Home करेंट अफेयर्स अखबारों के सम्पादकीय कूटनीति और समरनीति का साथ (हिन्दुस्तान)

कूटनीति और समरनीति का साथ (हिन्दुस्तान)

हम मंथर गति से चकराता से रामबन की चढ़ाई चढ़ रहे थे। सड़क के नाम पर टूटी-फूटी पथरीली पहाड़ी डगर और चारों ओर अनंत सन्नाटा। अचानक लगा, कोई चीखा है। जब तक कुछ समझ पाते, तब तक दूसरी वैसी ही ध्वनि गूंजी। अनजानी भूमि पर ऐसी आवाजें! हम गाड़ी आगे बढ़ाते गए। अगला मोड़ पार किया ही था कि पहाड़ की चोटी पर बनाई गई एक गुफा में फौजी पोशाक में बहुत से जवान खडे़ दिखाई दिए। गुफा से नीचे सड़क तक एक रस्सी टंगी हुई थी। उनका ‘उस्ताद’ उन्हें रस्सी के सहारे ऊपर से नीचे आने की ट्रेनिंग दे रहा था। छलांग से पहले जवान जोर की ध्वनि निकालते थे। हम उसे चीख मान बैठे थे। 

हमने गाड़ी रोक दी। दृश्य रोमांच पैदा करने वाला था। आसपास सेना के किसी भी कैंप का बोर्ड नहीं लगा था। क्यों? कुछ देर में उनका भोजन-अवकाश हुआ। कौतूहलवश मैंने उनकी ओर बढ़कर पूछा कि आप लोग सेना के किस अंग से हैं? प्रशिक्षक ने जवाब दिया- ‘स्पेशल फ्रंटियर फोर्स’। उन दिनों तक मीडिया का विस्फोट नहीं हुआ था, लिहाजा सहज भाव से वह बताता चला गया कि यह ‘फौज’ तिब्बती नौजवानों की है। इन्हें हम प्रशिक्षित करते हैं। मैं जिन्हें अब तक गोरखा समझ रहा था, वे मूलत: तिब्बती थे। बातचीत के दौरान मालूम पड़ा कि वे चीन से बुरी तरह खफा हैं और अपनी बारी आने का इंतजार कर रहे हैं। उन्हें मौका मिल गया है।

अब तक यह बल अनजाना था। उन्हें रणनीति के तहत नेपथ्य में रखा गया था। सेना ने अभी तक अधिकृत तौर पर इसे स्वीकार नहीं किया है, मगर समूची दुनिया में चर्चा है कि इन लड़ाकों ने दक्षिण पैंगोंग की दुर्गम चोटियों पर कब्जा जमा लिया है। अब चीन की सेना वहां मनमानी नहीं कर सकती। सब जानते हैं, जंग में जो ऊंची चोटी पर काबिज होता है, उसे खुद-ब-खुद बढ़त मिल जाती है। इससे अब तक बातचीत की मेज पर आक्रामक रुख अपनाने वाले चीन के समक्ष मुश्किल खड़ी हो गई है। भारत अब अप्रैल-पूर्व की स्थिति बहाल कराने के लिए बेहतर मोल-भाव कर सकता है।

ऐसा पहली बार हुआ है, जब भारत ने चीन सीमा पर आगे बढ़कर कार्रवाई की है। मोदी सरकार ने इससे पहले जब बालाकोट और सर्जिकल स्ट्राइक को  अंजाम दिया था, तभी तय हो गया था, सीमा पर हुई हरकत का जवाब उसी अंदाज में दिया जाएगा। हम अब तक पाक प्रायोजित आतंकवाद और चीन की घुसपैठ को कूटनीतिक स्तर पर सुलझाने की कोशिश करते आए हैं। इससे मामला लंबा खिंचता था। अब सैनिक कार्रवाई का जवाब सेना देगी और कूटनीतिज्ञ बातचीत के जरिए उसे मुकाम तक पहुंचाएंगे। शी जिनपिंग और उनकी लाल सेना इसे समझने में नाकाम रही।

कोई आश्चर्य नहीं कि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह तीन महीने में दो बार मास्को का दौरा कर चुके हैं। वह वहां ‘शंघाई सहयोग संगठन’ की बैठक में हिस्सा लेने गए थे। चीन के रक्षा मंत्री वेई फेंग भी वहां मौजूद थे। उनसे बातचीत का कार्यक्रम पहले से तय नहीं था, पर कहते हैं कि फेंग ने पहल की। रूस का भी इसरार था, लिहाजा दोनों रक्षा मंत्रियों में वार्ता हुई। सीमा पर अभूतपूर्व तनाव के बीच यह पहली उच्च स्तरीय वार्ता थी। क्या बात हुई? दोनों ओर से कैसे तर्क दिए गए? क्या इससे कोई हल निकलेगा? ये पंक्तियां लिखे जाने तक हमें इन सवालों के जवाब नहीं मिल सके हैं, पर हमें सतर्क रहना होगा। चीन अपने कौल पर कभी टिकता नहीं है। रेजांग ला से गलवान तक हिन्दुस्तानी सैनिकों की शहादत हमें सचेत करती है। 

राजनाथ की यह मास्को यात्रा इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि हम आज भी जरूरी सैन्य सामान के लिए रूस पर काफी कुछ निर्भर हैं और ऐतिहासिक तौर पर वह हमारा मित्र रहा है। पाकिस्तान से जंगों के वक्त उसने हमेशा हमारा साथ दिया। पिछले कुछ वर्षों में हालात बदले हैं, फिर भी पुराना दोस्त दूसरों से वफा न करने लगे, इसका इंतजाम आवश्यक है। युद्ध-नीति में कहा जाता है कि बड़ी से बड़ी जंग का फैसला बातचीत की मेज पर होता है और यदि यह बातचीत पहले ही हो जाए, तो फिर जंग की जरूरत नहीं रह जाती। यही वजह है कि रक्षा मंत्री के बाद विदेश मंत्री एस जयशंकर चीन के विदेश मंत्री वांग यी से 10 सितंबर को मास्को में मिलेंगे। ताशकंद के बाद क्या मास्को भारत के सामरिक इतिहास में नई इबारत जोड़ने जा रहा है? 

यहां बताना जरूरी है कि चीन ने यदि हमारी सीमाओं का अतिक्रमण न किया होता, तब भी भारत को उससे निपटने की शक्ति तो अर्जित करनी ही थी। पेंटागन ने इसी हफ्ते अपनी एक रिपोर्ट में खुलासा किया है कि चीन अपने परमाणु जखीरे को दस साल में दोगुना करने की फिराक में है। यही नहीं, वह भारत को हर तरफ से घेरना चाहता है। उसकी महत्वाकांक्षाएं पाकिस्तान, श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड, सिंगापुर, इंडोनेशिया के साथ यूएई, कीनिया, तंजानिया, सेशल्स और अंगोला में सैन्य अड्डे बनाने की हैं। वैसे भी, चीन का दावा है कि उसके पास संसार की सबसे बड़ी नौसेना है। यह बात अलग है कि नई दिल्ली के कूटनीतिक प्रयासों के चलते श्रीलंका और मालदीव ने बीजिंग से पल्ला झाड़ लिया है। क्या अगली बारी नेपाल की है?

जान लें। यदि बीजिंग अपनी ताकत बढ़ती महत्वाकांक्षाओं के अनुरूप बढ़ा सका, तो फिर भारत की स्थिति वैसी ही हो जाएगी, जैसी अमेरिका के आसपास बसे लैटिन देशों अथवा रूस के आसपास बसे मुल्कों की है। संयोग से अमेरिका ऑस्ट्रेलिया, जापान और तमाम ताकतवर देश इस मामले में भारत के साथ हैं। आस्ट्रेलिया और जापान ने भी इसी वजह से चीन की उफनती आकांक्षाओं के मद्देनजर अपनी सामरिक ताकत बढ़ाने का निर्णय किया है।

द्वितीय विश्व युद्ध के बारे में कहा जाता है कि अगर हिटलर को म्यूनिख से आगे बढ़ने से रोक दिया गया होता, तो दूसरा महायुद्ध नहीं होता। क्या तीसरे विश्व युद्ध की आशंकाओं से निपटने का आसान तरीका यह नहीं है कि समूची दुनिया शी जिनपिंग के विस्तारवादी रवैये को रोकने का सार्थक प्रयास करे? शायद इसीलिए अमेरिका ने दक्षिण चीन सागर के साथ डिएगो गार्सिया में अपनी नौसेना और युद्धक हवाई जहाजों की तैनाती बढ़ा दी है। मौजूदा हालात में यह जरूरी है।

चीन कितना बेलगाम हो गया है, इसका उदाहरण उसके विदेश मंत्रालय की बदजुबानी भी है। इसी हफ्ते चेक गणराज्य ने उसके रवैये की आलोचना की, तो उसने पलटकर धमकाया कि चेक गणराज्य को पछताना होगा। ऑस्ट्रेलिया को भी इसी अंदाज में धमकाया जा चुका है। और तो और, भारत के लिए भी उसके प्रवक्ताओं ने कहा कि हम उसका 1962 से भी बुरा हाल कर देंगे। अति-आत्मविश्वास से उपजी यह असभ्य भाषा चीन के लिए खतरनाक है। वह दुनिया को ऐसे धमका नहीं सकता। रही बात भारत की, तो सब जानते हैं कि 1962 और 2020 के हिन्दुस्तान में जमीन-आसमान का अंतर है। दक्षिणी पैंगोंग की चोटियां इसकी गवाह हैं। बीजिंग इतना बहरा भी नहीं कि यहां से उपजी अनुगूंज को सुन न सके।

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