Home करेंट अफेयर्स अखबारों के सम्पादकीय चौथी क्रांति के जरूरी हथियार  (हिन्दुस्तान)

चौथी क्रांति के जरूरी हथियार  (हिन्दुस्तान)

वक्त आ गया है, भारत आत्मनिर्भरता के लिए अपनी तकनीकी बुनियाद तैयार करे। भारत को तकनीकी संप्रभुता की ओर तेजी से बढ़ना होगा। इस बात का क्या मतलब है? आज हम एक ऐसी दुनिया में हैं, जहां 3डी प्रिंटिंग, ऑटोमेशन, इंटरनेट ऑफ थिंग्स और ड्रोन जैसे कनेक्टेड डिवाइस सभी तरह की गतिविधियों के लिए मौलिक हो गए हैं। ये सब चौथी औद्योगिक क्रांति के आधार तत्व हैं। जो देश इन तकनीकों का उपयोग अपने खुद के प्लेटफॉर्म बनाने के लिए नहीं करेगा, उसे समाधान की तलाश में बाहरी शक्तियों पर निर्भर रहना पडे़गा। प्रौद्योगिकीय आत्मनिर्भरता हमारी आर्थिक सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
भारत को अपनी तकनीकी क्षमताओं के निर्माण के लिए अपने निवेश और कोशिशों को तेज कर देना चाहिए। हमें गौर करना चाहिए कि चीन ने अमेरिका के तकनीकी मुकाबले के लिए क्या-कया कदम उठाए थे? वह 2030 तक अमेरिका की तकनीकी बराबरी कर लेने के लक्ष्य के साथ बढ़ रहा है। अनेक मामलों में चीन की आलोचना हो सकती है, लेकिन हमें सीखना चाहिए कि दूरगामी रणनीति बनाकर तकनीकी संप्रभुता को कैसे हासिल किया जा सकता है। दवा क्षेत्र पर हमें सबसे ज्यादा ध्यान केंद्रित करना होगा। ज्यादातर दवाओं के लिए 60 से 80 प्रतिशत सामग्री चीन से आयात की जाती है। ऐसा पिछले 15 वर्ष में हुआ है, जब हमने आयात को मंजूरी देते हुए अपने देश में निर्माण को खत्म या कम होने दिया। 
आज तकनीकी संप्रभुता का मोल बहुत अधिक है, हमारा उद्देश्य भारत को डिजिटल बुनियादी ढांचे के मामले में आत्मनिर्भर बनाना होना चाहिए। हमारे व्यवसायों और सरकारी कामकाज में लगे अधिकांश हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर पर हमारा अपना नियंत्रण होना चाहिए। आइए, हम कुछ ऐसे क्षेत्रों को लेते हैं, जहां संप्रभु नियंत्रण की जरूरत है। संप्रभु नियंत्रण का मतलब यह नहीं कि सरकार ही डिजिटल बुनियादी ढांचे की मालिक हो जाए। इसका मतलब है, सरकार को व्यापक जनहित के लिए इस क्षेत्र या काम को विनियमित करने में सक्षम होना चाहिए।
हमें सबसे पहले डाटा और साइबर सुरक्षा चाहिए। भारत दुनिया में सबसे बडे़ खुले बाजार वाला लोकतंत्र है। एक अरब से अधिक नागरिकों से जुड़े डाटा को घरेलू संस्थानों द्वारा ही नियंत्रित और विनियमित किया जाना चाहिए। पिछले कुछ वर्षों में डाटा के स्थानीयकरण और गोपनीयता पर जीवंत बहस चली है और एक अच्छे लोकतंत्र में यह बहस होनी चाहिए। भारत को डाटा के उपयोग को लेकर स्पष्ट कानून बनाने होंगे। डाटा संरक्षण कानून पर अभी भी संसद में चर्चा चल रही है और उम्मीद है, इसी साल एक सशक्त और व्यावहारिक कानून बन जाएगा। इसी से जुड़ा है साइबर सुरक्षा का मामला। आज नकद सब्सिडी देने से लेकर करोड़ों के कारोबार तक ऑनलाइन हो गए हैं। व्यवसाय के हर आयाम को साइबर सुरक्षा की जरूरत है। आज की दुनिया में साइबर हमला सीमा पर हमले की तुलना में अधिक हानिकारक हो सकता है। फिलहाल भारत को साइबर सुरक्षा प्रबंधन के लिए भारतीय या मित्र देशों द्वारा विकसित सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करना होगा। हमें समान विचारधारा वाली कंपनियों के साथ ठीक उसी तरह काम करना चाहिए, जैसे हमने आतंकवाद विरोधी गठबंधन बनाया है। सरकार साइबर सुरक्षा नवाचार के लिए राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्र बना रही है। आगामी वर्षों में करोड़ों लोग डिजिटल मुख्यधारा में शामिल होंगे, उन्हें डिजिटल माहौल के हिसाब से प्रशिक्षित करने का काम हो सकेगा। 
दूसरी जरूरत है सुरक्षित सामाजिकता और संवाद विकसित करना। इंटरनेट ऐंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (आईएएमएआई) की ताजा रिपोर्ट में भारत में डिजिटल बाजार पर प्रकाश डाला गया है। देश में 50 करोड़ से अधिक सक्रिय इंटरनेट यूजर्स हैं, जिनमें से 50 प्रतिशत से अधिक गांवों में हैं। लगभग 14 प्रतिशत यूजर्स 5 से 11 वर्ष की आयु वर्ग में हैं। इसका मतलब है, 7.10 करोड़ नाबालिग मोबाइल या होम वाई-फाई का उपयोग कर रहे हैं। ये सभी भी यूजर्स असुरक्षित श्रेणी में है। चीनी ऐप पर प्रतिबंध लगाने से इन लाखों यूजर्स की सुरक्षा हुई है। रोपोसो और चिनगारी जैसे भारतीय सोशल वीडियो एप का तेजी से उदय हुआ है। 
तीसरी जरूरत है डिजिटल ढांचा और विनिर्माण पर ध्यान देना। मोबाइल फोन संचार के हार्डवेयर से लेकर रक्षा विनिर्माण तक, पेमेंट गेटवे से ऊर्जा उत्पादन उपकरण तक, सभी क्षेत्रों में भारत को आत्मनिर्भरता का विकास करना चाहिए। नेशनल पेमेंट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया ने मास्टरकार्ड और वीजा जैसे वैश्विक दिग्गजों के एकाधिकार का मुकाबला करने के लिए भारत इंटरफेस फॉर मनी (भीम) एप और रूपे कार्ड से भुगतान की शुरुआत की है। यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (यूपीआई) का निर्माण, जिस पर भीम और रूपे काम करते हैं, भारत की आत्मनिर्भरता की ओर उठाया गया शानदार कदम है। यूपीआई के तहत जून 2020 में 35 अरब डॉलर से भी अधिक के 1.34 अरब लेन-देन हुए हैं। 
भारत को अपनी नीतियों में सुधार करने के साथ ही उपयोगी शिक्षा में निवेश बढ़ाना चाहिए। अच्छी खबर है कि सरकार सभी मोर्चों पर उत्सुकता से आगे बढ़ रही है। ‘इंटरनेट ऑफ थिंग्स’ और ‘मशीन लर्निंग’ जैसे पद अब सरकार की चिंता का हिस्सा हैं। पिछले बजट में यह वादा किया गया था कि पांच साल में 80 अरब रुपये खर्च करके डाटा सेंटर पार्क, नेशनल मिशन ऑन क्वांटम टेक्नोलॉजी और अप्लिकेशंस बनाए जाएंगे। सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों को भारत नेट फाइबर-टू-होम कनेक्टिविटी प्रदान करने के लिए 60 अरब रुपये का प्रावधान भी कर रखा है। उम्मीद है, त्रुटिपूर्ण डाटा संग्रह प्रणालियों को नई प्रक्रियाओं के साथ तेजी से ठीक किया जाएगा।
कोविड बाद की दुनिया में भारत आत्मनिर्भरता के लिए प्रतिबद्ध दिख रहा है। हालांकि यही पर्याप्त नहीं है। शी जिनपिंग ने चीन और उसके संस्थानों में 2025 तक एक ट्रिलियन डॉलर से अधिक के निवेश की घोषणा कर रखी है। इसके साथ ही, भारत को समान विचारधारा वाले देशों के साथ गठबंधन बनाना चाहिए। भारत और अन्य देशों को चीन के नेतृत्व वाले नियमों में फंसने से बचने के लिए प्रौद्योगिकी के अपने मानक गढ़ने होंगे। तकनीक हमारे भविष्य का नेतृत्व करे, यह हमारी आर्थिक सुरक्षा के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना देश की सीमाओं की रक्षा। आज सीमाएं आभासी हो गई हैं, जहां कृत्रिम बुद्धिमत्ता की शक्ति तोपखाने की मारक क्षमता से भी अधिक मायने रखती है। चौथी औद्योगिक क्रांति की प्रौद्योगिकियां खुली और समतावादी हैं। भारत को एक वैश्विक नेता के रूप में चमकने के लिए अपनी तकनीकी क्षमताओं का विकास करना ही होगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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