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अप्रिय समापन (हिन्दुस्तान)

एक असाधारण स्थिति में मानसून सत्र के लिए बैठी संसद से देश की अपेक्षाएं भी असाधारण थीं। लेकिन भीषण महामारी, डांवांडोल अर्थव्यवस्था और सीमा पर तनाव की पृष्ठभूमि में हमारे माननीय सांसद देशवासियों को वैसी एकजुट आश्वस्ति नहीं दे सके, जैसी वे उनसे चाहते थे। निस्संदेह, दोनों सदनों में अहम विधायी कार्यों को निपटाया गया, लेकिन दुर्योग से यह सत्र अपनी विधायी उपलब्धियों से अधिक राज्यसभा के हंगामे और संसदीय मर्यादाओं के उल्लंघन के लिए ही याद किया जाएगा। यह संसद के अब तक के इतिहास में सबसे संक्षिप्त मानसून सत्रों में से एक के तौर पर भी गिना जाएगा। राज्यसभा की 18 बैठकें होनी थीं, मगर 10 बैठकों के बाद ही सत्र को स्थगित करते हुए सभापति वेंकैया नायडू ने कहा कि कोविड-19 की चुनौतियों को देखते हुए यह फैसला लेना पड़ रहा है। इसमें कोई दोराय नहीं कि इस महामारी से दुनिया भर में जान-माल का भारी नुकसान हो रहा है, और हमारे कई सांसद भी इस वायरस की जद में हैं। पर सत्र की समाप्ति के वक्त सदन की जो स्थिति थी, वह लोकतंत्र के लिए सुखद नहीं कही जा सकती।
पिछले 68 वर्षों में हमारी संसद ने दुनिया भर को यह संदेश दिया है कि हम एक परिपक्व लोकतांत्रिक देश हैं और सत्ता व विपक्ष में तमाम नोकझोंक, असहमतियों के बावजूद हमारी संसदीय परंपरा में संवाद के जरिए आगे बढ़ने की पूरी गुंजाइश है। पिछले कुछ वर्षों से यह शक्ति क्षीण पड़ रही है। और इसका सबसे बड़ा प्रमाण यही है कि राज्यसभा का सत्र जिस वक्त स्थगित किया जा रहा था, उस समय उसके आठ सदस्य निलंबित थे और लगभग पूरा विपक्ष सदन से बाहर था। रवायत यह रही है कि सत्र के आखिरी दिन तमाम पार्टियों के सांसद आपसी राजनीतिक टकराहटों को भुलाकर एक खुशनुमा माहौल में अपने-अपने क्षेत्र की ओर कूच कर जाते हैं। मगर इस कसौटी पर यह सत्र खरा न उतर सका। सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों ने अपनी मुद्राएं नहीं बदलीं और एक अप्रिय मोड़ पर वे एक-दूसरे से विदा हुए। संसदीय लोकतंत्र की खूबसूरती सदनों की खाली सीटों से नहीं बढ़ती, यह बात सत्ता पक्ष को ज्यादा समझने की जरूरत होती है। खासकर संसदीय कार्य मंत्री की कुशलता इसी गतिरोध के दौरान आंकी जाती है। पिछले दो दशकों में ही प्रमोद महाजन, सुषमा स्वराज, गुलाम नबी आजाद आदि ने कई बार इसी हैसियत से अपनी सरकार के लिए विपक्ष का सहयोग हासिल किया था। पर अब संसदीय गतिरोधोंके दौरान यह कमी साफ-साफ महसूस की जा सकती है।
हमारा संविधान विशाल है और उसमें लगभग सबकी भूमिका वर्णित है, मगर हमारे माननीयों को यह भी याद करने की जरूरत है कि दुनिया के सर्वश्रेष्ठ लोकतंत्र किसी पवित्र पोथी से अधिक नैतिक विश्वासों, स्थापित परंपराओं और निजी आचरणों से संचालित होते हैं। संसदीय लोकतंत्र में सत्ता पक्ष से कम विपक्ष की जिम्मेदारी नहीं होती। जनहित के मुद्दों को अपने-अपने नजरिये से पेश करने की भी एक मर्यादा है। राज्यसभा में बीते रविवार को जो घटा, उससे बचते हुए भी विपक्ष अपना प्रखर विरोध जता सकता था। मगर उच्च सदन के माननीयों ने इस मायने में निराश किया। दोनों पक्षों को भविष्य में यह ख्याल रखने की जरूरत है कि अधिकारों के अंधेपन में हमारी संसदीय परंपरा का जो कुछ सुंदर है, शुभ है, कोमलतम है, वह न हारे।    

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