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अपने अपराध से मुठभेड़ का मौका  (हिन्दुस्तान)

कालजयी कथाकार मारखेज की एक महत्वपूर्ण कहानी है, क्रॉनिकल ऑफ अ डेथ फोरटोल्ड  या एक मृत्यु का पूर्व घोषित आख्यान। इसमें एक व्यक्ति मारा जाने वाला है और यह जानकारी उसके अलावा पूरे शहर को है। लोग दम साधे उसकी हत्या की प्रतीक्षा कर रहे हैं। उस प्रतीक्षा और अंतत: उसकी हत्या का वर्णन जिस रचनात्मक कौशल से किया गया था, वह मारखेज जैसे रचनाकार के वश की ही बात थी। पिछले दिनों मृत्यु की ऐसी ही एक गाथा दिखी, पर उसकी भोंडी नाटकीयता से लगा कि हम एक बी ग्रेड मुंबइया फिल्म देख रहे हैं। शुक्रवार, 10 जुलाई को इसका पटाक्षेप हो गया और अविश्वसनीय तरीके से कथा का नायक मारा गया। इस नायक की खुद की सबसे पसंदीदा फिल्म भी एक बी ग्रेड की मूवी ही थी, जिसके एक पात्र की तर्ज पर वह खुद को विकास पंडित कहलाना पसंद करता था। उसने उज्जैन में गिरफ्तारी देते समय चिल्ला-चिल्लाकर अपनी शिनाख्त जाहिर की कि वह कानपुर वाला विकास दुबे है और सीसीटीवी कैमरे में अपने विजुअल्स कैद कराने के बाद खुद मारखेज का चरित्र बन गया। मृत्यु के इस पूर्व घोषित आख्यान में सिर्फ उसे ही नहीं पता था कि वह मारा जाएगा। पूरा देश जानता था कि उसकी मृत्यु आसन्न है। लोग सोशल मीडिया पर उसकी मृत्यु की घोषणा कर रहे थे। उसकी मृत्यु के चश्मदीद बनने को पत्रकार उज्जैन से पुलिस की गाड़ियों के पीछे अपने वाहन लगाए हुए थे, एक वकील ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका लगाई कि उसे इस आसन्न मृत्यु से बचा लिया जाए और सुबह सबेरे लोगों ने अपने टीवी सेट यह जानने के लिए खोले कि वह अभी तक मारा गया या नहीं और उन्हें निराशा नहीं हुई। निराशा हुई होगी, तो पुलिस के साथ चल रहे पत्रकारों को, जिनकी गाड़ियां चंद मिनट पहले रोक ली गईं और वे देश को विकास का वाहन पलटते, उसे सिपाहियों के हथियार छीनकर भागते, उन पर फायर करते और फिर मारे जाते नहीं दिखा सके।
विकास दुबे उत्तर प्रदेश या देश के अधिकांश राज्यों की देह में पल रही सड़ांध का एक छोटा सा उदाहरण है। ऊपर से चमकती त्वचा व इत्र छिड़के परिधान में छिपे शरीर में क्या कुछ छिपा है, इसका पता तब चलता है, जब किसी अंग को फोड़ते हुए पीब बाहर निकल आती है। इस बार भी जब विकास दुबे ने आठ पुलिसकर्मियों को नृशंस तरीकों से मार डाला, तभी हमें याद आया कि पिछले दो दशकों से सूबे में जो भी सत्ता में आया है, उसने इस अपराधी का भरपूर उपयोग किया है। यह भी कहना थोड़ा मुश्किल है कि किसने किसका इस्तेमाल किया, क्योंकि इस बीच विकास की संपत्तियों में कई सौ गुना वृद्धि हुई थी। उसने थाने में घुसकर हत्या की और अपने समर्थकों के कंधों पर चढ़कर बाहर निकल आया। इस बार भी जब उसने दुस्साहस का दिल दहला देने वाला कारनामा अंजाम दिया, उस पर 60 से अधिक मुकदमे दर्ज थे, वह जमानत पर छूटा घूम रहा था।
इस दुर्दांत अपराधी के अंत के साथ दो ऐसी चीजें हुईं, जिनको आधार बनाकर एक गंभीर विमर्श हो सकता है। पहली बात तो विकास को मारने वाले पुलिसकर्मियों का सम्मान है, जो उनकी ‘वीरता’ के एवज में कानपुर की जनता द्वारा किया गया। हालांकि यह उस प्रदर्शन से थोड़ा कम था, जो कुछ ही महीने पहले हैदराबाद में दिखा था। उस समय तो एक महिला डॉक्टर के हत्यारों को जेल से निकालकर मार देने वाली तेलंगाना पुलिस का इससे कई गुना शानदार अभिनंदन किया गया था। शायद इसके पीछे वह कमजोर पटकथा थी, जो विकास के ‘एनकाउंटर’ के लिए लिखी गई थी। मुझे याद आ रहा है, चार दशक पूर्व भागलपुर में कुछ दुर्दांत अपराधियों की आंखें पुलिस ने फोड़ दी थीं और जब एक न्यायिक जांच कमेटी वहां पहुंची, तो पूरा शहर पुलिस के समर्थन में बंद हो गया था। पारंपरिक रूप से पुलिस विरोधी बिहारी प्राध्यापक, वकील, छोटे-बड़े व्यापारी या छात्र यह कहते हुए सड़कों पर निकल आए थे कि वर्षों से नागरिकों को सताने वाले इन अपराधियों को अदालतें सजा नहीं दे पा रही थीं, इसलिए उन्हें सजा देकर पुलिस ने सही ही किया है।
किसी भी सभ्य समाज में पुलिस को अपराधियों को दंड देने का अधिकार नहीं दिया जा सकता, फिर क्यों भारत में जनता पुलिस को जज की भूमिका में देखकर प्रसन्न होती है? इसे समझना बहुत मुश्किल नहीं है। पिछले कुछ दशकों में हमारी न्याय-व्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई है और किसी अपराधी को सामान्य अदालती कार्यवाही से दंडित करा पाना लगभग असंभव हो गया है। ऐसे में, एक अपराधी के हाथ-पैर टूटते देखकर या उसको पुलिस द्वारा मारे जाते देखकर जनता का खुश होना स्वाभाविक है, पर इसी जनता से क्या यह अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए कि वह सड़कों पर निकल सरकार से मांग करे कि न्यायिक व्यवस्था में ऐसे व्यापक और बुनियादी सुधार किए जाएं, जिससे प्रक्रियाओं के जंजाल में फंसकर मुकदमे सालों-साल न घिसटें और कम समय में फैसले हो सकें, लेकिन इन सुधारों में श्रम, समय और संसाधनों की जरूरत होगी और क्या हमारी सरकारें इसके लिए तैयार हैं? उनको यह ज्यादा आसान लगता है कि बीच-बीच में जब जनता हाहाकार करने लगे, तो पुलिस कुछ अपराधियों को मार डाले और वक्ती तौर पर गुस्सा ठंडा पड़ जाए।
विकास दुबे के उत्थान और पतन को केंद्र में रखकर दूसरा विमर्श राजनीति और अपराध के गठजोड़ पर हो सकता है। लगभग सभी बडे़ गैंगस्टर की तरह इसने भी एक छोटे बदमाश के रूप में अपना करियर शुरू किया था। जल्दी ही नेताओं ने इसकी प्रतिभा और उपयोगिता भांप ली और अगले कुछ दशकों तक दोनों ने एक-दूसरे का भरपूर उपयोग किया। हरेक शासक दल में वह गया। दूसरे अपराधियों की तरह वह भी अपनी जाति के अनेक नौजवानों का नायक था। जिस समय वह मारा गया, वह अपने जीवन की दूसरी पारी के बहुत करीब था, जिसमें वह विधायक या मंत्री होने के सपने देख सकता था।
क्या ही अच्छा होता कि हम विकास दुबे नामक अपराधी की मौत भी बेकार न जाने देते और उसी के बहाने कुछ गंभीर और सार्थक बहसें शुरू करते। ऐसा न हो कि दो-चार दिन के शोर-शराबे और जांच के नाम पर कुछ लीपापोती के बाद इस घटनाक्रम का भी वही हश्र हो, जो आम तौर से ऐसे मामलों में होता आया है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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