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खुले दौर में पाबंदी की फूहड़ता (हिन्दुस्तान)

भारत से उसकी विदाई बहुत पहले ही हो चुकी है, और अब अमेरिका में भी टिक टॉक की उल्टी गिनती शुरू हो गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस पर पाबंदी लगाने की न सिर्फ धमकी दी है, बल्कि जल्द ही फैसला करने की बात भी कही है। चीन में बने इस मोबाइल एप को लेकर विवाद इस दुनिया के लिए नए नहीं हैं, लेकिन जो लोकप्रियता टिक टॉक ने हासिल की, वह किसी और को नहीं मिली। इसलिए यह एप जितना चर्चित था, उस पर पाबंदी का मुद्दा उससे कहीं ज्यादा चर्चा में है।
छोटे-छोटे वीडियो वाला यह एप जब अचानक ही लोकप्रिय होना शुरू हुआ, तो अमेरिका के एक समीक्षक ने इसे ‘मूर्खता का साइबर मंच’ कहा था। बेशक इसके ज्यादातर वीडियो में हास्य और फूहड़ता से ज्यादा कुछ नहीं होता, लेकिन टिक टॉक जिस दर्शक-वर्ग के लिए तैयार किया गया था, उसे किसी गंभीरता की जरूरत भी कहां थी? फिर, सोशल मीडिया पर बहुत सारी गंभीरताओं की अंतिम परिणति भी अक्सर मूर्खता या फूहड़ता में ही होती है। और क्यों न हो, आर्थिक तर्क के हिसाब से देखें, तो हास्य, मूर्खता और फूहड़ता का बाजार वैसे भी ज्यादा बड़ा है। लेकिन डोनाल्ड ट्रंप जब टिक टॉक पर पाबंदी की बात कर रहे हैं, तो उनकी आपत्ति इस मूर्खता पर नहीं है। ऐसा होता, तो अमेरिका के पास अपनी मूर्खताओं की कोई कमी नहीं थी। आपत्ति उन खतरों की वजह से है, जो टिक टॉक में छिपे हैं। वैसे, ये खतरे टिक टॉक में ही नहीं, ज्यादातर या शायद सभी तरह के एप में हैं।
अमेरिका में डर है कि टिक टॉक के जरिए वहां के डाटा का इस्तेमाल चीन जासूसी या महत्वपूर्ण सूचनाएं पाने के लिए कर सकता है, या शायद कर भी रहा है। तर्क भारत में भी यही था। एक अमेरिकी विश्लेषक ने यहां तक डर जताया है कि अमेरिकी सेना के जवान तक टिक टॉक का इस्तेमाल करते हैं, जो किन्हीं मौकों पर अमेरिका के लिए बड़ी समस्या बन सकता है। टिक टॉक का संचालन करने वाली कंपनी बाइटडांस ने इसको लेकर काफी सफाइयां दी हैं, पर आरोप उछालने के इस दौर में सफाइयों पर कान भला कौन देता है? हालांकि, दौर कोई भी हो, सफाइयां विश्वसनीय भी भला कब मानी जाती हैं? 
एक सच यह भी है कि उपयोगकर्ताओं का डाटा जमा करना और उसे बाजार में बेचना ही वह धंधा है, जिससे एप बनाने वाली कंपनियों का गुजारा चलता है और उनकी कमाई होती है। इसीलिए आपके मोबाइल फोन पर चलने वाले एप आपका ऐसा डाटा भी लगातार जमा करते रहते हैं, जिनका उनसे कोई नाता नहीं होना चाहिए। मसलन, एक एप है, जिससे आप किसी पेड़ या पौधे का फोटो खींचकर कुछ ही सेकंड में यह जान सकते हैं कि उसका नाम क्या है, वह किस प्रजाति का है और उसकी विशेषताएं क्या हैं? यानी, यह एक साधारण-सा उपयोगी एप है, जो शिक्षा से लेकर कई अन्य कामों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। पर जब आप उसे अपने मोबाइल फोन में डालकर पहली बार चलाते हैं, तो यह आपसे कई तरह की इजाजत मांगता है। वह आपके मोबाइल में जमा आपके दोस्त-रिश्तेदारों वगैरह के फोन नंबर भी जानना चाहता है, साथ ही इस पर भी नजर रखना चाहता है कि आप किस समय कहां थे? यानी, फंडा सीधा सा है कि तुम हमें अपना डाटा दो, हम तुम्हें पेड़-पौधों के नाम बताएंगे। सभी एप यही करते हैं। यही उनकी कमाई का तरीका है। और कमाई के इस तरीके की ईजाद खुद अमेरिका में ही हुई है। इस तरह से देखें, तो टिक टॉक ने कुछ नया नहीं किया। उसने दरअसल उन्हीं नियमों से दुनिया को जीतने की कोशिश की है, जो अमेरिका में ही तैयार हुए थे।
एक दिलचस्प बात यह भी है कि दुनिया के सॉफ्टवेयर बाजार की बादशाह अमेरिकी कंपनी माइक्रोसॉफ्ट टिक टॉक को खरीदने की तैयारी कर रही है। मामला अभी शुरुआती स्तर पर है, कहां तक पहुंचेगा, यह अभी नहीं कहा जा सकता। माइक्रोसॉफ्ट अगर उसे खरीदने में कामयाब रहती है, तो रातोंरात टिक टॉक के सारे पाप धुल जाएंगे। पाबंदी वापस हो जाएगी, और ऐसा अमेरिका ही नहीं, भारत में भी होगा।
बेशक टिक टॉक से अमेरिका की जो आपत्तियां हैं, उन्हें सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता। मगर टिक टॉक किसी भी डाटा को चीन सरकार को अगर नहीं सौंपता हो, तब भी कौन विश्वास करेगा? कारोबार और तकनीक की तमाम बड़ी कामयाबियां हासिल करने के बावजूद चीन अभी भी एक बंद समाज है और बंद समाजों पर बाकी दुनिया कभी आसानी से विश्वास नहीं करती। टिक टॉक के साथ जो हो रहा है, उस पर आपत्ति का कोई नैतिक अधिकार भी चीन के पास नहीं है। भारत या अमेरिका में जितने एप पर पाबंदी है, चीन में उससे कहीं ज्यादा एप पर पहले ही प्रतिबंध लगा हुआ है। वहां वही एप लोग इस्तेमाल कर सकते हैं, जिनकी इजाजत वहां की सरकार देती है। जिस टिक टॉक का इस्तेमाल पूरी दुनिया के लोग कर रहे हैं, वह तक चीन के लोगों के लिए उपलब्ध नहीं है। चीन के लोग टिक टॉक चलाने वाली कंपनी का ही एक दूसरा एप डोइन इस्तेमाल कर सकते हैं।
भारत की तरह ही अगर अमेरिका में भी टिक टॉक पर पाबंदी लग जाती है, तो इसका सामरिक महत्व भले ही कुछ हो, लेकिन आम अमेरिकी नागरिकों को इससे कुछ मिलने वाला नहीं है। उनका भला तभी होगा, जब एक सिरे से सभी उपभोक्ताओं का सारा डाटा जमा करने और उसे बाजार में बेचने की प्रवृत्ति पर रोक के अंतरराष्ट्रीय नियम-कायदे बनेंगे। इससे अमेरिका ही नहीं, पूरी दुनिया के लोगों को लाभ मिल सकेगा, और टिक टॉक जैसी आशंकाओं को खत्म करने का भी यही रास्ता है। मगर फिलहाल इसकी कोई उम्मीद नजर नहीं आती।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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