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अपने फैलाए जाल में फंसता ड्रैगन (हिन्दुस्तान)

अभी जनवरी में ही हुआवेई को दूरसंचार क्षेत्र में सीमित कामकाज की अनुमति दी गई थी, लेकिन अपने इस फैसले को अचानक से पलटते हुए ब्रिटेन ने चीन की इस कंपनी पर अब प्रतिबंध लगाने का फैसला किया है। पाबंदी के तहत इस साल के अंत, यानी 31 दिसंबर से ब्रिटेन की मोबाइल-प्रदाता कंपनियां हुआवेई कंपनी से 5जी उपकरण नहीं खरीद सकेंगी, साथ ही ब्रिटिश दूरसंचार ऑपरेटर भी अपने यहां लगे सभी हुआवेई किट 2027 तक हटा लेंगे। ब्रिटेन के डिजिटल और संस्कृति मंत्री ओलिवर डाउडेन ने मई में अमेरिका द्वारा कंपनी पर लगाए गए प्रतिबंध को इसकी वजह बताया है। उनका कहना है कि चूंकि अमेरिकी पाबंदी से हुआवेई की आपूर्ति शृंखला को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है, इसलिए ब्रिटेन अब यह उम्मीद नहीं कर सकता कि कंपनी आने वाले दिनों में अपने 5जी उपकरणों की सुरक्षा की गारंटी दे सकेगी।
ब्रिटेन के इस फैसले का अमेरिका ने तत्काल स्वागत किया है। अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने ब्रिटेन की सराहना करते हुए समान सोच रखने वाले अन्य देशों से भी बीजिंग के खिलाफ कार्रवाई करने का आह्वान किया है। दूसरी तरफ, बीजिंग ने ब्रिटेन के इस ‘आधारहीन प्रतिबंध’ का ‘कड़ा विरोध’ किया है और चेतावनी दी है कि अपनी कंपनियों के ‘जायज हितों की रक्षा के लिए चीन तमाम कदम’ उठाएगा, क्योंकि ‘किसी भी फैसले या कार्रवाई की कीमत जरूर चुकानी पड़ती है’। देखा जाए, तो ब्रिटेन की सरकार अपने फैसले की कीमत साफ-साफ समझ भी रही है, क्योंकि इस पाबंदी के बाद वहां 5जी के विस्तार में अब वक्त लगेगा। इस फैसले से उसे रणनीतिक नुकसान भी होगा, क्योंकि उससे चीन का साथ छूट सकता है। यह सब ऐसे वक्त में होगा, जब ब्रेग्जिट-बाद के दौर में अपने कारोबारी रिश्तों को बढ़ाने के लिए ब्रिटेन दुनिया की तमाम बड़ी ताकतों से रिश्ते मजबूत करना चाह रहा है।
बहरहाल, ट्रंप प्रशासन द्वारा मई में हुआवेई पर नई पाबंदी लगाने के बाद से उसके सेमीकंडक्टर की वैश्विक आपूर्ति प्रभावित हुई है, जिसके कारण ब्रिटेन में उसकी लागत बढ़ गई है। फिर, बोरिस जॉनसन सरकार को सुरक्षा समीक्षा के एक नए दौर के लिए भी जाना जाता है, जिसकी झलक राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के फैसले में दिखी और पाबंदी का यह कदम उठाया गया। ब्रिटेन-अमेरिका संबंध भी इस फैसले की एक वजह है, क्योंकि जनवरी में जब हुआवेई को ब्रिटेन में कारोबार की अनुमति दी गई थी, तब ट्रंप प्रशासन ने यह साफ कर दिया था कि लंदन के साथ वाशिंगटन के ‘विशेष रिश्ते’ की समीक्षा की जाएगी। इससे न सिर्फ दोनों देशों के बीच सुरक्षा और खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान की डोर प्रभावित होती, बल्कि अमेरिका-ब्रिटेन में व्यापार समझौते को लेकर जारी बातचीत पर भी प्रतिकूल असर पड़ता। जाहिर है, ब्रिटेन का नया रुख ट्रंप प्रशासन के लिए एक बड़ी कूटनीतिक जीत है, क्योंकि अमेरिका-चीन विवाद पर तटस्थ रुख अपनाने वाले अन्य देशों को भी इसी तरह से मनाया जा सकता है।
पिछले दो दशकों से ब्रिटेन में कारोबार कर रही हुआवेई के लिए यकीनन यह एक मुश्किल घड़ी है। इससे यूरोप में उसका कारोबार प्रभावित हो सकता है, जहां कुल वैश्विक बिक्री का करीब एक चौथाई उत्पाद वह बेचती है। फ्रांस ने भी सीमित अवधि के लिए लाइसेंस जारी करने की व्यवस्था करके हुआवेई-5जी उपकरणों के इस्तेमाल को सीमित करने का फैसला किया है। इसे भी कंपनी पर एक वास्तविक प्रतिबंध के रूप में देखा जा रहा है, हालांकि फ्रांस सरकार ने इसे सीधे-सीधे नहीं कुबूला है। जर्मनी भी हुआवेई पर अपनी निर्भरता कम कर रहा है, क्योंकि पूरे यूरोप में चीन के खिलाफ नकारात्मक माहौल बन गया है। वर्षों तक बीजिंग की जी-हुजूरी करने वाला यूरोपीय संघ भी अब उसके खिलाफ मुखर है। उसकी नाराजगी की वजह कोविड-19 के खिलाफ शुरुआत में बीजिंग द्वारा ढीला रवैया अपनाने से लेकर हांगकांग में नए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून को लेकर यूरोप में चलाया गया भ्रामक अभियान है। अब चीन को एक ‘सार्वभौमिक दुश्मन’ के रूप में देखा जा रहा है, जो तमाम समझौतों, नियमों और संस्थानों के साथ-साथ मौजूदा वैश्विक व्यवस्था को चुनौती देने पर आमादा है।
साफ है, जो लड़ाई अब तक वाशिंगटन अकेले लड़ता हुआ दिख रहा था, उसमें कई दूसरे राष्ट्र भी शामिल हो गए हैं। इससे युद्ध का मैदान पूरी तरह से बदल गया है। भारत की प्रतिक्रिया पर भी खूब नजर है। पिछले साल नई दिल्ली ने हुआवेई को 5जी ट्रायल में भाग लेने की अनुमति दी थी, जो कोविड-19 संक्रमण की वजह से संभव नहीं हो सका। मगर अब सीमा-विवाद और नई दिल्ली की चिंताओं के प्रति बीजिंग की बेरुखी के कारण भारत-चीन द्विपक्षीय रिश्तों का ताना-बाना पूरी तरह से बदल गया है। नई दिल्ली का सख्त रुख कायम है और संभावना यही है कि हुआवेई को शायद ही भारत में 5जी नेटवर्क लागू करने की प्रक्रिया में शामिल किया जाए। नई दिल्ली यह संकेत दे रही है कि महत्वपूर्ण निर्माण-परियोजनाओं में चीनी कंपनियों की भागीदारी को सीमित करने या रोकने का मतलब यदि आर्थिक और तकनीकी नुकसान है, तब भी भारत यह कीमत चुकाने को तैयार है। मगर बीजिंग पर भी इसका खूब असर होगा, क्योंकि वह एक ऐसे बाजार से हाथ धो लेगा, जहां आने वाले वर्षों में चीन के बाद सबसे अधिक 5जी उपभोक्ता होंगे। यूरोपीय बाजार से बाहर होने के बाद यह हुआवेई के लिए एक विनाशकारी झटका हो सकता है। 
साफ है, हुआवेई पर पाबंदी महज एक तकनीकी या आर्थिक मसला नहीं है, बल्कि कई देशों के लिए यह एक राजनीतिक फैसला है। कारोबारी और प्रौद्योगिकी रिश्ते को हथियार बनाने का चीन का फैसला ही अब उसके खिलाफ जाता दिख रहा है। कई मुल्क अब जैसे को तैसा की रणनीति आजमाने लगे हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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