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अब वर्चुअल कूटनीति की ओर  (हिन्दुस्तान)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन के बीच हुई शिखर-वार्ता समोसा और गुजराती खिचड़ी की चर्चा के साथ खत्म हुई; इस वादे के साथ कि समोसे और खिचड़ी साझा किए जाएंगे। लेकिन फिलहाल यह मुमकिन नहीं था, क्योंकि वार्ता वर्चुअल (आभासी) थी, एक डिजिटल माध्यम के जरिए दोनों देशों के नेता एक-दूसरे से रूबरू हो रहे थे।
भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच यह शिखर-वार्ता द्विपक्षीय संबंधों के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण थी। दोनों देशों के बीच कई समझौते हुए, दोनों ने एक-दूसरे के मिलिट्री बेस के इस्तेमाल का बेहद महत्वपूर्ण समझौता भी किया। प्रधानमंत्री मोदी ने इसे व्यापार और साझेदारी का एक नया मॉडल बताते हुए शिखर-वार्ता के बाद ट्वीट भी किया। लेकिन यह सब बेहद सादगी से हुआ। इसमें पारंपरिक शिखर-वार्ता की रौनक गायब थी। न तो कोई भोज था, न फोटो-अप, न ही डिनर डिप्लोमेसी। एक स्क्रीन थी, और इस डिजिटल दीवार के आर-पार दोनों प्रधानमंत्री थे। उनमें बातचीत हुई और कई समझौते भी हुए। हालांकि, द्विपक्षीय रिश्तों की गरमी डिजिटल बंटवारे के आर-पार महसूस की गई। 
कोरोना-काल के पूर्व की परंपरागत शिखर-वार्ताओं को याद कीजिए। पहले किसी शिखर-वार्ता का मतलब होता था- शासनाध्यक्ष के आने की तैयारियां, कई भोज, कई दौर की बातचीत, फिर कुछ समझौते, साझा बयान और फोटो-अप। ऐसे में, कहा जा सकता है कि असल की जगह अब वर्चुअल ले रहा है और इसकी अहमियत अब बढ़ती ही जाएगी। हां, इसमें आमने-सामने मिलने की गर्मजोशी और ‘पर्सनल टच’ की कमी जरूर महसूस होगी, लेकिन कोरोना-काल की यही असलियत है और इसमें भविष्य के संकेत भी हैं। वर्चुअल डिप्लोमेसी अब एक ऐसी सच्चाई है, जो आगे भी बनी रहेगी। ऑस्ट्रेलिया के हाई कमिश्नर बैरी ओ फैरेल ने इसी दौरान अपना कार्यभार संभाला और राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को डिजिटल माध्यम से ही अपना परिचय-पत्र पेश किया।  इस मौके पर उन्होंने कहा भी कि कोरोना ने जीवन के हर क्षेत्र में बाधाएं खड़ी की हैं, कूटनीति इसका अपवाद नहीं। 
दरअसल, कोरोना-काल की कूटनीति में द्विपक्षीय संवादों, शिखर-सम्मेलनों या किसी भी प्रकार के आदान-प्रदान के नियम बदल चुके हैं। असल की जगह वर्चुअल ने ले ली है। राजनयिकों ने एक-दूसरे के साथ संपर्क व सहयोग बनाए रखने का नया तरीका अपना लिया है, जिसमें शून्य शारीरिक नजदीकी अपनाई जा रही है। नाराजगी जाहिर करने का तरीका भी वर्चुअल हो गया है। अप्रैल महीने में भारत-पाक सीमा पर मारे गए नागरिकों को लेकर नई दिल्ली ने नाराजगी जताते हुए इस्लामाबाद को वर्चुअल आपत्ति-पत्र भेजा। फोन कॉल और फिर ई-मेल के जरिए आपत्ति दर्ज की गई। 
वैश्विक कूटनीति इस दौरान कैसे डिजिटल माध्यम से काम कर रही है, इसकी एक दिलचस्प मिसाल है संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थाई प्रतिनिधि सैयद अकबरुद्दीन की सेवानिवृत्ति। वह रिटायर हुए और पद से उनकी विदाई एक आभासी नमस्ते के साथ  हुई। इसी तरह, पिछले माह  लगभग 20 सम्मेलन आभासी माध्यम से हुए। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की महासभा भी ऑनलाइन हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 4 मई को नाम शिखर-वार्ता में ऑनलाइन ही शिरकत की। कोरोना के शुरुआती दौर में ही प्रधानमंत्री ने सार्क देशों के नेताओं के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए एक अहम बैठक की थी। यह सब सिर्फ भारत में नहीं हो रहा, सभी देश तकनीक के जरिए अब अपनी कूटनीति कर रहे हैं।
ऐसा नहीं है कि वर्चुअल माध्यम से कूटनीति पहले नहीं हुई। मोहित मुसद्दी और संजय पुलिपका ने देल्ही पॉलिसी ग्रुप के लिए लिखे अपने शोधपत्र में लिखा है कि कूटनीति के लिए वर्चुअल माध्यम अपनाना असामान्य नहीं है। जब से टेलीफोन ने कूटनीति में अपनी जगह बनाई है, वह वहां जम गया। उसकी भरपाई किसी अन्य चीज से नहीं की जा सकी। 1963 में शीत युद्ध के दौरान अमेरिका और सोवियत संघ के बीच हॉटलाइन की शुरुआत हुई थी, ताकि दोनों शीर्ष नेताओं के बीच सीधी बातचीत हो सके। देखते-देखते दूसरे देश भी कूटनीति के इस वैकल्पिक रास्ते का इस्तेमाल करने लगे। शीत युद्ध के बाद टेलीफोन द्वारा कूटनीति में गति आ गई। अब तो संयुक्त राष्ट्र भी वर्चुअल महासभा की संभावना पर गौर कर रहा है, जिसमें रिकॉर्ड किए गए भाषण चलाए जाएं।
डिजिटल माध्यम से कूटनीति के कई फायदे हैं। यह काफी किफायती है। शिखर सम्मलेन हो या फिर बहुपक्षीय बैठक, इनसे जुड़ी यात्राओं और आयोजनों का खर्च वर्चुअल माध्यम में काफी कम हो जाता है। यह पर्यावरण संरक्षण की नजर से भी बेहतर है, क्योंकि ऐसे में हवाई यात्राओं की संख्या में काफी कमी आएगी, जिसका सीधा असर ग्लोबल वार्मिंग पर पड़ता है। इन सभी फायदों को देखते हुए लगता है कि संबंधों के तार जोड़ने के लिए डिजिटल माध्यम ही भविष्य है।
लेकिन वर्चुअल डिप्लोमेसी पारंपरिक कूटनीति की जगह पूरी तरह से ले लेगी, यह मुश्किल है। भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच तो यह कामयाब हो सकती है, जहां दोनों पक्षों में कोई टकराव या मतभेद की स्थिति नहीं, लेकिन जहां मुश्किल परिस्थितियों से जूझना पड़ता है, वहां बंद दरवाजों के पीछे की कूटनीति और व्यक्तिगत संबंधों की अपनी अहमियत है। मिसाल के तौर  पर, डोका ला टकराव के बाद भारत और चीन के रिश्तों में जमी बर्फ को पिघलाने में प्रधानमंत्री मोदी और शी जिनपिंग की वुहान में हुई पारंपरिक-वार्ता की अहम भूमिका थी। इसमें नदी किनारे की सैर, पारंपरिक भोज जैसी चीजों की अपनी जगह है, जो दोनों पक्षों के बीच एक आत्मीयता को जन्म देती है। 
याद कीजिए, इंदिरा गांधी ने अपने दौर में अलफांसो आम की कूटनीति की थी, प्रधानमंत्री मोदी ने तत्कालीन पाकिस्तानी वजीर-ए-आजम नवाज शरीफ के साथ शॉल डिप्लोमेसी की थी। रूस तो वोदका डिप्लोमेसी के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। प्रधानमंत्री मोदी और उनके ऑस्ट्रेलियाई समकक्ष के बीच भी समोसा और खिचड़ी की बात हुई, पर वह सिर्फ बात थी। जब उनकी आमने-सामने की मुलाकातें होंगी, तो बात आगे बढ़ेगी। संबंधों की जटिलताओं को सुलझाने के लिए या रिश्तों में जमी बर्फ को पिघलाने के लिए पुराने पारंपरिक तरीके जरूरी बने रहेंगे। हां, सामान्य बातचीत और कूटनीति के लिए वर्चुअल डिप्लोमेसी ही आगे का रास्ता है। 
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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