Home करेंट अफेयर्स अखबारों के सम्पादकीय एक अजीब ऊहापोह में फंसे अरब देश (हिन्दुस्तान)

एक अजीब ऊहापोह में फंसे अरब देश (हिन्दुस्तान)

मुस्लिम दुनिया की सबसे बड़ी कामना ‘उम्मा’ का निर्माण है। यह कल्पना लोक का एक ऐसा जगत है, जिसमें दुनिया भर के मुसलमानों के स्वप्न और यथार्थ एक जैसे हो जाते हैं। छोटे-छोटे कबीलाई नगर राज्यों को फलांगते हुए इस कामना ने सौ करोड़ से अधिक आबादी वाले 57 राष्ट्र-राज्यों को एक सांस्कृतिक व राजनीतिक इकाई के रूप में स्वीकार कराने की इसकी चाहत से स्वाभाविक ही वही समस्याएं पैदा हो सकती थीं, जिनसे आज मुस्लिम दुनिया को दो-चार होना पड़ रहा है। चूंकि शास्त्रीय इस्लाम आनुवंशिक राजशाही में यकीन नहीं करता, इसलिए उम्मा लगातार एक खिलाफत का सपना देखती है, जिसमें कोई खलीफा शरीयत के मुताबिक मुसलमानों का राजनीतिक और धार्मिक नेतृत्व कर सके।
पहले विश्व युद्ध में ऑटोमन साम्राज्य के साथ जब खिलाफत की निर्णायक पराजय हो गई और महान तुर्क नेता कमाल पाशा ने देश को एक धर्मनिरपेक्ष व आधुनिक लोकतंत्र बनाने का फैसला किया, तो वह एक खलीफा के लिए उम्मा की चाहत से अच्छी तरह वाकिफ थे, इसलिए पहले उन्होंने खुद को या किसी ऐसे कमजोर को खलीफा घोषित करने की योजना बनाई, जो उनके हाथों में वास्तविक शक्तियां रहने दे, पर तत्कालीन परिस्थितियों में उन्हें खिलाफत समाप्त करनी पड़ी। आखिरी खिलाफत की समाप्ति की घोषणा के साथ भारत समेत दुनिया के तमाम देशों में उसके पक्ष में चलने वाले मुसलमानों के आंदोलन तो खत्म हो गए, पर खलीफा के लिए मुस्लिम दुनिया की चाहत बरकरार रही। खिलाफते-उस्मानिया खत्म होने के बाद मिस्र के शाह फुआद और वहाबी कबीला सरदार सऊद (जिन्होंने बाद में पश्चिमी ताकतों की मदद से सऊदी अरब की स्थापना की) ने भी खलीफा बनने के असफल प्रयास किए थे। 
हाल के दिनों में दो बड़ी घटनाएं हुईं, जिन्होंने मुस्लिम दुनिया के साथ-साथ पूरे विश्व को झकझोर दिया है। एक दिन अचानक पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी एक निजी चैनल पर प्रकट हुए और उन्होंने ऐसा कुछ कह दिया, जिसकी किसी ने उनसे उम्मीद ही नहीं की थी। उन्होंने सऊदी अरब की आंखों में आंखें डालकर जो तजवीज पेश की, उससे हंगामा तो होना ही था। मुस्लिम उम्मा के प्रतीक ‘ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन’ (ओआईसी) ने कश्मीर के मुद्दे पर पाकिस्तान के लिए वह सब कुछ नहीं किया, जिसकी उससे अपेक्षा थी। चूंकि ओआईसी का मुख्यालय सऊदी अरब के शहर जेद्दाह में है और उसका नेतृत्व उसी के पास है, इसलिए कुरैशी ने कश्मीर मामले में निष्क्रियता के लिए सऊदी गद्दी के उत्तराधिकारी शहजादा मोहम्मद बिन सुलेमान को जिम्मेदार ठहराया। कुरैशी ने कहा कि उनका देश कश्मीर के मुद्दे पर काफी दिनों से ओआईसी के विदेश मंत्रियों की बैठक चाह रहा है, मगर सऊदी शहजादे की बेरुखी से संभव नहीं हो पा रही और इसलिए अब वह दूसरे बिरादर मुस्लिम मुमालिक से मिलकर यह बैठक करने की कोशिश करेंगे। दूसरे मुल्कों से उनका मकसद ईरान और तुर्की से था, जो सऊदी अरब के परंपरागत शत्रु माने जाते हैं। किसी को भी पाकिस्तान से इस दुस्साहस की अपेक्षा नहीं थी। पहले शासकों की तरह जब इमरान खान प्रधानमंत्री बने, तो वह भी कटोरा लेकर रियाद ही दौडे़ थे और छह अरब से कुछ अधिक की मदद लेकर लौटे थे। इसके अलावा, लाखों प्रवासी पाकिस्तानी वहां काम करते हैं और पाकिस्तानी विदेशी मुद्रा भंडार का बड़ा हिस्सा उनके द्वारा भेजी गई रकम से बनता है। 
चंद माह पूर्व, मलेशिया की राजधानी कुआलालंपुर में सऊदी अरब के नेतृत्व के खिलाफ जब एक समांतर इस्लामी ब्लॉक बनाने का प्रयास किया गया, तो शहजादा मोहम्मद बिन सलमान ने इमरान खान को वहां जाने से रोक दिया था। बहरहाल, कुरैशी के दुस्साहसिक बयान पर प्रतिक्रिया भी उतनी ही कड़ी आर्ई। जिस मुस्लिम उम्मा की दुहाई देते पाकिस्तान थकता नहीं था, उसमें तुर्की और ईरान को छोड़कर कहीं जूं भी नही रेंगी। सऊदी अरब ने अपने कर्ज वापस मांगने भी शुरू कर दिए हैं। पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष जनरल बाजवा सुलह-सपाटे के लिए सऊदी गए, तो उन्हें लगभग बेइज्जत करके लौटा दिया गया।
मुस्लिम उम्मा में सबसे बड़ी हलचल इस घटना के चंद दिनों बाद मची, जब संयुक्त अरब अमीरात ने अमेरिकी मध्यस्थता में ‘सदी की सबसे बड़ी डील’ करते हुए इजरायल को अपनी मान्यता दे दी। पिछले सात दशकों से फलस्तीन का मुद्दा उम्मा के लिए जिंदगी के मकसद की तरह बना हुआ था। मिल-जुलकर लडे़ मुस्लिम मुल्क इजरायल से तीन जंग हार चुके हैं। इसके अलावा, इजरायल द्वारा धीरे-धीरे फलस्तीनी जमीन पर कब्जा करते जाने और विरोध करने पर निहत्थे नागरिकों के खिलाफ बर्बर बल प्रयोग एक ऐसा मुद्दा है, जिस पर दुनिया भर में सबसे ज्यादा मुसलमान आंदोलित हुए हैं। अनुमान है, यूएई ने यह समझौता सऊदी अरब के कहने पर ही किया होगा और अगर उम्मा में बहुत खिलाफत नहीं हुई, तो बहुत सारे मुस्लिम देश इजरायल से कूटनीतिक संबंध बना लेंगे। वैसे भी मिस्र व जॉर्डन ने अपने दूतावास इजरायल में खोल ही रखे हैं। तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन ने, जो नया खलीफा बनने की अपनी महत्वाकांक्षा छिपा भी नहीं रहे हैं, इस मुद्दे पर सबसे कठोर प्रतिक्रिया दी है, पर तुर्की ने पहले से ही इजरायल से रिश्ते कायम कर रखे हैं। कुछ ही वर्ष पूर्व खुद एर्दोगन ने इजरायल के प्रधानमंत्री का भाषण अपनी नेशनल असेंबली में कराया था।
पूरी संभावना है कि फलस्तीनियों को समर्थन देने या न देने के मसले पर ओआईसी विभाजित हो जाएगा। तुर्की, ईरान, कतर या पाकिस्तान जैसे कुछ देशों को छोड़कर बाकी उसके सदस्य या तो सऊदी खेमे में होंगे या फिर तटस्थ रहेंगे। फिर इस पक्ष के अपने अंतर्विरोध हैं। शिया ईरान सुन्नी तुर्की का कितनी दूर तक साथ दे पाएगा? हमेशा कटोरा लेकर सऊदी अरब के सामने खड़ा होने वाला पाकिस्तान कब तक उसके विरोध में खड़ा रह पाएगा? या चीन और रूस अपने व्यापारिक हितों की उपेक्षा करते हुए किस हद तक इस नए ब्लॉक का साथ देंगे? ये सब अनुत्तरित प्रश्न हैं, जिनके ऊपर ओआईसी का भविष्य निर्भर करता है। लगता है, इस बार मुस्लिम उम्मा की समझ में आ जाएगा कि एक जटिल और बहुआयामी दुनिया में जब धर्म से इतर बहुत से कारणों से अस्तित्व में आए राष्ट्र-राज्य मजबूत उपस्थिति में तब्दील हो चुके हैं, तब मध्ययुगीन और कुछ हजार की आबादी वाले नगर राज्यों जैसी खिलाफतों की कल्पना करना न सिर्फ अप्रासंगिक है, बल्कि उनकी कामना भी किसी बुरे सपने की ही तरह होगी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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