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कानून के साथ चलने की चुनौती (हिन्दुस्तान)

उज्जैन से कानपुर लाते समय विकास दुबे के एनकाउंटर से सवाल जरूर उठे हैं, लेकिन इसने एक ऐसे मुकदमे का पटाक्षेप भी कर दिया, जो कम से कम पांच-छह साल चलता और उसका क्या हश्र होता, कुछ कहा नहीं जा सकता। देश की पुलिस एक कानून के दायरे में रहकर काम करती है। कानून के तहत काम करने का एक ढांचा या फ्रेमवर्क तय किया गया है, जिसमें रहते हुए पुलिस को अपना काम करना होता है। यदि पुलिस अपराधियों को पकड़कर मारने लग जाएगी, तो यह पुलिस को देखना होगा कि वह पुलिसमैन कहलाना पसंद करेगी या कुछ और। यह बिल्कुल सही है कि विकास दुबे एक दुर्दांत अपराधी था, हर तरह से भ्रष्ट था, और डकैत था। उसका दुस्साहस इतना बढ़ गया था कि उसने पुलिस को भी घात लगाकर मारना शुरू कर दिया था। पुलिस पर घात लगाकर किया गया हमला निस्संदेह देश की सार्वभौमिकता पर हमला था, लेकिन ऐसा था, तो फिर हमने मुंबई पर 26 नवंबर, 2012 को भीषण हमला करने वाले पाकिस्तानी आतंकी अजमल कसाब को क्यों जिंदा पकड़ा था? प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हत्यारे सतवंत सिंह को जिंदा क्यों पकड़ा गया था? मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के हत्यारे को जिंदा क्यों पकड़ा गया था? उन्हें वहीं पकड़कर गोली क्यों नहीं मार दी गई थी? क्या उन पर मुकदमा नहीं चला, क्या उन्हें फांसी की सजा नहीं मिली? हां, यह जरूर है कि उनकी सुनवाई लंबी चली। जो कानूनी प्रक्रिया है और कानून के तहत जो अधिकार अभियुक्तों को मिले हुए हैं, उनके अनुसार, उन्हें कुछ कानूनी संरक्षण हासिल है, इनका जब पुलिस सही-सही इस्तेमाल करती है, तो किसी अपराधी को सजा दिलाने में थोड़ा वक्त लगता है।

दरअसल, समस्या कानून के शासन यानी ‘रूल ऑफ लॉ’की है। ऐसा देखा गया है कि कई बार रूल ऑफ लॉ के तहत कोर्ट चलते ही नहीं हैं। मान लीजिए, अगर विकास दुबे को अदालत में पेश किया जाता, तो उसका केस चलता। संभव है, उसका केस पांच साल तक खत्म ही नहीं होता। यह भी संभव है कि कोई गवाह नहीं मिलता। बचने के लिए वह कभी रिट कोर्ट में जाता, तो कभी कहीं और प्रयास करता। कभी उत्तर प्रदेश में राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त नेता की हत्या में यह बात साबित हुई थी कि विकास दुबे के खिलाफ कोई जुबान खोलने वाला नहीं है। यहां तक कि उस मामले में पुलिस भी चुप्पी साध गई थी। जब कभी-कभी कोर्ट में रूल ऑफ लॉ नहीं चलता, तो पुलिस क्या करे, पुलिस भी कानून के दायरे में है। 

मैंने देखा है कि जब भी कोई गवाह मुकरता है, तो निचली कोर्ट में न्यायिक अधिकारी सिर हिलाता रहता है और दूसरे गवाह को बुला लिया जाता है। वह यह नहीं देखता कि गवाह क्यों मुकर गया? क्या हालात थे, जिन्होंने उसे बयान बदलने पर मजबूर कर दिया? सवाल है कि कई बार ट्रायल जज के पोस्ट ऑफिस की तरह से काम करने से कानून का राज कैसे चलेगा? उसे सक्रिय होना पड़ेगा, लेकिन उसकी भी समस्याएं हैं। उसके पास असीमित केस हैं, जिनके बोझ से वह या कोई न्यायिक अधिकारी दबा हुआ है। वह गवाहों पर सवाल उठाएगा, तो केस आगे नहीं बढ़ पाएंगे। ऐसे में, पुलिस का भी क्या दोष है, उसे पता है कि गवाह सामने नहीं आएंगे। ‘विटनेस प्रोटेक्शन सिस्टम’ पूरी तरह से काम नहीं कर रहा है। यह इतना जटिल है कि सुरक्षा मांगते-मांगते गवाह पूरी तरह से ‘एक्सपोज’ हो जाता है। फिर अपराधी यदि ताकतवर हो, रसूख वाला हो, तो पुलिस के सामने कोई चारा नहीं रहता। विकास दुबे का मामला ऐसा ही था।

साल 1999 में दिल्ली की चर्चित मॉडल जेसिका लाल की हत्या के मामले में क्या हुआ था, सबको पता है। ट्रायल कोर्ट ने मुख्य अभियुक्त को, जो एक शक्तिशाली नेता का बेटा था, सुबूतों और गवाहों के अभाव में हत्या के आरोप से बरी कर दिया था। केस मेरे सामने अपील में दिल्ली हाईकोर्ट आया। मैंने फैसला पलटा, उसे सजा दी और जेल भेजा। इस मामले में मैंने 30 लोगों को झूठी गवाही देने के आरोप में नोटिस भेजा और उन्हें तलब किया। यह अलग बात है कि वे ऊपरी अदालत से छूट गए, लेकिन उससे समाज में एक संदेश तो चला गया। यदि इस मामले के दोषी को सजा नहीं दी जाती, तो वह आज कहीं नेता बनकर घूम रहा होता। 
इसी प्रकार, दिल्ली विश्वविद्यालय में कानून की छात्रा प्रियदर्शिनी मट्टू बलात्कार और हत्या के मामले में किया गया था। अभियुक्त पुलिस विभाग के आईजी का बेटा था। दिल्ली के ट्रायल कोर्ट ने उसे बरी कर दिया था, क्योंकि उसके खिलाफ कोई सुबूत नहीं मिला था, लेकिन सुनवाई चली और हाईकोर्ट से उसे जेल भेजा गया।

यदि न्यायपालिका उचित प्रकार से चले, तो कानून के राज का पालन हो सकता है, लेकिन यह काम इतना आसान नहीं है। सबको अपनी सुरक्षा की चिंता रहती है। पुलिस को भी यह देखना होगा कि वह अपनी प्रणाली को दुरुस्त रखे। अपराधियों पर नकेल कसने में कानून की प्रक्रिया का पालन करे, अपनी निष्ठाओं को मजबूत रखे और सही व बेखौफ रिपोर्ट करे। गवाहों को सुरक्षा दे और उनकी गोपनीयता बनाए रखे, लेकिन यह बात कहना जितना आसान है, पालन करना उतना ही कठिन है। इस रास्ते में अड़ंगा लगाने वाले तमाम कारक हैं, उनका नाम लेने की जरूरत नहीं है, यह सर्वविदित है।
अदालतों के लिए भी जरूरी है कि जब किसी केस में गवाह न मिले या वह मुकर जाए, तो उन पर सवाल जरूर किए जाएं। यह जज को ही देखना होगा, क्योंकि आखिरकार कानून का राज अदालत में आकर ही ठहरता है। खतरनाक अपराधी और आठ पुलिसकर्मियों के हत्यारे विकास दुबे के एनकाउंटर ने कोर्ट और पुलिस व्यवस्था पर  जितने सवाल खड़े किए हैं, उनके उतने ही जवाब भी सामने लाकर रख दिए हैं। सिर्फ हमें उन्हें देखना है और समझना है। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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