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कोरोना युद्ध में अमेरिका से सबक (हिन्दुस्तान)

स्वास्थ्य सेवा पर दुनिया भर में सबसे ज्यादा खर्च करने वाला अमेरिका कोरोना वायरस से सबसे अधिक प्रभावित है। अफसोस की बात यह है कि इस महामारी को शुरू हुए छह महीने गुजर चुके हैं, पर वह इसे थाम पाने की सफलता से कोसों दूर दिख रहा है। ये हालात इसलिए बन गए हैं, क्योंकि शुरू से ही जवाबी प्रतिक्रिया में वह एक के बाद दूसरी गलती करता रहा। मैं यहां अमेरिका की 10 प्रमुख त्रुटियों का जिक्र कर रहा हूं, जिनसे हमें सीखना चाहिए कि हमें क्या नहीं करना है।
पहली गलती है कि अमेरिका में फैसले वैज्ञानिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि राजनीतिक तौर पर लिए गए। यह गलती राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा शीर्ष स्तर से शुरू हुई। उन्होंने शुरुआत में कोविड-19 को मौसमी बुखार कहकर खारिज कर दिया था। उप-राष्ट्रपति माइक पेंस को उन्होंने उस टास्क फोर्स का मुखिया जरूर बनाया, जिसका गठन आगामी कार्ययोजना के बारे  में सलाह देने के लिए किया गया था, पर वास्तव में उन्हें कोई अधिकार दिया ही नहीं गया।
दूसरी चूक, महामारी से निपटने के लिए कोई कानून सम्मत राष्ट्रीय कार्ययोजना नहीं बनाई गई। टास्क फोर्स ने राज्यों के लिए टेस्टिंग, ट्रेसिंग और ट्रीटमेंट (जांच, संक्रमित की खोज और इलाज) को लेकर दिशा-निर्देश तो जारी किए, संक्रमण के प्रसार को रोकने के लिए मास्क के इस्तेमाल व फिजिकल डिस्टेंसिंग की बात भी कही गई, मगर ये सभी दिशा-निर्देश तक ही सिमटे रहे। इसे कानून द्वारा अनिवार्य नहीं बनाया गया। 
तीसरी, महामारी को राज्यों का, यानी स्थानीय मसला माना गया। एक संघ के तौर पर संजीदा प्रयास नहीं किए गए। गवर्नरों और स्थानीय अधिकारियों को अपने तईं इसके उपाय तलाशने को कहा गया। नतीजतन, महामारी से निपटने के तरीके व परिणाम राज्य-दर-राज्य अलग-अलग दिखे।
चौथी गलती, जांच, चिकित्सा उपकरणों और उनकी आपूर्ति को लेकर संघ का दखल सीमित था। इनकी आपूर्ति शृंखला काफी हद तक कमजोर थी। विदेशी और निजी स्रोतों से इन्हें जुटाने की व्यवस्था करने के लिए राज्यों को ही कहा गया।
पांचवीं, महामारी को लेकर सटीक सूचनाओं का अभाव रहा। जब तक शट  डाउन नहीं हटाया गया था, तब तक तो टास्क फोर्स ने नियमित प्रेस-ब्रीफिंग की, पर बाद में ट्रंप ने ब्रीफिंग की कमान खुद संभाल ली। उन्होंने इसे भाषण देने का मंच बना दिया, संवाददाताओं के साथ बहस की जाने लगी, चिकित्सा विशेषज्ञों के तर्कों को खारिज किया गया, और यहां तक कि असुरक्षित दवाओं को बढ़ावा दिया गया। 
छठी, शट डाउन जल्द से जल्द हटाने के लिए अतिरिक्त प्रयास किए गए। ट्रंप लोगों के घरों में सिमटे रहने के शुरू से विरोधी रहे। शट डाउन के निर्देश जारी होते ही राष्ट्रपति इसे हटाने के बारे में सोचने लगे। उन्होंने वर्जीनिया और मिशिगन जैसे राज्यों में अपने लाखों समर्थकों के लिए ट्वीट भी किया, क्योंकि उन्हें लग रहा था कि वहां के गवर्नर उनका विरोध कर सकते हैं या शट डाउन हटाने में ढीले पड़ सकते हैं। ट्रंप खुद के दोबारा राष्ट्रपति चुने जाने की संभावनाओं को तलाशते हुए ही तमाम कदम उठाते दिखे, और इसके लिए उन्होंने लोगों की सेहत को भी नजरंदाज किया।
सातवीं गलती, अगर देश के किसी एक हिस्से में सफलता मिली, तो उसके सापेक्ष दूसरी जगहों पर भी महामारी की प्रकृति को नजरंदाज करते हुए नियमों में ढील दी गई। शुरुआत में महामारी के हॉटस्पॉट थे पूर्वोत्तर, मध्य-पश्चिमी राज्य, शहरी इलाके व कैलिफोर्निया। मई के मध्य से जून की शुरुआत तक इन जगहों में कोरोना का प्रकोप कुछ कम हुआ, जबकि बाकी देश में चरम पर पहुंचता दिखा। इसलिए जॉर्जिया, फ्लोरिडा, टेक्सास व एरिजोना जैसे राज्य नियमों में अपेक्षाकृत अधिक ढील देने लगे। नतीजतन, इन-इन प्रांतों में भी संक्रमण में तेजी आई और अब ये नए हॉटस्पॉट बन गए हैं।
आठवीं गलती, नियमों को लागू करने वाला कोई एक  तंत्र अमेरिका में नहीं था। यहां तक कि लोगों के घर से बाहर न निकलने, मास्क पहनने और शारीरिक दूरी के पालन संबंधी निर्देशों को लागू कराने में भी व्यापक अंतर रहा। जॉर्जिया व टेक्सास जैसे कुछ राज्यों में रिपब्लिकन गवर्नरों ने इन नियमों को लेकर महज दिशा-निर्देश जारी किए, जबकि इन्हीं राज्यों के बडे़ शहरों के डेमोक्रेट मेयरों ने इस बाबत कानूनी प्रावधानों की जरूरत बताई।
नौवीं चूक। अमेरिका में स्वास्थ्य-चिंता की बजाय आर्थिक चुनौतियों को ज्यादा महत्व दिया गया। महामारी की वजह से चरमराई अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए ही शट डाउन हटाया गया, जिसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। आखिरी और संभवत: सबसे बड़ी गलती, विशेषज्ञों की सलाहों को लगातार खारिज किया जाता रहा। जैसे,  अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रसिद्ध संक्रामक रोग विशेषज्ञ और टास्क फोर्स के सदस्य एंथोनी फौसी की राय की अवहेलना की गई। शुरू से ही ट्रंप विशेषज्ञों की सलाहों की अनदेखी कर अपना मत परोसते रहे। 
कुल मिलाकर, अमेरिका ने कोविड-19 के खिलाफ दूरदर्शी सोच के साथ जंग लड़ने की बजाय हालात देखकर कदम उठाए। इस नाकामी के लिए काफी हद तक ट्रंप को जिम्मेदार माना जाना चाहिए। महीनों तक उन्होंने खुद मास्क नहीं पहना, हालांकि हाल में उन्हें मास्क में देखा गया है। इतना ही नहीं, वह लगातार यही कहते रहे कि एक समय के बाद महामारी खुद खत्म हो जाएगी। साफ है, ट्रंप वह प्रतीक बन गए हैं, जो यह बताता है कि महामारी के खिलाफ व्यक्तिगत, राजनीतिक और पेशेवर तौर पर क्या नहीं करना चाहिए।  
ये कुछ बुनियादी सबक हैं, जो भारत या दूसरे देश अमेरिका से सीख सकते हैं। भारत को खासतौर से ध्यान देना चाहिए, क्योंकि यहां संक्रमण लगातार बढ़ रहा है। मौजूदा स्थिति बता रही है कि दुनिया के संभवत: सबसे कठिन लॉकडाउन का वह नतीजा नहीं निकला, जिसकी उम्मीद थी। भारत 10 लाख संक्रमण का आंकड़ा पार कर चुका है, जो एक बुरी खबर है। हालांकि, अब भी सभी दरवाजे बंद नहीं हैं, क्योंकि यहां मृत्यु-दर बहुत कम है। इसके अलावा, सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, कोरोना के 80 फीसदी मामले 49 जिलों में ही हैं। इसका मतलब है कि देश के महज सात फीसदी जिलों में अधिकतर मामले हैं, यानी हॉटस्पॉट के लिए एक समग्र नीति बनाकर महामारी को थामा जा सकता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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