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किसान के लिए (हिन्दुस्तान)

राज्यसभा में कृषि विधेयकों के विरोध में जो हुआ, उसकी तारीफ नहीं की जा सकती। लोकतंत्र में विरोध की एक सीमा है, विरोध जताने के तय संसदीय पैमाने हैं, लेकिन लगता है, कई बार कुछ सांसद इसके प्रति उदासीन हो जाते हैं। जिस तरह से विरोधी सांसदों ने राज्यसभा के वेल में आकर प्रदर्शन किया और उप-सभापति के साथ जो व्यवहार किया, उसे सिवाय कोरी राजनीति के कुछ नहीं कहा जा सकता। नियम पुस्तिका फाड़ने या तोड़फोड़ की कोशिश को देश ने देखा है, जिससे राज्यसभा और राज्यसभा के सदस्यों की चमक और फीकी हुई है। जिस तरह से राज्यसभा में कृषि संबंधी विधेयकों को पारित होने से रोकने की कोशिश हुई थी, उसके बाद यह तय माना जा रहा था कि कुछ न कुछ कार्रवाई होगी। राज्यसभा के सभापति वेंकैया नायडू ने आठ सांसदों को निलंबित कर दिया है। जिन विपक्षी सांसदों को निलंबित किया गया है, उनमें तृणमूल कांग्रेस के डेरेक ओ ब्रायन व डोला सेन, आम आदमी पार्टी के संजय सिंह, कांग्रेस के राजीव सातव, सैयद नासिर हुसैन, रिपुन बोरा और सीपीआई (एम) से के के रागेश व एल्मलारान करीम के नाम हैं। 
निलंबन की कार्रवाई होनी चाहिए थी या नहीं, इस पर विशेषज्ञों में बहस चल रही है, लेकिन जिस प्रकार से उप-सभापति के सामने दुव्र्यवहार किया गया, उसे गलत मानने वालों की संख्या आज ज्यादा है। अगर किसी विधेयक को पारित होने से रोकने के लिए कोई बल का प्रयोग करता है, कुछ फाड़ने-तोड़ने की कोशिश करता है, तो इस परंपरा को तत्काल रोकने की जरूरत है। देश के ऊपरी सदन राज्यसभा के वरिष्ठ सांसदों को अपनी गरिमा और विरोध शैली का अवश्य ध्यान रखना चाहिए। सड़क और संसद में संघर्ष का तरीका अलग होना ही चाहिए। इसमें एक पक्ष यह भी है कि संसद में इस तरह की उत्तेजना पहले भी पैदा होती रही है, और निलंबन की परंपरा को आगे बढ़ाने से पहले विचार कर लेना चाहिए। आश्वासन लिया जा सकता है कि दोषी सांसद फिर कभी ऐसा नहीं करेंगे, मगर सुलह-सफाई की कोशिश फिलहाल नहीं दिखती है, तो मामला राष्ट्रपति तक जाएगा। कृषि संबंधी विधेयक को कानून बनने और लागू होने से रोकने के लिए कुछ विपक्षी दल सक्रिय रहेंगे। ध्यान देने की बात है कि बिहार के मुख्यमंत्री ने उप-सभापति हरिवंश के साथ हुए व्यवहार को बिहार के अपमान से जोड़ दिया है। बिहार में चुनाव होने वाले हैं और संभव है, वहां यह मुद्दा बना रहे। 
कुल मिलाकर, इस विवाद को बढ़ाने की बजाय समाधान निकालना चाहिए। अगर किसान देश की सड़कों पर लामबंद होते हैं, तो आर्थिक, सामाजिक और स्वास्थ्य के लिहाज से भी स्थिति तनावपूर्ण हो सकती है। यह किसानों की मजबूती ही है कि कोई भी दल उनके समर्थन को गंवाना नहीं चाहेगा। यदि विपक्षी दलों में विरोध की बेचैनी है, तो सत्तारूढ़ दल में किसानों को साथ रखने की कवायद है। जो संभावनाएं दिख रही हैं, उसमें इस पूरी किसान राजनीति से किसानों को फायदा ही होता दिखता है। मंडी और न्यूनतम समर्थन मूल्य का कवच पहले से ज्यादा मजबूत होकर सामने आ सकता है। पर यह भी देखना चाहिए कि कुछ राज्य हैं, जहां मंडी व न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था नहीं है। आज हर राज्य के हर अन्नदाता की रक्षा के उपाय जरूरी हैं और यह बात जितनी सत्ता पक्ष पर लागू होती है, उतनी ही विपक्ष पर भी।

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