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अब हिन्दुस्तान की बारी (हिन्दुस्तान)

संसार की सबसे पुरानी और ताकतवर सभ्यताएं आम तौर पर तीन वजहों से  समाप्त हुईं- महामारी, प्राकृतिक आपदा अथवा परदेसी आक्रमण। भारत इस समय एक ओर चीन में उपजी वैश्विक महामारी और दूसरी ओर, उसकी फौजी टुकड़ियों से एक साथ जूझ रहा है। हिन्दुस्तान पर खत्म होने का खतरा भले न हो, पर यह वक्त सचेत आत्म-चिंतन का है। सिंधु घाटी सभ्यता को याद करें। अपने शानदार नगरों, वास्तु-कला, समुद्री और स्थलीय व्यापार के जरिए ईसा के जनमने से पूर्व हमारे पूर्वजों ने एक अद्भुत सभ्यता का निर्माण किया था, पर वह खत्म हो गई। कुछ विद्वान इसकी वजह प्राकृतिक आपदा, तो कुछ बाहरी आक्रमण बताते हैं। विदेशी आक्रमणों की बात बाद में, पहले हम आपदा की बात कर लें।

कोरोना का कहर पूरी शिद्दत से जारी है और लॉकडाउन की मनहूसियत फिर पांव पसारने लगी है। हताशा के इन हतभागी लम्हों में भी सकारात्मकता की कुछ किरणें तलाशी जा सकती हैं। अपने राजनीतिज्ञों को ही लें। कोरोना के हमले के तत्काल बाद जिस तरह सियासी तू-तू, मैं-मैं शुरू हुई थी, उससे चिंतनशील लोग आशंकित हो उठे थे। हमारे देश में जिजीविषा तो बहुत है, परंतु जिंदगी बचाने लायक स्वास्थ्य सुविधाएं आज भी सीमित हैं। ऐसे में, सियासी घमासान भय पैदा करता था कि नेता अपनी विफलता का दोष एक-दूसरे पर मढ़कर अपने दायित्वों से पिंड छुड़ाना चाहते हैं, मगर वे संभल गए।

केंद्र के सबसे बडे़ आलोचक तीन नेताओं का उदाहरण देता हूं। अरविंद केजरीवाल ने अपने पिछले दो चुनाव घनघोर मोदी लहर में उनका विरोध करके जीते। दिल्ली में जब महामारी पांव पसारने लगी, तब केंद्र और सूबे की सरकार में तकरार चरम पर थी, लेकिन हालात बिगड़ने के साथ ही केजरीवाल और केंद्र के सुर मिलने लगे। गृह मंत्री अमित शाह ने कमान संभाली और कई मौके ऐसे आए, जब अरविंद केजरीवाल ने खुद केंद्र को सहयोग करने के लिए ट्वीट कर धन्यवाद ज्ञापित किया। इसी तरह, शुरुआत में ममता बनर्जी लॉकडाउन लगाने, ट्रेनों के संचालन, केंद्रीय इमदाद आदि मुद्दों पर बेहद मुखर थीं। इधर उनका कोई बयान चर्चा में नहीं है। उद्धव ठाकरे तो कुछ ही दिनों पहले भाजपा से अलग होकर मुख्यमंत्री बने थे। जाहिर है, दोनों पक्षों में निजी तौर पर कड़वाहट थी। 14 अप्रैल को पहले लॉकडाउन के खात्मे के बाद बांद्रा स्टेशन पर हजारों प्रवासी मजदूर इकट्ठा हो गए थे। तब जिस तरह की तकरार शुरू हुई थी, उससे लगा था कि धारावी जैसी झोपड़पट्टियों और माचिस की डिब्बियों जैसे रिहाइशी फ्लैटों वाले इस महानगर में हालात हाथ से निकल गए हैं। यहां भी अमित शाह ने पहल की और दोनों सरकारें एक ही धरातल पर आ खड़ी हुईं।

उद्धव के पुत्र और उनकी कैबिनेट के सदस्य आदित्य ठाकरे ने ट्वीट कर कहा- ‘केंद्र ने फौरन हालात का संज्ञान लिया और इस मामले में वह राज्य की पूरी सक्रियता के साथ मदद कर रहा है। हम प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के आभारी हैं कि उन्होंने हालात को समझा है।’  ऐसे ही, केरल में वामपंथियों की सरकार है। वहां की सरकार ने अच्छे कदम उठाए, पर केंद्र के निर्देशों का उल्लंघन करते हुए तमाम होटल और रेस्टोरेंट समय से पहले खोल दिए। नई दिल्ली की आपत्ति के बाद तिरुवनंतपुरम की हुकूमत ने इसे वापस ले लिया। मतलब साफ है, आपदा के मामले में शुरुआती झटकों के बाद हमारे राजनीतिक दलों ने जिस तरह की सकारात्मकता बाद के दिनों में दिखाई है, उससे संविधान की संघीय अवधारणा को मजबूती मिली है। क्या इतना काफी है? यकीनन नहीं।

अब वक्त आ गया है, जब भारत महाशक्तियों की तरह सोचना शुरू करे। अभी तक यह बहस खत्म नहीं हुई है कि कोरोना वायरस मनुष्य जनित है या प्राकृतिक? यह खुद फैला या इसे फैलाया गया? भले ही यह प्राकृतिक रहा हो और इसे किसी ने न फैलाया हो, पर एक आशंका तो उभरती ही है कि कल कोई अराजकतावादी सरकार अथवा आतंकवादी गुट ऐसा कर सकता है। भारत को इन स्थितियों के लिए खुद को तैयार करना होगा और इसके लिए जरूरी है कि हम अपनी स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करें, उसे आम आदमी की पहुंच में लाएं। यह शुभ शकुन है कि वरिष्ठतम पदों पर रहे एन के सिंह की अगुवाई वाले वित्त आयोग ने अगले पांच वर्षों में स्वास्थ्य खर्चे में जीडीपी के 2.1 प्रतिशत की बढ़ोतरी का प्रस्ताव तैयार करना शुरू कर दिया है। अब राज्य सरकारों की बारी है।

अब आते हैं बाहरी लड़ाइयों पर। चीनी फौज ने हमारी सीमाओं का अतिक्रमण कर दो बातें साफ कर दी हैं। पहली यह कि हमारा प्रतिरक्षा तंत्र अभी तक आवश्यकता के अनुरूप तैयार नहीं हुआ है। दूसरी, हम भारतीय आसानी से अपनी पराजय भुला देते हैं। इस दुष्प्रवृत्ति को रोकना होगा। पहले बिंदु पर बहुत बात हो चुकी है, इसलिए दूसरे बिंदु को चर्चा के केंद्र में लाना चाहूंगा। हमारी पीढ़ी के जो लोग 1960 के दशक में जन्मे और बडे़ हुए, वे शुरुआती दौर में चीन से आशंकित रहते थे। हमें 1962 में अपनी पराजय सालती थी। गलवान घाटी के हादसे ने भी यही साबित किया है कि भले ही आज का भारत 1962 जैसा न हो, पर यह भी सच है कि वह चीन की चुनौतियों से पूरी तरह निपटने में उम्मीद के अनुरूप कामयाब नहीं है। इस स्थिति को बदलने के लिए आवश्यक है कि हम अपने देश के अर्थतंत्र को मजबूत करें। बताने की जरूरत नहीं कि अधिकतर सामरिक अभियान आर्थिक वजहों से पे्ररित होते रहे हैं। आज का आक्रामक चीन अपनी सेना से ज्यादा अर्थ-सत्ता पर इतराता है। बीजिंग का सत्ता-सदन समझता है कि अब वक्त आ गया है कि हम दुनिया में नंबर एक दावेदारी पेश करें, इसलिए वह सिर्फ पड़ोसियों नहीं, अमेरिका तक को आंखें दिखा रहा है।

ऐसे में, भारत क्या करे? हमें हर हाल में चीन पर अपनी आर्थिक निर्भरता कम करनी होगी। जिस तरह, 1962 की जंग के घाव भर गए, उसी तरह कूटनीति गलवान के आगे भी कदम बढ़ाएगी, पर भारतीयों को भूलना नहीं चाहिए कि जिंदा कौमें अपनी गलतियां दोहराती नहीं हैं। हमें अपने परंपरागत उद्योग-धंधों को एक बार फिर से खड़ा करना होगा और साथ ही दुनिया के साथ कदम-ताल भी करनी होगी। यह इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि कोरोना के बाद हर देश में आव्रजन कानून और सख्त किए जाएंगे। ऐसे में, जब प्रतिभाओं का पलायन कम होगा, तब हम उन्हें अपने ही देश में पुष्पित-पल्लवित होने का मौका मुहैया करा सकते हैं। अमेरिका और पश्चिमी देशों ने 1980 के दशक में सोवियत संघ को नियंत्रित करने के लिए चीन को दुनिया की फैक्टरी बनाया था। आज चीन और रूस मिलकर पश्चिम के ताकतवर देशों से आंखें मिला रहे हैं। भारत के लिए यह सुअवसर है और अब हमें अपने अंदरूनी ढांचे और कौशल को मजबूत कर अगली छलांग की तैयारी करनी होगी। 1980 के दशक में देंग जियाओ पिंग ने यही किया था। आज हमारी बारी है। चीन दुनिया का कारखाना है, तो हम संसार का दफ्तर बन सकते हैं। ‘वर्क फ्रॉम होम’ के जमाने में यह मुमकिन है। अगर हम ऐसा कर पाते हैं, तो सिंधु सभ्यता के वंशज एक नया इतिहास दर्ज कराएंगे, जो इस बात की मुनादी करेगा कि हमें आपदाओं और आक्रमणों को अवसर में बदलना आता है।

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