुरक्षा और तरक्की के मामले में खुद को आत्म-निर्भर बनाना होगा। बदले वक्त का पहला तकाजा यही है।

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