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गांवों में इलाज  (हिन्दुस्तान)

कोरोना के समय भारतीय चिकित्सा क्षेत्र की खामियों की चर्चा स्वाभाविक ही है। चिकित्सक, अस्पताल, दवाई, संसाधन इत्यादि से जुड़ी कमियां एक-एक कर सामने आ रही हैं। शहरों में भी डॉक्टरों और सुविधाओं की कमी आए दिन सामने आती रहती है, लेकिन इन दिनों एक रिपोर्ट खास चर्चा में है। यह रिपोर्ट बताती है कि भारत के गांवों में मेडिकल प्रैक्टिस करने वाले तीन में से दो के पास न तो यथोचित डिग्री है और न कोई विधिवत प्रशिक्षण। वे जरूरी ज्ञान के बिना ही लोगों की जान से खेल रहे हैं। कोई आश्चर्य नहीं, हमारे गांवों में बीमारी और मृत्यु दर बहुत ज्यादा है। जाहिर है, सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा के अभाव के कारण ही निजी क्षेत्र में कथित डॉक्टरों का स्याह साम्राज्य फैल गया है। चर्चा में आई सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च की रिपोर्ट 2009 के अध्ययन पर आधारित है, जिसे देश के 19 राज्यों के 1,519 गांवों में अंजाम दिया गया था। रिपोर्ट बताती है, महज 75 प्रतिशत गांवों में ही कोई एक कथित चिकित्सा सेवक मौजूद है और एक गांव में औसतन तीन ऐसे कथित चिकित्सा सेवक होते हैं। इनमें से 86 प्रतिशत निजी डॉक्टर हैं और 68 प्रतिशत को किसी तरह का औपचारिक प्रशिक्षण भी नहीं मिला है। आज कोई यह कह सकता है कि ये आंकड़े 2009 के हैं, पर विश्व स्वास्थ्य संगठन की 2016 की एक रिपोर्ट भी ऐसी ही तस्वीर की ओर इशारा करती है। खतरनाक तथ्य यह भी है कि इन कथित डॉक्टरों या झोलाछाप में से 31.4 प्रतिशत स्कूल से आगे नहीं पढ़े हैं। लोगों के बीच अशिक्षा व गरीबी का आलम ऐसा है कि वे हर इलाज के लिए गांव से शहर नहीं जा सकते। ऐसे में, वे गांवों में मौजूद झोलाछाप पर निर्भर होकर खतरा उठाते हैं। 
एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी सामने आया है कि महज डिग्री होने से ही इलाज में महारत हासिल नहीं हो जाती। तमिलनाडु और कर्नाटक में जो अनौपचारिक चिकित्सा सेवक थे, उनकी योग्यता बिहार व उत्तर प्रदेश के अनेक प्रशिक्षित डॉक्टरों से भी बेहतर पाई गई। दक्षिण के राज्यों में चिकित्सा की अपेक्षाकृत ठीक स्थिति इसलिए भी है, क्योंकि वहां अनौपचारिक सेवक किसी औपचारिक डॉक्टर के पास वर्षों तक काम करके सीखते हैं, जबकि उत्तर के राज्यों में थोड़ी-बहुत जानकारी होते ही मरीजों की सेहत से खिलवाड़ शुरू हो जाता है। केरल एक बेहतर अपवाद है, जहां शिक्षा व जागरूकता ज्यादा होने के कारण झोलाछाप डॉक्टरों की संख्या समय के साथ कम होती गई है। 
कोरोना ने जता दिया है कि ग्रामीण इलाकों में पारंगत डॉक्टरों की उपलब्धता बढ़ाने के तमाम उपाय युद्ध स्तर पर आजमाने होंगे। नए डॉक्टरों को कुछ वर्ष गांवों में सेवा के लिए बाध्य करना होगा। ऐसे उपाय कुछ राज्यों ने कर रखे हैं, इसकी कड़ाई से पालना जरूरी है। कुछ वर्ष गांव में काम करने वाले डॉक्टरों को तरजीह देने की जरूरत है। जो लड़के गांव से निकलकर डॉक्टर बने हैं, उन्हें भी अपने गांवों को झोलाछाप के भरोसे नहीं छोड़ना चाहिए। ग्रामीण पृष्ठभूमि से जुड़े डॉक्टरों को प्रोत्साहित करना चाहिए। ऐसे प्रावधान करने चाहिए कि वे कहीं और सेवा या नौकरी में रहते हुए भी महीने या साल में कुछ-कुछ दिन अपने गांव जाकर सेवा कर सकें। हमारे गांव अच्छे डॉक्टरों के लिए तरस रहे हैं, उनके इंतजार को जल्द से जल्द खत्म करना सरकार ही नहीं, बल्कि चिकित्सा संगठनों-संस्थानों का भी कर्तव्य है।

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