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आभासी लेकिन कामयाब अदालतें (हिन्दुस्तान)

वर्चुअल कोर्ट, यानी आभासी अदालतों को स्थाई रूप देने के प्रस्ताव पर मिश्रित प्रतिक्रिया आई है। कुछ लोग इसमें असीम संभावनाएं देख रहे हैं, तो दूसरी ओर कुछ ऐसे भी हैं, जो इसे अव्यावहारिक, अपारदर्शी और न्याय के उदात्त सिद्धांतों के प्रतिकूल मानते हैं। कुछ लोगों को लगता है कि आम आदमी का भरोसा बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि उसे अदालतों में अपनी मर्जी से जाने और वहां की कार्यवाही देखने का अधिकार हो। उनकी मान्यता है कि दूसरी लोकतांत्रिक संस्थाओं की तरह अदालतों में भी आम आदमी की आवाजाही पर गैर-जरूरी पाबंदी न हो, ताकि उसे लगे कि न्यायिक-व्यवस्था में उसकी भी भागीदारी है। चूंकि आभासी अदालतों में भौतिक रूप से उपस्थित रहना संभव नहीं है, इसलिए उनके मुताबिक न्याय भले ही हो रहा हो, किंतु न्याय होता हुआ नजर भी आए, इसमें संदेह है। 
आभासी अदालतों की उपादेयता को संदेह की दृष्टि से देखने वाले संविधान के अनुच्छेद 145(4), दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 327(1) तथा दीवानी प्रक्रिया संहिता की धारा 153बी का भी हवाला देकर कानूनी खामी का जिक्र कर रहे हैं। अनुच्छेद 145(4) में कहा गया है कि सर्वोच्च न्यायालय अपना निर्णय खुली अदालत में सुनाएगा तथा दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 327(1) व दीवानी प्रक्रिया संहिता की धारा 153बी में कहा गया है कि मुकदमों की सुनवाई आमतौर पर खुली अदालत में ही होनी चाहिए, जहां पर आम नागरिक की खुली आवाजाही हो। इस तकनीकी आपत्ति का निराकरण कठिन नहीं है, लाइव स्ट्रीमिंग जैसी तकनीक के जरिए  आसानी से हर इच्छुक व्यक्ति को अदालती कार्यवाही देखने की सुविधा दी जा सकती है।
कोविड महामारी के दौरान आभासी अदालतों और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग ने अपनी खास जगह बनाई है। कठिन हालात में आपात न्याय देकर लोगों का विश्वास भी अर्जित किया है। बहुत से लोगों को ऐसा लगने लगा है कि इससे न्याय हासिल करना अधिक पारदर्शी, त्वरित और कम खर्चीला है। संचार क्रांति ने इसे आसान बनाया है। ई-पोर्टल और ऑनलाइन फॉर्म भरने की सुविधा देश के दूरस्थ इलाकों तक पहुंच चुकी है। आधार कार्ड से लेकर पासपोर्ट तक के लिए अब इसी माध्यम को अपनाया जा रहा है। अदालतों को इस माध्यम से जोड़ने और सुनवाई करने में इस सामाजिक प्रशिक्षण ने सकारात्मक भूमिका निभाई है। कोविड-19 के शुरुआती दिनों में वीडियो कॉन्फ्रेंस का इस्तेमाल निचली अदालतों में रिमांड जैसे अति-आवश्यक मामले में सफलता के साथ हुआ। विधि मंत्रालय से जुड़ी संसदीय समिति की रिपोर्ट के मुताबिक, इससे मुल्जिमों के आने-जाने की खर्चीली व जोखिम भरी प्रक्रिया से निजात मिली। सितंबर के पहले सप्ताह तक इसका 3,240 अदालतों में सफलतापूर्वक इस्तेमाल कर 1,272 जेलों को इससे जोड़ने और कैदियों का रिमांड लेने का काम पूरा हुआ।
विचारण न्यायालयों (ट्रायल कोर्ट) में लगभग तीन करोड़ मामले लंबित हैं। उनकी संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है। इनमें से 60 फीसदी मामले छोटे-मोटे अपराधों और दीवानी के हैं, जिसमें कई बार समझौता एक प्रभावी विकल्प होता है। इन मामलों में यदि आभासी अदालतों के प्रयोग का लाभ उठाया जाए, तो इसके बहुत अच्छे परिणाम आ सकते हैं। इसी तरह, टैक्स और कॉरपोरेट कानून से जुडे़ मामलों में मौखिक बहस की बहुत कम जरूरत पड़ती है। तमाम तथ्य लिखित रूप से दिए जाते हैं। जरूरत पड़ने पर उनका स्पष्टीकरण भी लिखित ही दिया जाता है। अत: मोटर व्हीकल, क्षतिपूर्ति दावा, उपभोक्ता मामले, टैक्स व कंपनी कानून से जुडे़ मुकदमों का निस्तारण करने में आभासी अदालतें अच्छा काम कर सकती हैं। वहां पर इन्हें आजमाया जा सकता है।
वर्चुअल अदालतों को लेकर एक चिंता ढांचागत सुविधाओं को लेकर भी है। सांसद भूपेंद्र सिंह यादव की अध्यक्षता वाली विधि एवं न्याय संबंधी संसदीय समिति को बताया गया कि देश में कुल 3,477 अदालतों में ही वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए सुनवाई की व्यवस्था है, जबकि 14,443 अदालतों में अभी ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। बार एसोसिएशन के कुछ सदस्यों ने समिति को दिए गए बयान में यह मुद्दा भी उठाया कि देश के 50 फीसदी वकीलों के पास लैपटॉप या कंप्यूटर की सुविधा नहीं है और प्राय: यह भी देखने में आया है कि सुनवाई के दौरान संचार नेटवर्क इतना कमजोर रहता है कि आवाज भी ठीक से नहीं पहुंच पाती। इन सबके अलावा अदालती डाटा की गोपनीयता, उसकी सुरक्षा और साइबर-फरेबियों द्वारा उसमें तोड़-मरोड़ करने जैसी चिंता भी समय-समय पर व्यक्त की गई है।
आभासी अदालतों से जुड़ी ढांचागत कमियां, संसाधनों का अभाव, नई तकनीकी जटिलता, साइबर अपराधियों का खतरा तथा गोपनीयता से जुड़े मामलों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, किंतु दूसरी ओर, आभासी अदालतों से होने वाले लाभ इससे कई गुना ज्यादा हैं। हम इस माध्यम का इस्तेमाल करके यदि 50 प्रतिशत मुकदमों का निपटारा कर लेते हैं, तो यह बहुत बड़ी सफलता होगी। इससे रोज-रोज सुनवाई के स्थगन पर विराम लगेगा और मुकदमों के निस्तारण में सुविधा हो जाएगी। वादी अपनी पसंद के वकील के जरिए देश के किसी कोने में अपना पक्ष रख सकता है। इससे धन और समय की तो बचत होगी ही, धीरे-धीरे भौगोलिक क्षेत्राधिकार की सीमा रेखा भी तिरोहित हो जाएगी। इस तरह, हम कम खर्चीली व अधिक कारगर न्यायिक-व्यवस्था की ओर अग्रसर हो सकेंगे।
राहुल सांकृत्यायन की कालजयी कृति वोल्गा से गंगा की चौथी कहानी पुरुहूत की नायिका रोचना और उसके बाबा के बीच बहुत रोचक संवाद है। सोलह वर्षीया रोचना के बुजुर्ग बाबा को किसी भी स्थान पर एक से अधिक दिन ठहरना अनैतिक लगता है। तांबे के बर्तन का उपयोग उन्हें फिजूलखर्ची और अनावश्यक लगता है। खेती करना प्रकृति के नियमों के विरुद्ध लगता है। दूसरी ओर, रोचना अपने बाबा को स्थाई झोंपड़ी बनाने, खेती करने और तांबे की मजबूती के फायदे गिनाती है। रोचना और उसके बाबा की सोच समाज के हर दौर में शाश्वत रूप से विद्यमान रहती है। रोचना नवाचार के नए क्षितिज तलाशती है और उसके बाबा जल्दबाजी में किए जाने वाले परिवर्तनों में सावधानी के आग्रही हैं। कोविड-19 के सहयोग ने आभासी अदालतों की रोचना को फिर यह जिम्मेदारी दी है कि वह नए परिवर्तनों को मूर्त रूप दे, लेकिन उसमें आने वाली व्यावहारिक कठिनाइयों के हल भी निकालती रहे, ताकि बेहतर अदालती व्यवस्था का विकास हो सके।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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