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अदालती निर्णय के बाद  (हिन्दुस्तान)


बाबरी विध्वंस मामले में सीबीआई कोर्ट का 28 साल बाद आया फैसला बहुत महत्वपूर्ण होने के साथ ही विचारणीय भी है। न केवल अपराध शास्त्र, बल्कि विधि शास्त्र के हिसाब से भी इस फैसले का हमारी व्यवस्था पर दूरगामी असर संभव है। सीबीआई कोर्ट के विशेष जज सुरेंद्र कुमार यादव ने सेवानिवृत्त होने से ठीक पहले फैसला सुनाते हुए कहा कि बाबरी ढांचा ध्वंस की घटना पूर्व नियोजित नहीं थी, अर्थात घटना अकस्मात हुई। 351 गवाहों और 600 दस्तावेजी सुबूतों को सुनने-देखने के बाद अदालत के फैसले से साफ है, पेश किए गए सुबूत पर्याप्त नहीं थे, इसलिए सभी 32 आरोपी बरी कर दिए गए। कुल 49 आरोपियों में से 32 ही अभी जीवित हैं, जिनमें से 26 ही अदालत पहुंचे थे। सीबीआई कोर्ट द्वारा बरी किए गए प्रमुख नेताओं, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, कल्याण सिंह, उमा भारती इत्यादि ने अवश्य राहत की सांस ली होगी। पहले यह आशंका जताई जा रही थी कि यदि इन नेताओं को तीन साल से ज्यादा की सजा होगी, तो जेल जाना पडे़गा। आरोपियों में केवल राजनेता ही नहीं, बल्कि धार्मिक, सामाजिक नेता व साधु-महंत भी शामिल रहे। 6 दिसंबर, 1992 को बाबरी ढांचा गिराए जाने के लिए इन्हें साजिश में शामिल माना जा रहा था, लेकिन सीबीआई अकाट्य साक्ष्य पेश करने में विफल रही। कोर्ट ने कहा है, पेश किए गए फोटो, वीडियो, फोटोकॉपी साक्ष्य के रूप में ग्राह्य नहीं हैं। इतने बडे़ मामले में सीबीआई ने जो साक्ष्य पेश किए हैं, उनका टेंपर्ड या छेड़छाड़-युक्त होना अलग से विचारणीय है। इस फैसले के साथ ही सीबीआई के खाते में एक और नाकामी जुड़ गई है। 
वैसे तो राम मंदिर का फैसला आ चुका है और अयोध्या में मंदिर निर्माण के साथ ही मस्जिद निर्माण भी हो रहा है, लेकिन तब भी यह बड़ा सवाल बना हुआ है कि वे कौन लोग थे, जिन्होंने ढांचे को ढहा दिया? तोड़ने वालों के वजूद को महज भीड़ या अराजक तत्व बताकर आगे बढ़ जाने के अपने नफा-नुकसान हैं, जिनसे हमारी समग्र व्यवस्था पर उत्तरोतर असर हो, तो आश्चर्य नहीं। कुल मिलाकर, कोर्ट ने माना है कि जिन नेताओं को आरोपी बनाया गया, वे विध्वंस रोकने की अपील कर रहे थे। भारतीय न्याय-व्यवस्था के लिए यह एक बड़ा फैसला है और बडे़ फैसलों को जमीन पर स्थिर होने में वर्षों लग जाते हैं। वैसे अभी इस फैसले पर आगे सुनवाई या अपील की पूरी गुंजाइश है और भारत व भारतीय संविधान की खूबसूरती है कि वह असंतुष्ट पक्षों को भी अंत तक मौका देता है। सीबीआई कोर्ट के फैसले को आगे चुनौती मिलेगी, लेकिन भारतीय समाज को अपनी संपूर्णता में आस्था और अपराध की लक्ष्मण रेखाओं को सुनिश्चित कर लेना चाहिए। हमें एक सजग लोकतांत्रिक समाज के रूप में सावधानी बरतनी चाहिए, ताकि भविष्य में व्यवस्थाओं का संचालन कोई अराजक भीड़ न कर सके। 
इस फैसले से नए मंदिर या मस्जिद के निर्माण पर कोई फर्क नहीं पडे़गा, लेकिन हमारे तमाम धार्मिक-सामाजिक नेताओं व शासन-प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि समाज में सद्भाव और मजबूत हो। इतिहास में हुई गलतियों के बोझ को ज्यादा समय तक नहीं ढोया जा सकता। इस ऐतिहासिक फैसले से सकारात्मक सबक लेकर आगे बढ़ने में ही भारतीय समाज की बेहतरी है।

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