Home करेंट अफेयर्स अखबारों के सम्पादकीय अमेरिकी चुनाव में बदलती बिसात (हिन्दुस्तान)

अमेरिकी चुनाव में बदलती बिसात (हिन्दुस्तान)

राजनीति में जितने काम जनता के सामने किए जाते हैं, उससे कहीं ज्यादा मेहनत परदे के पीछे की जाती है। अमेरिका का राष्ट्रपति चुनाव इसका अपवाद नहीं है। वहां भारतीय मूल की कमला हैरिस को डेमोक्रेटिक पार्टी ने उप-राष्ट्रपति पद का अपना उम्मीदवार बनाया है, जबकि राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी के दौरान अपना दावा पेश करते हुए वह जो बिडेन के खिलाफ आक्रामकता की हद तक मुखर हो चुकी हैं। जाहिर है, डेमोक्रेटिक पार्टी ने जो बिडेन और कमला हैरिस की जोड़ी चुनावी मैदान में उतारकर अमेरिकी मतदाताओं को एक साथ कई संदेश देने की कोशिश की है।
अमेरिका में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव नवंबर में होने जा रहे हैं। कमला हैरिस अधिक से अधिक भारतीय मतदाताओं को डमोके्रटिक उम्मीदवार जो बिडेन के पक्ष में लुभा सकती हैं। साल 2016 के चुनावी आंकड़ों के मुताबिक, वहां करीब 41 लाख भारतीय मूल के नागरिक हैं, जिनमें से लगभग 18 लाख मतदान के योग्य हैं। माना यही जाता है कि भारतीय मूल के मतदाता पारंपरिक तौर पर डेमोक्रेटिक पार्टी के पक्ष में अपना वोट गिराते रहे हैं, लेकिन व्हाइट हाउस में डोनाल्ड ट्रंप के प्रवेश के बाद से माहौल कुछ हद तक बदला है। अब कयास यह लगाया जाने लगा है कि डेमोक्रेटिक के ये पारंपरिक वोटर उससे छिटककर रिपब्लिकन पार्टी के पाले में जा सकते हैं। ‘हाउडी मोदी’ जैसे आयोजन के बाद इस फेरबदल के अनुमान में कहीं ज्यादा तेजी आई है।
लिहाजा, ऐसे किसी उम्मीदवार को चुनावी मैदान में उतारने का दबाव डेमोक्रेटिक पर था, जो उसके पारंपरिक गढ़ को मजबूत करते हुए रिपब्लिकन की ‘सपोर्ट बेस’ में सेंध लगा सकें। कमला हैरिस का व्यक्तित्व इसमें पार्टी की मदद करता दिखता है। वह पुराने दिनों में एक चर्चित वकील रह चुकी हैं। सेक्स हिंसा के खिलाफ उनकी टिप्पणी काफी सुर्खियों में रही। बेशक आलोचकों की नजर में वह एक उलझी हुई दावेदार हैं, क्योंकि राष्ट्रपति पद के लिए अपना दावा पेश करते समय वह जिन ‘प्रगतिशील’ नीतियों की हिमायती दिखीं, उनमें से कई को वह वकालत के अपने शुरुआती वर्षों में खारिज कर चुकी हैं। बहरहाल, देर से ही सही, पर अश्वेतों के प्रति पुलिसिया अत्याचार के खिलाफ वह जिस तरह से मुखर हुईं, उससे भी उनकी एक सकारात्मक छवि बनी है। इसी तरह, स्वास्थ्य-सेवा में सुधार, बिना दस्तावेज के रह रहे आप्रवासियों को नागरिकता मुहैया कराने, बंदूकों की खुली बिक्री पर पाबंदी लगाने, तर्कसंगत कर सुधार जैसे मसलों पर भी वह खुलकर अपनी राय रखती रही हैं। इन सबसे उनका अपना एक मतदाता-वर्ग तैयार हुआ है।
कमला हैरिस का मुखर होना भी उनके पक्ष में जाता है। राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी के वक्त जो बिडेन पर की गई उनकी टिप्पणी तो अब भी कई लोगों के जेहन में ताजा होगी। उन्होंने जो बिडेन को तब घेरा था, जब उनकी बिडेन के दिवंगत बेटे से खूब बनती थी। इससे यह धारणा बनी है कि कमला चुनाव में रिपब्लिकन उम्मीदवारों पर हमलावर होने में जो बिडेन की खासा मदद कर सकती हैं। जो बिडेन ने उनकी दावेदारी पेश करते हुए कहा भी कि काम करने के तरीके पर हमारे आपसी मतभेद हो सकते हैं, लेकिन रणनीति पर नहीं।
मगर हमारे लिए अहमियत यह रखती है कि भारत के प्रति वह क्या सोचती हैं? अभी तक यह साफ-साफ नहीं कहा जा सकता कि वह नई दिल्ली से कितनी करीब हैं, लेकिन डेमोक्रेटिक पार्टी को भारत का हितैषी माना जाता है। चूंकि जो बिडेन पहले ही यह स्पष्ट कर चुके हैं कि राष्ट्रपति बनने के बाद उनकी प्राथमिकता में भारत शीर्ष पर होगा, इसलिए यह उम्मीद की जा सकती है कि कमला हैरिस नई दिल्ली और वाशिंगटन की मित्रता को एक नए मुकाम पर पहुंचाने में मददगार साबित हो सकेंगी। बेशक डोनाल्ड ट्रंंप के अब तक के कार्यकाल में भारत और अमेरिका के रिश्ते आगे बढ़े हैं, लेकिन एच1-बी वीजा पर उनका सख्त रुख नई दिल्ली के मुफीद नहीं माना गया, जबकि जो बिडेन यह एलान कर चुके हैं कि अगर वह राष्ट्रपति के रूप में चुने गए, तो इस वीजा पर लगी पाबंदी हटा ली जाएगी।
कमला अमेरिकी समाज में गहरा रहे विभाजन को थामने में भी सहायक हो सकेंगी। वह अश्वेत डोनाल्ड हैरिस और श्यामला गोपालन की संतान हैं। अमेरिका में, और खासतौर से अश्वेतों में जिस तरह से बेरोजगारी बढ़ी है, उससे रिपब्लिकन सरकार के प्रति उनमें नाराजगी तेज हुई है। रही-सही कसर कोरोना महामारी ने पूरी कर दी है। कोविड-19 से जान-माल की भारी कीमत चुका रहे अमेरिका में अश्वेत इस बीमारी से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। और माना जाता है कि श्वेतों-अश्वेतों के बीच का सामाजिक भेद इसकी एक बड़ी वजह है। कमला हैरिस को चुनाव मैदान में उतारकर डेमोक्रेटिक पार्टी अमेरिकी समाज को एकजुट करने का संकेत दे रही है। अगर ऐसा होता है, तो यकीनन यह भारत के हित में भी होगा। वहां जिस तरह से भारतीय मूल के आप्रवासियों की आमद बढ़ी है, उसके कारण से भारत सरकार पर यह दबाव भी बढ़ा है कि भारतीय अनिवासी वहां किसी तरह के भेदभाव का शिकार न बनें। 
बहरहाल, कमला हैरिस असल अर्थों में भारत के लिए कितनी सहायक हो सकेंगी, इसका जवाब तो भविष्य के गर्भ में है, लेकिन इसका अनुमान चुनावी अभियान में पार्टी द्वारा उठाए जाने वाले मुद्दों से जरूर लगाया जा सकेगा। कश्मीर-विवाद, पाकिस्तान में जड़ जमा चुके आतंकवाद, चीन की विस्तारवादी नीति, मध्य एशिया में बढ़ता तनाव जैसे मसलों को लेकर पार्टी की रणनीति का खुलासा चुनावी मैदान में हो सकता है। फिर, परमाणु मसलों पर भी डेमोक्रेटिक पार्टी का रुख भारत के खिलाफ रहा है। ऐसे में, यह देखना होगा कि पार्टी अब इस बारे में क्या सोचती है? सही-सही जवाब के लिए अभी हमें कुछ इंतजार करना होगा, मगर इतना तो तय है कि कमला हैरिस का दांव खेलकर डेमोक्रेटिक ने वहां की चुनावी बिसात को बदल दिया है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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