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अमेरिका में विदेशी छात्र (हिन्दुस्तान)

कोरोना महामारी ने अमेरिकी समाज और उसके शासन से जुडे़ कई मिथकों को ध्वस्त किया है। अमेरिका की केंद्रीय आव्रजन संस्था ‘इमिग्रेशन ऐंड कस्टम्स एनफोर्समेंट’ (आईसीई) का ताजा फैसला इसका नया उदाहरण है। आईसीई ने सोमवार को फरमान सुनाया कि अमेरिका में पढ़ रहे उन तमाम विदेशी छात्रों को देश छोड़ना पड़ेगा, जिनकी यूनिवर्सिटी ने आगामी सेमेस्टरों में ऑनलाइन पढ़ाई की व्यवस्था मुकम्मल कर ली है। यदि इसके बावजूद कोई छात्र अमेरिका में टिका रहा, तो उसे जबरन बाहर किया जाएगा। जाहिर है, इस फैसले का असर लाखों विदेशी विद्यार्थियों पर पडे़गा। खासकर भारत और चीन के छात्र इससे सर्वाधिक प्रभावित होंगे, क्योंकि सबसे ज्यादा इन्हीं दोनों देशों के विद्यार्थियों की तादाद है। यही नहीं, उन हजारों विद्यार्थियों के आगे भी फिलहाल अनिश्चितता की स्थिति पैदा हो गई है, जो सितंबर से नए अकादमिक-सत्र में भाग लेने के लिए अमेरिका पहुंचने वाले थे। 
इसमें कोई दोराय नहीं कि इस महामारी से निपटने में प्रशासनिक कमियों को लेकर अमेरिकी समाज में अंदरखाने काफी उबाल है। जल्द ही वहां राष्ट्रपति चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में, ट्रंप प्रशासन अमेरिकी अवाम को अब यह दिखाना चाहता है कि उसे सिर्फ उनका ख्याल है। महामारी के बाद वह वीजा नियमों में कई बदलाव कर चुका है। मगर हकीकत यह है कि दुनिया में सबसे अधिक जान-माल का नुकसान उठाने के बावजूद अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठानों में कोरोना से निपटने को लेकर अब भी समन्वय की भारी कमी है। रिपब्लिकन और डेमोक्रेट महामारी के सवाल पर आज भी अलग-अलग नजरिया रखते हैं। चिकित्सा विशेषज्ञ लगातार आगाह कर रहे हैं कि अमेरिका की स्थिति बेहद गंभीर है, और यह महामारी के बीचोबीच खड़ा है, पर राष्ट्रपति ट्रंप के बेहद करीबी लोग ही संक्रमण से बचाव के मान्य उपायों का मजाक उड़ाते फिर रहे हैं। वे मास्क पहनने की अनिवार्यता की भी खिल्ली उड़ाने से बाज नहीं आ रहे, जबकि ठोस नजीर सामने हैं कि जापान, दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने कैसे मास्क और फिजिकल डिस्टेंसिंग के जरिए इस घातक वायरस के प्रसार को काबू करने में सफलता पाई है। मगर सच्ची कोशिश और प्रतीकात्मक लड़ाई अमेरिकी समाज के दोहरेपन को अक्सर दुनिया के सामने ले आती रही है। कोरोना महामारी ने एक बार फिर इसे उजागर कर दिया है। 
ठीक है, हर सरकार अपने नागरिकों के हितों का ख्याल सबसे ऊपर रखती है, पर उसका यह भी फर्ज है कि अपनी भौगोलिक सीमा में दूसरे देशों के बाशिंदों के मानव अधिकारों की भी वह रक्षा करे। वैसे भी, ये विद्यार्थी शरणार्थी नहीं हैं, जिन्हें अमूमन हर देश एक बोझ समझता है। ये वे विद्यार्थी हैं, जिनसे अमेरिकी विश्वविद्यालयों ने मोटी फीस वसूली है। एक ऐसे वक्त में, जब अंतरराष्ट्रीय सरहदें बंद हैं, तमाम उड़ानें रद्द हैं, ट्रंप प्रशासन को इन विदेशी छात्रों को उनके मुल्क तक सुरक्षित पहुंचाने की व्यवस्था करनी चाहिए। अमेरिकी अर्थव्यवस्था में उच्च शिक्षा उद्योग का अच्छा-खासा योगदान है। उसे सालाना करीब 37 अरब डॉलर की कमाई इससे हो रही है। मुश्किल समय के ऐसे आचरण भावी विद्यार्थियों को उससे विमुख भी कर सकते हैं। बहरहाल, इस नई स्थिति में देशों और सरकारों के लिए भी एक सबक है, अपने यहां ज्यादा से ज्यादा विश्व-स्तरीय संस्थान खड़े कीजिए।

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