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गंभीर मोड़ की सावधानी (हिन्दुस्तान)

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवद्र्धन ने मानसून सत्र के पहले दिन कल संसद में देश में कोरोना की स्थिति पर काफी विस्तार से प्रकाश डाला, तो यह स्वाभाविक ही नहीं, आवश्यक भी था। इस महामारी से जूझते हुए हमें लगभग छह महीने हो गए हैं और आज भी हम जिस मोड़ पर खडे़ हैं, वह कहीं से आश्वस्तकारी नहीं है, बल्कि मौजूदा हालात अतिरिक्त सावधानी की मांग कर रहे हैं। लगभग 50 लाख संक्रमण और 80 हजार मौतों के साथ भारत दुनिया में दूसरा सबसे प्रभावित देश बन चुका है और अब तो रोजाना 90 हजार से अधिक पॉजिटिव मामले सामने आने लगे हैं। स्थिति की गंभीरता का एक पहलू यह भी है कि बीस से ज्यादा लोकसभा सदस्य इस वक्त कोरोना संक्रमण की चपेट में हैं। इसलिए किसी गुलाबी तस्वीर की उम्मीद से परे यह जमीनी सच्चाई को स्वीकारने का समय है।
अब यह पूरी तरह से साफ हो चुका है कि लॉकडाउन का जितना फायदा देश उठा सकता था, उसमें हम नाकाम रहे और इसकी बहुत बड़ी कीमत हमारी अर्थव्यवस्था को भी चुकानी पड़ी है। वायरस के प्रसार क्षेत्र और संक्रमितों की जो संख्या आज हमारे सामने है, उसमें लॉकडाउन का अब बहुत मतलब भी नहीं रह गया है। इसको समझते हुए ही सरकारों ने चंद गतिविधियों को छोड़ लगभग सारे उपक्रमों से पाबंदियां हटा ली हैं। कई सारे विशेषज्ञों का मानना है कि दफ्तरों और बाजारों के खुलने से संक्रमण बढ़ रहा है। लेकिन सवाल यह है कि कोई देश आखिर कब तक खुद को बंद रख सकता है? खासकर भारत जैसे विशाल गरीब आबादी वाले मुल्क की यह मजबूरी भी है कि वह अपनी गतिविधियों को जल्द से जल्द खोले, ताकि लोग अपनी रोजमर्रा की न्यूनतम जरूरतें पूरी करने लायक कमा सकें  व अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकने का आधार तैयार हो। यह तो पहले दिन से साफ था कि कोई भी सरकार किसी महामारी से जन-सहयोग के बिना नहीं निपट सकती। कई देशों ने इसकी मिसाल भी हमारे सामने रखी, मगर हम कोई मिसाल न गढ़ सके।
स्वास्थ्य मंत्री ने लोकसभा को एक राहत भरी बात यह बताई है कि देश में जितने भी लोग कोविड-19 की जद में आए हैं, उनमें से 92 फीसदी मरीजों का संक्रमण गंभीर श्रेणी का नहीं था और सिर्फ1.7 प्रतिशत रोगियों को ही आईसीयू में ले जाने की जरूरत पड़ी। लेकिन यहीं पर हमें एक और आंकड़े पर गौर करना चाहिए। एक्टिव मामलों की संख्या 10 लाख की संख्या पार कर चुकी है। इसका सीधा-सा अर्थ है, अतिरिक्त स्वास्थ्य सुविधाओं की जरूरत, हमारे कोरोना वॉरियर्स पर पहले से ज्यादा दबाव व संक्रमण के फैलने की और अधिक आशंका। निस्संदेह, पिछले छह महीनों में स्वास्थ्य सुविधाएं बढ़ाने के स्तर पर अच्छे प्रयास हुए हैं। मगर हमें अपने देश की आबादी के आकार को भूलना नहीं चाहिए। इसलिए, जिंदगी को पटरी पर लाने के लिए लोगों को एहतियात का दामन फिलहाल थामे रहना होगा। संसद में जिस तरह से सांसदों के बैठने को लेकर खास सावधानी बरती गई, वह एक अच्छा उदाहरण है। जब तक इलाज के तौर पर कोई प्रामाणिक दवा या वैक्सीन हमारे सामने नहीं आ जाती, हमें कोरोना महामारी से जान बचाने के हर एहतियाती उपाय करने पड़ेंगे। यह अनिवार्य है, और अनिवार्यता का कोई विकल्प नहीं होता।  

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