Home करेंट अफेयर्स अखबारों के सम्पादकीय अरब मुल्कों में बढ़ती दूरियां (हिन्दुस्तान)

अरब मुल्कों में बढ़ती दूरियां (हिन्दुस्तान)

पिछले दिनों संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने इजरायल के साथ अपने राजनयिक संबंध शुरू करने का फैसला किया, जिसने विश्व समुदाय का खासा ध्यान खींचा है। यह संकेत है कि इस क्षेत्र में सियासी समीकरण नए सिरे से गढे़ जा रहे हैं। पिछले कुछ समय से ऐसी कोशिशें जारी हैं, जिसके तीन प्रमुख कारक हैं। पहला, 1950 के दशक के बाद से इस क्षेत्र के तमाम देशों के नीति-निर्धारण में फलस्तीन का मसला प्रमुखता से शामिल रहा है। दूसरा, अरब और ईरान के रिश्तों में कड़वाहट, जो 1979 की ईरानी-क्रांति से पहले से चल रही है। और तीसरा कारक है, तुर्की साम्राज्य के गौरव को फिर से स्थापित करने की एर्दोगन की महत्वाकांक्षा। 
पाकिस्तान कश्मीर मसले पर समर्थन जुटाने के लिए अरब, ईरान और तुर्की, तीनों मुल्कों से अपने रिश्तों का बेजा फायदा उठाता रहा है। ईरान के साथ-साथ उसे अरब देशों से भी आर्थिक मदद मिलती रही है। मगर  पहली बार यहां के प्रमुख राष्ट्रों के साथ रिश्तों में संतुलन साधने में उसे काफी मुश्किलें पेश आ रही हैं। पाकिस्तानी विदेश मंत्री महमूद कुरैशी ने तो चेतावनी भी दी थी कि यदि इस्लामिक सहयोग संगठन जम्मू-कश्मीर के मसले पर विदेश मंत्रियों की बैठक नहीं बुलाता, तो वह इस संगठन के बाहर कश्मीर मसले को उठाएगा। इससे पाकिस्तान और खाड़ी देशों की आपसी दरारें जगजाहिर हुई हैं। मगर यह तनाव कोई नया नहीं है।
दरअसल, पाकिस्तान और खाड़ी देशों में तनातनी 2014 में शुरू हुई, जब सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने पाकिस्तान से यह गुजारिश की थी कि वह अपनी सैन्य टुकड़ी यमन की जंग में उनकी मदद के लिए भेजे। पाकिस्तान की हुकूमत ने संसद की मंजूरी के बाद ही ऐसा करने की बात कही। यह एक असामान्य घटना थी, क्योंकि अतीत में पाकिस्तान की हुकूमत विदेश नीति से जुडे़ प्रमुख फैसले बिना संसद की सहमति से लेती रही थी। लिहाजा, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने जल्द ही समझ लिया कि ईरान के साथ विवाद में पाकिस्तान उनका साथ देने के लिए तैयार नहीं है और संसद की अनुमति केवल बहाना है। 
यमन मसले पर पाकिस्तान से निराश होने के बावजूद इमरान खान के सत्ता संभालने के बाद सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात उसकी मदद के लिए आगे आए। क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने साल 2019 में पाकिस्तान का दौरा किया। सऊदी अरब ने स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान को तीन अरब अमेरिकी डॉलर देने का भी फैसला किया, क्योंकि तब मुल्क का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग खाली हो गया था। उसने तेल मुहैया कराने में पाकिस्तान को 3.2 अरब डॉलर की रियायत भी दी। मगर बाद के महीनों में, इमरान खान ने संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक के लिए अपनी न्यूयॉर्क यात्रा के दौरान तुर्की, मलेशिया और ईरान के राष्ट्राध्यक्षों के साथ बैठकें कीं। इसके बाद वह मलेशिया में इस्लामी देशों के शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए तैयार थे, पर इस यात्रा को स्थगित कर दी। सऊदी अरब की नजर में यह इस्लामी दुनिया में उसके नेतृत्व को चुनौती देने वाला कदम था और उसने इसे इस्लामिक सहयोग संगठन के बरअक्स  संगठन खड़ा करने की कोशिश के रूप में देखा।
पाकिस्तान और सऊदी अरब के मतभेद लगातार सुलगते रहे हैं। सऊदी अरब का साथ देने को तो पाकिस्तान तैयार नहीं है, लेकिन वह चाहता है कि सऊदी उसके एजेंडे को आगे बढ़ाने में मदद करे। वह भारत के खिलाफ इस्लामी देशों के संगठन का भी इस्तेमाल करना चाहता है। नतीजतन, सऊदी अरब ने 3.2 अरब अमेरिकी डॉलर की रियायती तेल सुविधा का नवीनीकरण नहीं किया, जिसकी अवधि पिछले मई माह में समाप्त हो चुकी है। इसके अलावा, उसने स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान को दिए गए एक अरब डॉलर को वापस करने की मांग भी कर दी है। जाहिर है, कोरोना महामारी के इस संकट काल में जब पाकिस्तान गंभीर आर्थिक दुश्वारियों का सामना कर रहा है, तब सऊदी अरब के साथ बिगड़ते रिश्ते उसकी मुश्किलें और बढ़ाएंगे।
बहरहाल, मिस्र द्वारा कैंप डेविड समझौते के बाद इजरायल से कूटनीतिक रिश्ते बनाने के करीब चार दशकों के बाद संयुक्त अरब अमीरात ने इजरायल की तरफ अपना हाथ बढ़ाया है। उधर, तुर्की ने अमीरात के साथ अपने राजनयिक संबंध तोड़ने की धमकी दी है। यह संकेत है कि तुर्की अरब देशों को किनारे करके अब तमाम इस्लामी मुल्कों को अपने झंडे के नीचे लाने की नीति पर आगे बढ़ रहा है। 
तेल की मांग में आई गिरावट की वजह से सऊदी अरब सहित खाड़ी के राजतंत्र मुश्किल माली हालत का सामना कर रहे हैं। इससे चीन और भारत का महत्व बढ़ गया है, जो सऊदी तेल के प्रमुख खरीदार हैं। सऊदी अरब को अपने बजट को संतुलित रखने के लिए प्रति बैरल न्यूनतम 80-84 अमेरिकी डॉलर की कीमत की जरूरत है, जबकि अभी तेल की कीमत 45 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल के आसपास है। इस बीच तुर्की एक आक्रामक विदेश नीति पर आगे बढ़ रहा है। अप्रैल महीने में लीबिया में हस्तक्षेप करने के बाद यूनान और साइप्रस के साथ उसका तनाव बढ़ रहा है। इसमें उसे यूरोपीय संघ का भी विरोध झेलना पड़ रहा है। यह मामला पूर्वी भूमध्य सागर में तेल और गैस की खोज से जुड़ा है। 
एर्दोगन की एकेपी पार्टी ने संसद में अपना पूर्ण बहुमत खो दिया है। पिछले साल तो यह पार्टी इस्तांबुल मेयर के प्रतिष्ठित चुनाव में भी हार गई थी। दरअसल, एर्दोगन आक्रामक विदेश नीति के सहारे अपनी गिरती लोकप्रियता को संभालने की कोशिश कर रहे हैं, और मुस्लिम दुनिया के सऊदी नेतृत्व को चुनौती दे रहे हैं। यह ऐसे समय में हो रहा है, जब उनका देश एक बडे़ आर्थिक संकट का सामना कर रहा है। 
इधर, पाकिस्तान बदतर आर्थिक स्थिति का सामना कर रहा है, लेकिन जम्मू-कश्मीर पर अपनी सोच को बदलने के लिए तैयार नहीं है। तुर्की के वोल्कान बोजकिर, जो संयुक्त राष्ट्र महासभा के अगले सम्मेलन के अध्यक्ष होंगे, अभी-अभी पाकिस्तान-यात्रा से लौटे हैं। प्रधानमंत्री इमरान खान और विदेश मंत्री कुरैशी ने उनके साथ बातचीत में जम्मू-कश्मीर का मुद्दा उठाया है। यह संकेत है कि सितंबर में शुरू हो रहे संयुक्त राष्ट्र महासभा सत्र में क्या हो सकता है। तुर्की से मेल-मिलाप बढ़ाने से सऊदी अरब सहित अन्य अरब देशों के साथ भी उसके रिश्ते पर असर पडे़गा, जो पहले से ही तनावपूर्ण है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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